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आज के शब्द में पढ़ें : घाट और नदी

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हिंदी के जिन लेखकों ने अपनी कृतियो में देश-विभाजन से उपजी मानवीय त्रासदी का सबसे मार्मिक अंकन किया है, सैयद मोहम्मद ख्वाजा बदीउज्जमां  उनमें अग्रणी हैं। छाको की वापसी उनका सर्वाधिक चर्चित उपन्यास है, जिसमें विभाजन के बाद बिहार से पूर्वी पाकिस्तान गए मुसलमानों के अपनी जड़ों से उखड़ जाने की विवशता का सजीव चित्रण किया गया है। प्रस्तुत है इस उपन्यास का एक खास अंश-

ढल्लनसिंह! धोती-कमीज पहने दिन-भर मोहल्ले के एक सिरे से, दूसरे सिरे तक, मारा-मारा फिरता। मौलवी ने मस्जिद में कलमा पढ़वाकर यूसुफ खां नाम रख दिया था। लेकिन वह नाम चल नहीं सका। सब लोग ढल्लनसिंह ही कहते रहे। जब नियजनी से निकाह पढ़ाया गया था तो उस वक्त जरूर यूसुफ खां कहा गया था उसे। यह जरूरी समझा गया था। नियजनी मुसलमान थी। उसका निकाह यूसुफ खां से ही हो सकता था, ढल्लनसिंह से नहीं। शायद नियजनी के इश्क में पड़कर ही उसने बाप-दादा का मजहब छोड़ दिया था और नया मजहब कबूल कर लिया था।...

...किसी को पता नहीं कि यह घाट कब बना था। बहुत लम्बा समय गुजर चुका होगा इसे बने हुए। जाने कितनी पीढ़ियां इस पुराने घाट का इस्तेमाल कर चुकी थीं। कभी भी इसे दो हिस्सों में बांटने की जरूरत महसूस नहीं की गई थी। मुहल्ले के तमाम लोग नहाने-धोने के लिए इसी घाट का उपयोग करते थे। मुसलमानों का जनाजा भी इसी घाट की सीढ़ियों से उतरकर जाता था और हिन्दुओं की अरथी भी इसी घाट से होकर जाती थी। मुहल्ले के तमाम नशेबाज भी चाहे हिंदू हों या मुसलमान इसी घाट से नदी को पार करके पासीखाने पहुंचते थे।

फिर जाने क्या हुआ कि घाट को लेकर मुहल्ले के हिंदू और मुसलमान दो हिस्सों में बंटने लगे। एक-बार तो सिर-फुटौवल तक की नौबत आ गई थी। ढल्लनसिंह अपनी जान हथेली पर रखकर दोनों गिरोहों के बीच न आ गया होता तो यकीनन उस रोज अच्छा-खासा फसाद हो गया होता। जाने कितना खून-खराबा हो जाता। ढल्लनसिंह की किस्मत अच्छी थी कि जो बच गया उस दिन। वरना दोनों तरफ की तनी हुई लाठियों ने सबसे पहले उसका ही सफाया कर दिया होता। मामला उस वक्त तो रफा-दफा हो गया था और लाठियां चलते-चलते रुक गई थीं, लेकिन आग ठंडी नहीं पड़ी थी। किसी भी समय यह भड़क सकती थी। आखिरकार यही जरूरी समझा गया था कि घाट के दो हिस्से कर दिए जाएं। एक हिस्सा मुसलमानों का हो और दूसरा हिस्सा हिंदुओं का।

ढल्लनसिंह इस घटना के बाद कई बरस तक जीवित रहा। उसे बड़ा मलाल था इस बात का कि घाट को दो हिस्सों में फिजूल ही बांट दिया गया है। जब एक घाट से लोगों की जरूरतें पूरी हो रही थीं तो उसे दो हिस्सों में बांटना सरासर बेवकूफी नहीं तो और क्या थी? ढल्लनसिंह का कहना था कि अब मुहल्ले में हिंदू-मुसलमान दोनों में ही कुछ ऐसे दुष्ट लोग हो गए हैं जो लोगों को बहकाते-भड़काते रहते हैं। वह कहा करता था- ‘इन्हीं हरामजादों ने इतने अच्छे और खूबसूरत घाट को बंटवाकर उसका सत्यानाश करवा दिया है।’...

...वह अक्सर घाट की सीढ़ियों पर बैठा अपने आप ही बका करता- ‘सालो! घाट को बांटे हो तो नदी को भी बांटो ना! उसके बीच भी एक दीवार खड़ी कर दो। हवा को भी बांट दो एक दीवार खींचकर। देखें कितना गूदा है तुम्हारे अंदर!’

लोग ढल्लनसिंह की बातों को पागल का प्रलाप समझकर हंस दिया करते थे। लेकिन उसकी झुंझलाहट और गुस्से को बिलकुल बेमानी और अकारण भी तो नहीं कहा जा सकता। उसके दिमाग में घाट का वही पुराना नक्शा जमा हुआ था। बचपन से वह घाट को जिस शक्ल में देखता आया था, उसी शक्ल में उसे आज भी देखना चाहता था। लेकिन बीच में खिंची हुई दीवार ने उस नक्शे को बिगाड़कर रख दिया था। यह दीवार उसकी आंखों में कांटे की तरह खटकती थी। उसका बस चलता तो वह जरूर ही इस दीवार को उखाड़ फेंकता। 

लेकिन मुझ जैसे बहुत से लोगों के लिए जिनके दिमाग में पुराने घाट का कोई नक्शा नहीं है, विभाजित घाट ही एक सीधी-सादी हकीकत है। घाट पर खिंची हुई दीवार मुझे असहज या बेतुकी नहीं लगती। लेकिन ढल्लनसिंह जैसे लोगों को यकीनन यह बेतुकी लगती होगी।

लेकिन यह भी तो नहीं कहा जा सकता कि इस दीवार ने पुराने, अविभाजित घाट के अस्तित्व को ही खत्म कर दिया था। दीवार यह एहसास जगाए बगैर नहीं रहती थी कि कभी एक ही घाट था, जो अब दीवार की वजह से दो हिस्सों में बंटा नजर आता है।

घाट दो हिस्सों में बंट जरूर गया लेकिन अक्सर यह विभाजन अपना असर खोने लगता था। एक घाट के लोग नदी के लम्बे-चौड़े सीने पर तैरते हुए अक्सर दूसरे घाट पर पहुंच जाते थे। लेकिन जब झगड़े-फसाद का डर होता तो लोग अपने-अपने घाट पर ही जमे रहते, दूसरे घाट पर कदम न रखते। ऐसी स्थितियों में घाट को बांटने वाली दीवार सचमुच बहुत कारगर और सार्थक साबित होने लगती थी। 

हालांकि घाट का बंट जाना कोई ऐसे ताज्जुब की बात भी नहीं थी। जब मुहल्ला ही दो हिस्सों में बंटा हुआ था तो घाट का दो हिस्सों में बंटा होना ही स्वाभाविक लगना चाहिए था। ज्यादा ताज्जुब तब होता, जब दोनों हिस्सों के लिए एक ही घाट बना रहता। जिन लोगों ने एक घाट वाला जमाना नहीं देखा, उनको दो घाटों की मौजूदगी पर कोई आश्चर्य नहीं होता।

ढल्लनसिंह का कहना था कि सिर्फ घाट ही नहीं बंटा था और बहुत सारी चीजें भी बंटती रहती थीं। घाट की तो फिर भी एक ठोस शक्ल थी और उसका विभाजन आंखों से देखा नहीं जा सकता था। बहुत-सी चीजें भी बंट गई थीं जो आंखों से देखी नहीं जा सकतीं, सिर्फ महसूस की जा सकती हैं।

जब कभी ढल्लनसिंह के बारे में सोचने लगता हूं, एक बड़ा ही बेतुका, मूर्खतापूर्ण होने की हद तक बेतुका विचार, मेरे दिमाग को जकड़ लेता है। जाने कितनी बार मुहल्ले के दोनों हिस्से, एक-दूसरे के खून के प्यासे होकर आमने-सामने खड़े हो चुके हैं, दो दुश्मनों की भंगिमा लिए हुए... युद्ध के लिए तत्पर। ... दोनों हिस्से लाठी, भाले, तलवारें लिए, एक-दूसरे पर टूट पड़ने को तैयार हैं। ढल्लनसिंह किस तरफ से लड़ेगा? अर्जुन जैसा धर्म-संकट! कौन उबार सकता है ढल्लनसिंह को इस धर्म-संकट से? ... ढल्लनसिंह क्या था? हिंदू या मुसलमान? शायद न हिंदू था, न मुसलमान। शायद दोनों ही था वह। हिंदू भी था, मुसलमान भी। मरते समय, कैसी मुसीबत खड़ी कर दी थी उसने! सारा मुहल्ला जमा हो गया था, उसके चारों तरफ। बेहोशी की हालत में, औल-फौल बकने लगा था। कभी नियजनी को पुकारता था तो कभी अपनी मां को। कभी रोने लगता था तो कभी बहुत डरावने अंदाज में हंसना शुरू कर देता था। लोग चीख-चीख कर कह रहे थे-

‘अल्लाह का नाम लो ढल्लनसिंह, अल्लाह का नाम।’ लेकिन उसे कुछ सुनाई नहीं दे रहा था। 

कोई दौड़कर मस्जिद के पेश-इमाम को बुला लाया था। पेश-इमाम जोर-शोर से सुराए-यासीन पढ़ रहा था और ढल्लनसिंह से कहता जाता था- ‘अपने गुनाहों के लिए माफी मांगो खुदा से। तोबा करो सच्चे दिल से। जान आसानी से निकल जाएगी। तुम्हारी रूह, गुनाहों के बोझ से दबी हुई है ढल्लनसिंह! इसीलिए इतनी तकलीफ हो रही है, आखिरी वक्त में।’

लेकिन पेश-इमाम की नसीहतें भी अपना काम नहीं कर रही थीं। ढल्लनसिंह के मुंह से अल्लाह का लफ्ज एक बार भी नहीं निकला था।... और तब एकाएक, जैसे गोला फट गया हो। तमाम लोग सकते में आ गए थे। पेश-इमाम भी सुराए-यासीन पढ़ते-पढ़ते, रुक गया था और ढल्लनसिंह के चेहरे को भयभीत निगाहों से देखने लगा था। ढल्लनसिंह जोर-जोर से ‘राम! राम!’ कह रहा था। उसके गले से घर्र-घर्र की आवाज के साथ-साथ ‘राम-राम’ की ध्वनि निरंतर फूट रही थी। 

थोड़ी देर तक हैरत से सुनते रहने के बाद, कुछ लोगों ने ढल्लनसिंह से कहना शुरू कर दिया- ‘अल्ला का नाम ले ढल्लन। दोजख में जैबे का? मरे बखत अल्ला कहे को चाहे ई बखत।’

लेकिन ढल्लनसिंह होश में तो था नहीं जो यह सब सुन-समझ सकता। उसके दिमाग का वह हिस्सा जो विवेक के तकाजों को पूरा कर सकता था, शायद निष्क्रिय हो चुका था और अब सिर्फ वह हिस्सा ही सक्रिय था, जो बेतुकी और अजीबो-गरीब बातें ही सोच सकता है।

लोग कहते-कहते थक गए। ढल्लनसिंह की जबान पर अल्लाह का नाम न आना था, न आया। ‘राम-राम’ कहते ही, उसने आखिरी हिचकी ली। 

अजीब मसला पैदा कर दिया था ढल्लनसिंह की मौत ने। लोगों का कहना था कि वह मुसलमान नहीं मरा। जो आदमी ‘राम-राम’ कहते जान दे, उसे मुसलमान कैसे मान लिया जाए? और अगर वह मुसलमान नहीं था तो उसकी जनाजे की नमाज कैसे पढ़ी जाए, उसे दफन कैसे किया जाए? काफी बहसा-बहसी के बाद तय हुआ था कि कलमा पढ़कर मुसलमान तो हुआ ही था वह कभी। क्या पता बेहोशी की वजह से अल्लाह का नाम न ले सका हो। असली भेद तो खुदा ही जानता है। अच्छा है कि उसे मुसलमानी कायदे से ही दफन कर दिया जाए।

कहां गए वे लोग : सैयद मोहम्मद ख्वाजा बदीउज्जमां
सैयद मोहम्मद ख्वाजा बदीउज्जमां का जन्म 30 सितंबर 1928 को गया शहर में हुआ। प्रगतिशील लेखक आंदोलन से जुड़कर उन्होंने उर्दू और फिर हिंदी साहित्य में कदम रखा। विभाजन की पृष्ठभूमि में लिखा गया उनका उपन्यास ‘छाको की वापसी’ और प्रतीकात्मक शैली में लिखा गया उपन्यास ‘एक चूहे की मौत’ हिंदी साहित्य की कालजयी कृतियां हैं। एक विशाल कैनवस पर लिखा गया उपन्यास ‘सभापर्व’ उनके गुजर जाने के बाद सामने आया।  ‘अनित्य’, ‘पुल टूटते हुए’ और ‘चौथा ब्राह्मण’ उनके कहानी संग्रह हैं। बदीउज्जमां उर्दू, हिंदी, अंग्रेजी और उड़िया भाषाओं के विद्वान थे और इन भाषाओं के श्रेष्ठ अनुवादक भी। वे उस पीढ़ी के नुमाइंदे थे, जिसने मुल्क, खानदान और रिश्तों को टूटते देखा। बदीउज्जमां ने अपनी कलम के माध्यम से इस दुख को जुबान दी। पूरा वक्त साहित्य को दे सकें, इसकी फुर्सत जिंदगी ने नहीं दी। उन्होंने 16 मई, 1986 को इस दुनिया को अलविदा कहा। वे अकसर ये शेर गुनगुनाया करते थे— जान कर मिन जुमल: ए खासाने-मयखाना मुझे / मुद्दतों रोया करेंगे जामो-पैमाना मुझे। 

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