DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

घर के लिए बीवी या बीवी के लिए घर

shabd

अकेले आदमी को अपना मकान लेने में कितनी परेशानी होती है, इसका दर्द कोई दूसरा नहीं जान सकता। उससे तरह-तरह के सवाल पूछे जाते हैं। सबसे बड़ा सवाल तो यही होता कि वह शादीशुदा है या अकेला। उसका अकेला होना उसके लिए जी का जंजाल बन जाता है। अकेला होने के कारण उसे मकान नहीं मिलता और शादी इसलिए नहीं हो पाती कि उसका अपना घर नहीं है। एक आदमी शादी और घर के नाम पर किस तरह ठगा जाता है, इस पर करारा व्यंग्य है अफगानिस्तान के मशहूर कथाकार जलाल नूरानी की लिखी यह कहानी

लगभग साल गुजरने को आया, मैंने उसे नहीं देखा था। वह मेरा अजीजी दोस्त था। मैं सिर्फ उसके व्यवहार का प्रशंसक नहीं था बल्कि हर विषय पर उसकी गहरी सूचनाओं से भी बड़ा प्रभावित था। वह बहुत धीरे-धीरे नपे-तुले अंदाज से बात करता था। जब मैं उससे अरसे बाद टकराया तो पूछ बैठा, ‘एक साल पहले जब हम मिले थे तो तुमने कहा था तुम शादी करनेवाले हो? क्या हुआ...शादी कर ली?’
इससे पहले कि वह कुछ जवाब देता मैं पहले की तरह बोलता गया, ‘तो कर ही डाली शादी—तभी दोस्तों से इतनी दूरी कर ली?’
मेरी बात सुनकर उसने आह भरी और धीरे से कहा, ‘नहीं...अफसोस! मैं अभी तक शादी नहीं कर पाया हूं...जानते तो हो, मेरे पास मेरा अपना घर नहीं है।’
‘इससे क्या फर्क पड़ता है।’ मैंने कहा, ‘क्यों फर्क नहीं पड़ता... बिना घरवाले मर्द को कोई लड़की देता है क्या?’
 ‘ऐसी बातें मत करो...मेरे पास भी मकान नहीं है। अगर ऐसा है तब तो मैं उम्र के आखिर तक कभी शादी ही नहीं कर पाऊंगा? क्योंकि मेरे पास घर नहीं है और घर का मालिक भी कभी नहीं बन पाऊंगा?’
हम दोनों एक जगह बैठकर दिल के जख्म एक-दूसरे को दिखाने लगे। उसने आहिस्ता-आहिस्ता उस दिन का किस्सा कहना शुरू किया जब वह लड़की देखने गया था।
‘जानते हो मैं जब अपनी पसंद की लड़की के घर शादी का पैगाम लेकर गया तो लड़की की मां ने पहला सवाल मुझसे पूछा, ‘तुम्हारे पास अपना घर है?’ मैंने सर न में हिलाते हुए कहा, ‘जी नहीं...मैं...मैं मकान किराए पर लूंगा और...’ ‘अय हय, बस बस...मैं इस बात पर किसी तरह से राजी नहीं हूं कि मेरी नाजों पली बेटी किराए के मकान में रहे।’ मैंने दुख से पूछा, ‘मेरा क्या होगा अब?’  ‘पहले तुम एक अच्छा घर ले लो फिर मेरी बेटी का हाथ मांगने आओ...लड़के तो तुम शरीफ नजर आते हो...तालीमयाफ्ता हो...मुझे तुम हर तरह से पसंद आए हो, मगर मैं लड़की का हाथ तुम्हारे हाथ में तभी दूंगी जब तुम्हारा खुद का मकान हो।’
मेरे पास इसके अलावा कोई चारा नहीं रह गया था कि मैं खुद का मकान खरीदूं...पैसा पास न था...समझ नहीं पा रहा था कि क्या करूं? उस बिल्डर के पास पहुंचा,जो बना-बनाया घर सस्ती कीमत पर गरीबों को बेचता था। उसके दफ्तर में एक आदमी मेज के पीछे बैठा था। उसने मुझे ऊपर से नीचे तक घूरा और पूछा, ‘मैं तुम्हें किस्तों पर घर दे सकता हूं पहले तुम इस फार्म को भरकर मुझे दो।’ मेरी बात सुनकर वह बोला।
फार्म में औरत और रिश्तेदारों के बारे में अनेक सवाल थे। मैंने उसे शुरू से पढ़ना शुरू किया और हर सवाल के आगे लिखता गया-मेरे पास नहीं है...मेरे पास नहीं है। उस आदमी ने जब उस फार्म पर नजर डाली, उसकी भवें एक-दूसरे से जुड़ने लगीं और वह बोल उठा, ‘नहीं रखते हो?’ ‘क्या चीज?’ ‘बीवी...बेटे।’ ‘नहीं जनाब, बीवी तो मेरे पास नहीं है।’ ‘क्यों भला क्यों नहीं रखते हो?’
मैंने कहा, ‘जनाब नहीं रखता।’ मेरे जवाब से वह गुस्सा हो गया तो भी उसका इसरार था, ‘क्यों नहीं है बीवी तुम्हारे पास!’ उसके इस सवाल से मेरी गैरत जाग गई और मैंने गुस्से से जवाब दिया, ‘आपको मेरी बीवी से क्या लेना देना...नहीं रखता...नहीं रखता।’ ‘फिर नहीं दूंगा।’ ‘क्यों नहीं देंगे।’ मैंने पूछा। ‘तुम्हें घर नहीं दिया जा सकता है...क्योंकि हमारी कुछ शर्तें हैं, जिसमें एक शर्त यह भी है कि हम तन्हा आदमी की जगह शादीशुदा आदमी को घर किस्तों पर देते हैं।’ मैंने खुशामदी लहजे में बड़ी मिन्नतभरी आवाज में कहा, ‘जनाब आप घर दे देते ताकि मैं भी खानदानवाला, शादीशुदा हो जाता।’ ‘नहीं, पहले शादी करो फिर आना मैं तुमको घर जरूर दूंगा।’ ‘आखिर क्या करूं मैं? मेरे पास घर नहीं तो कोई लड़की देने को तैयार नहीं है।’ ‘हमारी शर्त को जब तक पूरी नहीं करोगे, तब तक हम तुम्हें घर नहीं दे सकते।’
‘मेरे ऊपर जुल्म न करें जनाब! मेरा शादी करने का दिल बहुत चाह रहा है आप मजबूरी समझें मेरी और मदद करें ताकि मैं शादी कर सकूं।’ इस बार मेरी बात सुनकर वह आगबबूला हो उठा।
‘क्या समझ रखा है मुझे तुमने?’ मेरी क्या मजबूरी है, जो मैं तुम्हारी मदद करूं ताकि तुम शादी कर सको।
‘मेहरबानी करके गलत न सोचें मेरी सिर्फ आपसे इतनी इल्तजा थी कि आप घर दे देते तो वह मुझे लड़की दे देंगे। आप मकान नहीं देंगे तो वह लड़की नहीं देंगे...जनाब! मेरी होनेवाली सास ने साफ शब्दों में कह दिया है कि वह अपनी लड़की उसी लड़के से ब्याहेगी, जिसके पास उसका खुद का घर होगा। आप घर नहीं देंगे तो वह मेरी सास नहीं बन पाएंगी और मैं कुंवारा रह जाऊंगा। लड़की की जुदाई से जाने मेरा क्या हाल हो?’ मेरी इन बातों का उस आदमी पर कोई असर नहीं हुआ, वह सिर्फ एक चीज जानता था—वह थी किस्त पर दिए जानेवाले घर की शर्तें। मैं मजबूर और नाउम्मीद वहां से लौटा और अपनी होनेवाली सास के पास पहुंचा और सारी बारीकियां बताते हुए उनसे कहा, ‘खाला जान!’ मेरे संबोधन से उनकी भवें तन गईं। लगा कि उन्हें अच्छा नहीं लगा अपने को खालाजान कहलवाना। मेरी होनेवाली सास देखने में अभी जवान लगती थीं और पहले के हुस्न को जैसे-तैसे उन्होंने बचाकर रखा था। ऊपर से फैशन भी करती थीं। मैंने घूंट भरा और अपना कहना जारी रखा, ‘बीबी जान! किस्तों पर मकान तभी मिलेगा, जब उसकी शर्त पर मकान लेनेवाला पूरा उतरे। इसलिए पहले शादी करना मकान लेने के लिए जरूरी है।’ मेरे मुंह से शर्त की बात सुनकर उन्होंने भी अपनी शर्त दोहरा दी, ‘मैं लड़की उसी लड़के को दूंगी जिसका अपना घर हो।’
‘वह यकीन दिला रहे हैं कि इधर शादी करो उधर घर ले लो।’
‘मुझे नहीं पता तुम से कौन क्या कह रहा है और क्या नहीं कह रहा है। मुझे सिर्फ इतना पता है कि जो मकानवाला है, वही मेरी बेटी का शौहर बननेवाला है।’
उनकी बात सुनकर मैं बेचारा-सा हो गया। फिर उस आदमी के पास पहुंचा और अपनी इल्तजा दोहराई। उसने कान नहीं धरा मैं भी खिसिया गया और नतीजा वही निकला जो पहले था। मुझे सोचना पड़ा कि इस मुश्किल को गुस्से से हल नहीं किया जा सकता है। एक तरकीब समझ में आई कि अगर मेरी होनेवाली सास साहिबा उस आदमी से मिलकर मेरी जबानी जमानत दें तो मुझे मकान भी मिल सकता है और पसंद की बीवी भी। आखिर मेरी कोशिश रंग लाई और मेरी सास दफ्तर जाकर उस आदमी से मिलने पर राजी हो गईं।
कहानी यहां तक पहुंची थी कि मेरा दोस्त किस्सा सुनाते-सुनाते गहरी सांसें लेकर चुप हो गया। तो मैंने बेचैनी से कहा, ‘आगे कहो न क्या हुआ? जब बात नाजुक मोड़ पर पहुंची तो तुमने चुप साध ली है। अब बता नहीं रहे हो कि शादी हुई या नहीं।’
‘हां शादी हुई।’ उसने एक गहरी सांस ली और कहा, ‘मगर इस शादी में दामाद मैं नहीं था।’
‘क्या?...फिर दामाद कौन था?’
‘वही आदमी!’
‘और दुल्हन कौन थी?’
‘दुल्हन भी मेरी विधवा सास थी।’
‘अजीब, यह सब कैसे घटा?’
‘तभी जब मैंने अपनी होनेवाली सास को उस आदमी से मिलने पर राजी किया था जो शर्तें लगा रहा था, मेरी होनेवाली सास और बिल्डर ऑफिस का वह आदमी कई मुलाकातों के बाद इस फैसले पर पहुंचे...अपनी जिंदगी के बारे में...यह विधवा थी। उसकी बीवी मर चुकी थी। दोनों तन्हा थे। एक-दूसरे को राजी कर बैठे।’
‘इसके बाद तुम्हारी किस्मत का फैसला?’
‘वह अपनी जिंदगी की खुशियों में इस तरह डूब गए कि मुझे पूरी तरह भूल गए।’
‘तुम्हारा क्या बना?’
‘मैं आज भी उसी तरह बिना बीवी के हूं जैसा पहले था।’
‘खूब! अब क्या सोचा?’
‘अब मेरी हिम्मत ही नहीं पड़ती है कि किसी दूसरी लड़की के पैगाम के लिए। डरता हूं वहां भी लड़की की मां विधवा हुई और मैं वसीला बन गया उनकी मंजिल तक पहुंचने का तो? अब यह बात मैं पक्की तौर पर समझ चुका हूं कि मेरी शादी होना मुश्किल है, मगर मेरे बहाने दूसरों का रास्ता खुलना आसान है।’
(नासिरा शर्मा द्वारा संपादित एवं अनूदित, ‘लोकभारती’ से प्रकाशित ‘एफ्रो-एशियाई कहानियां’, खंड-2 से)

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:read afghanistan kathakar Jalal Noorani story ghar ke liye biwi ya biwi ke liye ghar