हिन्दी दिवस 2018- पं. बाबूराव विष्णु पराड़कर: नए शब्द गढ़ने वाला शिल्पी
पं. बाबूराव विष्णु पराड़कर हिंदी पत्रकारिता के भीष्म पितामह कहे जाते हैं। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान हिंदी पत्रकारिता को जनजागरण के हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया, तो आजादी के बाद इसे नव...

पं. बाबूराव विष्णु पराड़कर हिंदी पत्रकारिता के भीष्म पितामह कहे जाते हैं। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान हिंदी पत्रकारिता को जनजागरण के हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया, तो आजादी के बाद इसे नव भारत के निर्माण के लिए युवाओं को प्रेरित करने का जरिया बनाया। छोटे-छोटे वाक्यों में सहज रूप से जनता तक अपनी बातें पहुंचाने में उनका कोई सानी नहीं था। इस क्रम में उन्होंने न सिर्फ हिंदी को कई यादगार शब्दों की सौगात दी, बल्कि लेखन की नई शैली भी विकसित की।
बाबूराव विष्णु पराड़कर का जन्म 16 नवंबर 1883 को वाराणसी में बसे एक मराठी परिवार में हुआ था। संस्कृत में शुरुआती पढ़ाई के बाद उन्होंने वर्ष 1900 में भागलपुर से मैट्रिक की परीक्षा पास की। 1906 में ‘हिंदी बंगवासी’ के सहायक संपादक के रूप में पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखा। भाषा की सेवा की चाह के चलते कोलकाता के नेशनल कॉलेज में हिंदी और मराठी भी पढ़ाने लगे। यह बात 'हिंदी बंगवासी’ के प्रबंधक को नागवार गुजरी। उनकी आपत्ति के बाद पराड़कर जी ने 'हिंदी बंगवासी’ छोड़ दिया। 1907 में वे बतौर संपादक ‘हितवार्ता’ से जुड़ गए। इसमें राजनीतिक विषयों पर सरल भाषा में लिखे उनके गंभीर समीक्षात्मक लेख काफी सराहे गए। क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़े होने के चलते कई वर्षों तक जेल में रहने के बावजूद उन्हों हिंदी की सेवा जारी रखी।
‘भारतमित्र’, ‘आज’ और ‘संसार’ जैसे समाचारपत्रों को बुलंदियों तक पहुंचाने का श्रेय पराड़कर जी को ही है। वे गीता की हिंदी टीका और प्रख्यात बांग्ला पुस्तक ‘देशेर कथा’ के हिंदी में बेहद प्रभावी अनुवाद के लिए भी जाने जाते हैं। 12 जनवरी 1955 को वाराणसी में उनका निधन हो गया। -पारुल श्रीवास्तव
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