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शब्दः जिस तरह लिखते थे, उसी तरह चुपचाप चले गए तेजिंदर

तेजिंदर गगन

जिस तरह चुपचाप लिखते थे, उसी तरह चुपचाप चले भी गए तेजिंदर। साहित्य उनके लिए शोहरत की बजाय साधना की चीज थी। आत्म प्रदर्शन से वह ताउम्र दूर रहे, लेकिन यह उनकी कलम की शक्ति ही थी, जब भी उनकी कोई कृति प्रकाशित हुई,लोगों का ध्यान उस पर गया। साहित्य जगत का उन पर ध्यान विशेष रूप से 1990 में गया, जब 1984 के दंगों की पृष्ठभूमि पर उनका उपन्यास ‘वह मेरा चेहरा' आया। एक दशक बाद आदिवासी धर्मांतरण पर केंद्रित ‘काला पादरी' और इसके भी एक दशक बाद ‘सीढ़ियों पर चीता' आया। यहां तक आकर साफ हो गया कि मानवीय त्रासदियों को उजागर करने के लिए जिस तरह तेजिंदर अपने वर्तमान की जटिल समाजिक-राजनीतिक और सांस्कृतिक गुत्थियों को चुनते हैं, वैसा किसी और समकालीन रचनाकार के यहां मिलना दुर्लभ है। उनकी स्मृति स्वरूप यहां प्रस्तुत है उनके उपन्यास ‘वह मेरा चेहरा' का एक अंश और उनकी मित्र व चर्चित कथाकार जया जादवानी की श्रद्धांजलि-

अब जबकि तुम पढ़ने के लिए यहां नहीं हो, मैं तुम्हारे लिए कुछ लिख रही हूं। बिना जाने कि लिखना क्या है आखिर? तुम्हारी स्टडी ज्यों की त्यों सजी है, किताबों से भरी आलमारियों के ऊपर तुम्हें दिए गए खूब सारे स्मृति चिह्न ऊपर वाली शेल्फ पर सजे हैं। कमरे के बीचो बीच रखी बड़ी-सी भव्य टेबल पर एक कंप्यूटर और खूब सारी चीजें रखी हैं, जो तुमने बड़े शौक से इकट्ठा की हैं। बाईं तरफ खूब सारी हिंदी-अंग्रेजी की किताबें और दाईं तरफ मोटी गद्देदार सोफा चेयर। टेबल के पीछे तुम्हारी बड़ी सी व्हील चेयर। टेबल के ठीक सामने ‘मास्को डायरी' और ‘रिल्के के पत्र' रखे हुए हैं, जिन्हें तुम इन दिनों पढ़ रहे होगे। इतनी प्यारी सी स्टडी मैंने कम ही लोगों की देखी है, जहां सब कुछ इतना व्यवस्थित और सुन्दर हो। तुम्हें अच्छी चीजें इकट्ठी करने का शौक था, अच्छे कपड़े पहनने का, अच्छी किताबें पढ़ने और लिखने का भी। तुम्हारे ईदगिर्द पसरा सब कुछ खास ही होता था। स्मृति चिह्नों के बीच तुम्हारी मुस्कराती तस्वीर है और तुम्हारी टेबल के ठीक सामने समीरा और तुम्हारी तस्वीर, जिसे तुम और ध्यान से देखते होगे, जब समीरा मुंबई चली जाती होगी। जब भी दलजीत शिकायत करती कि उसके बिना अकेलापन लगता है, तुम बड़े प्यार से उसे समझाते - ‘उसे उड़ने दो। यह उसका उड़ने का वक्त है। हम तो हैं एक-दूसरे के लिए।'

आज वह बिलख रही है। मुझे देखते ही वह फट पड़ी थी -‘देखो जया, तुम्हारा दोस्त चला गया।' मैं उसे दिलासा दे रही हूं। मैं नहीं मानती कि तुम कहीं गए हो। क्यों जाओगे भला? तुम तीनों ही जानते हो कि तुम एक-दूसरे के बिना नहीं रह सकते।

अभी कल ही तुमने बहुत ख़ुशी-ख़ुशी मुझसे शेयर किया था कि ‘बहुवचन' में तुम्हारी कहानी दस वर्षों के बाद छपी है और एक और कहानी बस पूरी होने को है। तुमने अपनी ‘डायरी' भी पूरी कर ली है और उसके लिए तुम कोई नया पब्लिकेशन ढूंढ़ रहे हो।

मैंने कहा, इस पर बैठ कर सोचना पड़ेगा- ‘मेरे पास कुछ पते हैं। बैठ कर बात करेंगे। मैं कल सुबह आती हूं।'

‘मेरी सुबह आना...' कहकर तुम ‘हो..... हो....' कर हंस दिए। फिर वही सरदारों वाली हंसी। मेरे घरवाले कहते हैं - ‘इतना विनम्र सरदार हमने आज तक नहीं देखा...'।

लगता है मैं जरा जल्दी आ गई हूं, तुम इस ठण्डे बक्से में अभी तक सो रहे हो।

तुम ऐसे ही हो। सही मायनों में मनुष्य। तुम्हें डर लगता है, दूसरों को दु:ख पहुंचाने में, किसी को नाराज कर लेने में। किसी को ‘न' नहीं कह पाते तो कुछ लोग इसका फायदा भी उठा लेते हैं। किसी की आलोचना भी करनी हो तो खूब शहद में लपेट कर बोलते हो। मैं नाराज होती हूं-

‘उसके सामने सच भी बोल दिया करो।'

‘अरे छड यार, उसका जी दु:ख जाएगा।' फिर वही सरदारों वाली हंसी।

‘अभी तो सब कुछ ठीक था। वे लिखने लगे थे। तीन-तीन घंटे बैठे रहते थे। हम सब खुश थे। आज भी कह रहे थे मैं रात को देर तक बैठूंगा...' दलजीत रोते हुए बता रही है। अभी कुछ ही महीने पहले तुम फिर से लिखने लगे थे। तुम्हारे घरवाले खुश थे कि एक लम्बे वक्त बाद आसमान से सूखे की तपती धूप गई और अब सृजन की बारिश हो रही है। बारिश में तो धरती का सुकून लौट आता है। गई हुई चिड़ियाएं लौट आती हैं, हरियाली लौट आती है। तुम्हें ये मौसम खूब पसंद है। तो अब इस अपने पसंदीदा मौसम में खूब लिखो।

मैं नहीं मानती कि कोई भी लेखक या कलाकार कभी मरता है? क्या कभी ‘काला पादरी', ‘वह मेरा चेहरा', ‘डायरी सागा सागा' और ‘सीढ़ियों पर चीता' नहीं रहेंगे? क्या वह कभी नहीं रहेगा, जो तुम रच कर गए हो, बल्कि वही तो तुम्हें अनश्वर बनाता है। क्या कभी वे कहानियां नहीं रहेंगी, जो तुमने लिखी हैं? जानते हो न, हर कहानी की नियति है अधूरापन। वह सिर्फ समय के एक हिस्से की बात कहती है, दूसरे हिस्सों के लिए दूसरी कहानियां गढ़नी और पढ़नी पड़ती हैं। यह वक्त के एक हिस्से की कहानी थी, जो तुमने जानी, जरूर कहीं बैठे हुए तुम वक्त के दूसरे हिस्से के बारे में लिख रहे होगे।

कुछ दोस्तियां बड़ी शाश्वत होती हैं, किसी के आने-जाने से उन पर कोई आंच नहीं आती। दूरियां दोस्ती को और मजबूत बनाती हैं। मैं यहां तुम्हारे घर खड़ी-खड़ी तुम्हारी सरदारों वाली हंसी सुन रही हूं ....

‘अरे यार जया .... अब यूएस से लौट भी आओ। तुम्हारा मन कैसे लगता है वहां? देखो दलजीत भी तुम्हें बहुत याद करती है...' 
मेरे हाथ दलजीत को थामे हुए हैं। वास्तव में हम सबको एक-दूसरे की बहुत जरूरत है। तुम ये बात जानते हो न?

तेजिंदर के पहले उपन्यास ‘वह मेरा चेहरा' का एक अंश
‘मैं हैरान हूं कि एक आदमी जो कि सीधे-सीधे यह हुक्म देता है कि उसकी बात न मानने वाले को गोली से उड़ा दिया जाए, उसे एक संत होने का दर्जा कैसे मिल सकता है?' गुस्से से आग-बबूला होते हुए एक बार उन्होंने मुझसे कहा था। उनका संकेत जरनैल सिंह भिंडरावाले की ओर था।

पिछले कुछ समय से भिंडरावाले को लेकर घर में भी काफी बातें होती थीं। एकाएक यह नाम कहीं से चोरी-छिपे घर में घुस आया था और दीवारों पर किसी रंग की तरह पुत गया था। मैं हैरान कि दीवारों के इस तरह गंदे होने पर पापा को कोई ऐतराज नहीं था। वे कहते कुछ नहीं थे। बस चुपचाप दीवारों पर लगातार फैल रहे इस रंग को देख रहे थे। मैं चाहता था कि वे अपने हाथों में ब्रश उठाएं और जो रंग उनके पास हैं, उनका इस्तेमाल करें, पर उन्होंने पता नहीं किस दिन के लिए अपने रंगों को बचाकर रखा था। उनका हिसाब बी जी की तरह सीधा नहीं था। बी जी का हिसाब हमेशा की तरह सीधा था। गुरुद्वारे में संगत के सामने गुरु ग्रंथ साहिब की उपस्थिति में, पंजाब से आए एक ग्रंथी ने कहा था- ‘सिख धर्म नू संकट तो बचाण लवी संत जरनैल सिंह भिंडरावाले ने अवतार धारण कीता ऐ।' बी जी ने इस बात को प्रसाद की तरह ग्रहण कर लिया था। ‘संगत तो गुरु का रूप होती है, उसके सामने कोई झूठ नहीं बोल सकता' बी जी ने घोषणा की थी। इसके बाद मेरी तमाम बातें उनके लिए बेमानी थीं। 

लेकिन पापा तब भी चुप रहे थे। शायद उनके लिए कोई निर्णय देना इतना आसान काम नहीं था- बी जी की तरह। वे बस दीवारों पर लगातार पुत रहे रंग को एक निरपेक्ष दृष्टि से देख रहे थे। सिर्फ पापा ही नहीं, हमारे अधिकांश परिचित सिख परिवारों में लगभग सब की हालत यही थी। जैसे कोई आदमी मेहमान की तरह हाथ में अटैची लिए आपका पता पूछते हुए, आपके घर चला आए और आप उसे पहचानते ही न हों।

सरदार हरबंस सिंह जैसे कम ही लोग थे, जो भिंडरावाले के बारे में खुलकर बोलते थे और न केवल बोलते थे, बल्कि विरोध में बोलते थे। सरदार हरबंस सिंह उस समय उन गिने-चुने लोगों में से थे जो कहते थे कि ‘ये भिंडरावाले सिख धर्म को बचाने आया है या बर्बाद करने, इसका पता उस दिन चलेगा जब यह लड़ाई शहरों की सड़कों और गलियों में लड़ी जाएगी।'

उस समय लोग उन्हें सनकी कहा करते थे। पर वह दिन जल्दी ही आ गया। एक नवंबर 1984 को उन्हें सरकार द्वारा खोले गए दंगा पीड़ितों के कैंप में लाकर छोड़ दिया गया। उनके पड़ोसी थे पंडित राममोहन पांडेय, जिन्हें सब प्यार से पंडित जी कहकर बुलाते थे। पांडेय जी ने एक नवंबर की रात टैक्सी बुलवाई और उन्हें पूरे परिवार समेत गुरुद्वारा नानकसर छोड़ आए। वापस आकर पंडित जी ने कहा, ‘इतने सालों के दोस्ताना संबंध और ऐसा मौका पड़ने पर घर पर भी नहीं रख सके सरदार जी को, गुरुद्वारे छोड़कर आना पड़ा।'

गुरुद्वारे से उन्हें कैंप पहुंचा दिया गया। चार दिन कैंप में रहने के बाद जब घर लौटे तो पूरा घर धू-धू कर जल चुका था। वह कुर्सी जिस पर वे पिछले तीस सालों से बैठते आए थे कमरे में चुपचाप एक तरफ लेटी थी, सिर्फ एक पाए के सहारे। रसोई में रखे स्टील के बर्तन आग में गलकर अपना आकार खो चुके थे। पिछले चार दिनों में जैसे उनकी रसोई में खाने के नाम पर सिर्फ आग ही परोसी गई हो और धुआं ही पिया गया हो।

जन्म: 10 मई,1951 (जालंधर)

निधन: 10 जुलाई, 2018 (रायपुर)

प्रमुख कृतियां: वह मेरा चेहरा, काला पादरी, सीढ़ियों पर चीता, हलो सुजीत (उपन्यास),

बच्चे अलाव ताप रहे (कविता संग्रह), डायरी सागा सागा (स्मृतियां)..

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  • Web Title:Shabd column of hindi hindustan news paper on 15th of july 2018