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पोलिश लेखिका ओल्गा तोकर्जुक को 'फ्लाइट्स' के लिए मिला बुकर पुरस्कार, पढ़ें इसका अंश

Illustration - Nitesh Chaudhary

प्रसिद्ध पोलिश लेखिका ओल्गा तोकर्जुक को उनके उपन्यास ‘फ्लाइट्स' के लिए वर्ष 2018 का प्रतिष्ठित मैन बुकर इन्टरनेशनल पुरस्कार देने की घोषणा की गई है। यह सम्मान पाने वाली वह पहली पोलिश लेखिका हैं। फ्लाइट्स उनका छठवां उपन्यास है और इसमें लेखिका ने शरीर रचना विज्ञान के माध्यम से जीवन और मृत्यु को लेकर कथा रचना की है। हिन्दुस्तान के लिए इसी उपन्यास के एक अंश का अंग्रेजी से हिन्दी में अनुवाद किया है प्रभात रंजन ने-

1542 नए युग की शुरुआत थी। वैसे दुर्भाग्य से इस बात की तरफ किसी ने खास ध्यान नहीं दिया। वह कोई बड़ा साल नहीं था, न ही शताब्दी का अंत। अंक ज्योतिष के नजरिये से कुछ भी नहीं था, बस अंक तीन का साल था। तो भी उस साल कोपरनिकस की किताब ‘ऑन द रिवोल्यूशंस ऑफ द हेवनली स्फेयर्स' का पहला अध्याय आया और वेसलियस की किताब ‘ऑन द फैब्रिक ऑफ ह्युमन बॉडी' प्रकाशित हुई। 

कहना गैर जरूरी है कि दोनों में से किसी भी किताब में सब कुछ नहीं था- लेकिन क्या किसी भी चीज में कभी सब कुछ हुआ है? फ्रांसीसी क्रांति की पूर्व संध्या पर कोपरनिकस में शेष सौर मंडल की चर्चा नहीं थी, यूरेनस जैसे ग्रहकी,जो अभी खोजे जाने के सही समय का इंतजार कर रहा था, जबकि वेसलियस की किताब में मानवीय शरीर को लेकर कुछ विशिष्ट यांत्रिक समाधान नहीं थे, फैलावों, जोड़ों के बारे में, इस संबंध में बस एक उदाहरण काफी है, वह नस जो पिंडली को एड़ी से जोड़ती है। 

लेकिन दुनिया का आंतरिक और बाहरी नक्शा पूरी तरह बन चुका था, और एक बार देखने पर वह क्रम, जो बुनियादी रेखाओं तथा सतहों के माध्यम से तैयार किया हुआ था, दिमाग में बस जाता था। मान लीजिये नवम्बर 1689 की किसी दोपहर की बात है। फिलिप वेरहेयेन वही काम कर रहा है, जो वह अक्सर करता है, मेज पर बैठा हुआ है, खिड़की से रोशनी आ रही है, मानो वह खास इसी उद्देश्य से आ रही हो। वह मेज की सतह पर फैले ऊतकों को देखता है, लकड़ी में लगे हुए पिन से खराब कोशिकाओं को सही जगह पर रखता है। अपने दायें हाथ से, बिना कागज की तरफ देखे वह जो देखता है उसका रेखाचित्र बनाता है। 

देखने का मतलब आखिरकार जानना ही तो होता है। लेकिन अब कोई दरवाजे को जोर-जोर से ठकठका रहा है, और कुत्ता जोर-जोर से भोंकने लगा है, फिलिप को उठना होगा। वह उठना चाहता नहीं है। उसके शरीर ने उसकी पसंदीदा मुद्रा बना ली है, नमूने के ऊपर उसका सिर झुका हुआ है; अब उसको अपने बनावटी पैर के ऊपर झुकने की जरूरत है, और मेज के नीचे से उसको निकालना है, जो लकड़ी के खूंटे जैसा है। वह लंगड़ाते हुए दरवाजे के पास जाता है, जहां वह कुत्ते को शांत करवा पाने में सफल होता है। दरवाजे पर एक नौजवान खड़ा है, जिसको वेरहेयेन काफी देर तक देखने के बाद पहचान पाता है। वह उसका विद्यार्थी विलेम वान होर्सेन है। इस *तरह मिलने आने वालों से वह शायद ही खुश होता था, वैसे तो उसको किसी के आने से खुशी नहीं होती है। फिर भी वह एक कदम पीछे हो जाता है। दरवाजे के पास पत्थर की सतह पर उसके लकड़ी के पैर ठक-ठक बजने लगते हैं, वह मेहमान को अंदर बुलाता है।

वान होर्सेन लम्बा है, बाल घने घुंघराले हैं, और खुशमिजाज चेहरा। वह रसोई में जाता है और रास्ते में उसने जो भी खरीदा था मेज पर सब रख देता है। चीज का पहियाकार टुकड़ा, पाव रोटी का टुकड़ा, सेब और वाइन। वह जोर-जोर से बात करता है, टिकटों के बारे में डींग मारता है। इसी वजह से वह आज यहां आया है। फिलिप को इसके लिए कोशिश करनी पड़ती है कि उसके चेहरे से इस बात की चिढ़ न दिखाई दे, जो उस आदमी के दांत दिखाने से उसको हो रही है, जो इतने शोर-शराबे के साथ आया है। वह अनुमान लगाता है कि इस आदमी के आने का कारण वह चिट्ठी है, जो दरवाजे के पास बड़ी मेज पर पड़ी हुई है, लिफाफा अभी तक बंद पड़ा है। वैसे लड़का भला है। जब मेहमान खाने का सामान रखकर बाहर निकलता है तो मेजबान बड़ी सावधानी से चिट्ठी को छिपा देता है, अब वह कोशिश करेगा कि ऐसे जताए मानो उसे मालूम हो कि इस चिट्ठी में क्या लिखा है। 

वह यह भी जताएगा कि वह अपने लिए कोई परिचारिका अभी तक खोज नहीं पाया है, हालांकि सच बात तो यह है कि उसने खोजने की कोशिश की ही नहीं है। वह जताएगा कि आगंतुक जितने नाम लेगा वह सबको जानता हो, हालांकि उसकी याददाश्त उतनी अच्छी नहीं है। यूनिवर्सिटी ऑफ ल्युवें में वह रेक्टर है, लेकिन अपने स्वास्थ्य की शिकायत करते हुए वह यहां गांव में पड़ा है। 

दोनों मिलकर आग जलाते हैं और खाने के लिए बैठ जाते हैं। मेजबान हिचकते हुए खाना खा रहा है, जबकि एक बात साफ दिखाई देती है कि हर कौर के साथ उसकी भूख और बढ़ती जा रही है। चीज और मांस (मीट) के साथ वाइन पीना बहुत अच्छा लग रहा है। वान होर्सेन उसको टिकट दिखाता है। दोनों उसको चुपचाप देखते हैं। उसके बाद फिलिप खिड़की के पास जाता है, जिससे वह अपने चश्मे के लेंस ठीक करके वह बारीक रेखाचित्र और लिखावट को अच्छी तरह से देख सके। कारण यह है कि टिकट भी अपने आप में कलाकृति है, ऊपर की लिखावट के नीचे मास्टर रुयस्च का रेखांकन बना हुआ है, जिसमें कि हड्डियों का रेखाचित्र है।

चित्र में दो ढांचे पत्थरों और सूखे समुद्र तट के रेखाचित्र के पास बैठे हैं। उनके हाथ में कुछ वाद्य यंत्र हैं, एक तुरही जैसा लग रहा है तो दूसरा थोड़ा बीन जैसा लग रहा है। रेखाओं के जाल को ध्यान से देखने पर और भी अधिक हड्डियां और खोपड़ी दिखाई देती हैं, महीन और बारीक, और कोई भी ध्यान से देखने पर निश्चित रूप से यह समझ जाएगा कि उसमें और भी छोटी-छोटी आकृतियां बनी हुई हैं। 

‘यह सुन्दर है,नहीं?' मेहमान मेजबान के कंधे के पीछे से देखते हुए पूछता है। 

‘इसमें ऐसा क्या है?' फिलिप वेरहेयेन बेपरवाही से जवाब देता है। ‘इंसान की हड्डियां। ‘यह कला है।' 

लेकिन फिलिप बहस में नहीं उलझता। उस वेरहेयेन से बिल्कुल अलग है उसका यह रूप, वान होर्सेन जिसको यूनिवर्सिटी के दिनों से जानता था। बातचीत में रवानी नहीं आ पा रही है, और आपको ऐसा लग सकता है कि मेजबान किसी और चीज में खोया हुआ है। शायद अकेलेपन ने उसके ख्यालों को बहुत अधिक उलझन भरा बना दिया है, और उसे अपने आप से ही बातचीत करने का आदी बना दिया है। 

‘क्या आपके पास अभी भी है, फिलिप?' उसका पुराना विद्यार्थी कुछ रुककर पूछता है। 

वेरहेयेन की प्रयोगशाला उस घर से सटे एक दूसरे घर में है, प्रवेश द्वार के पास एक दरवाजा है, जिससे होकर वहां पहुंचा जा सकता है। अन्दर का माहौल देखकर उसको अधिक हैरानी नहीं हुई, किसी नक्काश की कार्यशाला जैसा लग रहा है, खूब सारी तश्तरियां वहां रखी हुई हैं, नक्काशी करने वाली कठौतियां, दीवार से टंगी हुई एक जोड़ा छेनी, तैयार प्रिंट हर तरफ सूखते हुए, और फर्श पर बिखरी हुई रस्सियां। मेहमान अनजाने में कागज के छपे हुए टुकड़े के ऊपर चलकर आगे बढ़ जाता है। उनके ऊपर मांसपेशियां, रक्त शिराएं, स्नायु और नाडि़यां बनी हुई हैं। 

दक्षिण की तरफ जो बड़ी सी खिड़की है वहां एक साफ बड़ी मेज पड़ी है। उसके ऊपर वही नमूना रखा हुआ है, जो वहां बरसों से पड़ा हुआ है। उसके बगल में एक बड़ी शीशी पड़ी है, जिसमें पीले रंग का रंग भरा है, एक तिहाई। 

‘तुम अगर कल एम्सटर्डम जा रहे हो तो जरा यह सब साफ करने में मेरी मदद कर दो', फिलिप ने कुछ माफी के अंदाज में कहा: ‘मैं काम कर रहा हूं।'

वह अपनी लम्बी उंगलियों से बड़ी सफाई से शिराओं से ऊतकों को बेहद छोटी सुइयों की मदद से निकालने लगता है। उसके हाथ उतने ही तेज और हल्के काम कर रहे हैं, जैसे तितली पकड़ने वाले के हाथ हों, न कि किसी शरीर रचना विज्ञानी के। वान होर्सेन ने टिंचर की एक शीशी पकड़ रखी है, जिसमें नमूने के कुछ हिस्से पारदर्शी, हल्के भूरे द्रव्य में ऐसे गिर रहे हैं, मानो घर वापस आ रहे हों। 

‘जानते हो यह क्या है?' फिलिप अपनी गुलाबी उंगलियों के नाखून से हड्डी के ऊपर एक हल्के से तत्त्व की तरफ इशारा करते हुए पूछता है। ‘छूकर देखो।' 

वह समझ तो नहीं पाता है, लेकिन अनुमान लगाता है: यह पुट्ठे के पास की नस है, उसका हिस्सा।'

‘अब से इसको पिंडली नस कहा जाएगा,' 

वान होर्सेन उसके साथ उन दो शब्दों को ऐसे दोहराता है मानो याद कर रहा हो .... ‘पिंडली नस!'

कोई किसी चीज की खोज करता है और उसका नाम रख देता है। उसे जीतकर सभ्य बना देता है। हड्डी का एक छोटा सा हिस्सा अब हमारी किताब का हिस्सा बन जायेगा।

लेकिन उस समय वान होर्सेन का ध्यान सबसे अधिक उसके नाम की तरफ गया। वह मूलत: कवि है, मेडिकल की शिक्षा के बावजूद वह कविताएं लिखना पसंद करता है। इस नाम ने उसके दिमाग में अनेक छवियां जगा दीं, मानो वह किसी इतालवी पेंटिंग को देख रहा हो, जिस पर खूब सारी सुंदरियों और देवताओं के चित्र बने हुए हों।

इसका नाम कुछ और बेहतर होना चाहिए! 

पोलिश भाषा के लिए मिला पहली बार बुकर

29 जनवरी 1962को जन्मी पोलैंड की प्रसिद्ध लेखिका ओल्गा तोकर्जुक को 2018 का प्रतिष्ठित मैन बुकर इन्टरनेशनल पुरस्कार देने की घोषणा हुई है। यह पुरस्कार उनको उनके उपन्यास ‘फ्लाइट्स' के अंग्रेजी अनुवाद के लिए दिया गया है। पुरस्कार के लिए जिन किताबों का चयन किया गया था, उनमें सभी अंग्रेजी में अनूदित थीं। ओल्गा यह प्रतिष्ठित पुरस्कार हासिल करने वाली पोलिश भाषा की पहली लेेखिका हैं। मूलत: कवयित्री ओल्गा की पहचान पोलैंड की एक मुखर बुद्धिजीवी की है और वहां की दक्षिणपंथी राजनीति के खिलाफ उनकी आवाज बेहद बुलंद रही है। उनके उपन्यासों के विषय समकालीन जीवन संदर्भों से जुड़े और विषयवस्तु में बहुत अलग होते हैं।

यह लोकप्रियता का ही नतीजा था कि पिछले साल ‘फ्लाइट्स' जब ब्रिटेन में प्रकाशित हुआ तो प्रकाशक ने उन्हें ‘सबसे महान जीवित लेखिका' का दर्जा दे डाला। वे पोलैंड जैसे पितृसत्तात्मक और तेजी से प्रतिक्रियावाद की ओर बढ़ रहे देश में नारीवादी स्वर की मुखर मिसाल हैं। उनके उपन्यास ‘ड्राइव यॉर प्लो ओवर द बोन्स ऑफ द डेड' पर बनी फिल्म बर्लिन फिल्म फेस्टिवल में पुरस्कृत भी हुई, हालांकि देश में इस पर विवाद भी खूब हुआ।

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  • Web Title:Polish writer Olga Tokarczuk received the Booker Prize for Flights read a part of it