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स्मृति शेष : उस जज्बा-ए-जुनूं के क्या कहने

प्रख्यात पाकिस्तानी शायरा फहमीदा रियाज़   (पोट्रेट: नितेश चौधरी)

प्रख्यात पाकिस्तानी शायरा फहमीदा रियाज़ अपनी बेबाकी और जुझारूपन के कारण जितना विवादों और चर्चाओं में रहीं, उतनी ही संजीदगी से अपनी रचनाशीलता में जुटी रहीं। पाकिस्तान का निजाम उनसे खार खाए रहता तो भारत, खासतौर से दिल्ली उनके दिल में बसती, उन्हें घर जैसी लगती। वे पाकिस्तान से सवाल करतीं, भारत के मसले उन्हें बेचैन करते। उनका जाना भारतीय उपमहाद्वीप की एक मुखर आवाज का खो जाना है। वरिष्ठ कवि मंगलेश डबराल का यह स्मृति आलेख- 

इस महाद्वीप में कई ऐसे कवि और लेखक हुए हैं, जिन्हें भाषाई सांचों में, हिंदी या उर्दू के खानों में बांट कर देखना मुश्किल है। उनके इजहार की भाषा जो भी हो, वे एक ही तहजीब के हिस्से हैं। फैज अहमद फैज, मंटो, इस्मत चुगताई, कृष्ण चंदर, राजेन्द्र सिंह बेदी, कुर्रतुल एन हैदर, इंतजार हुसैन, कृष्णा सोबती, हबीब जालिब, अहमद फराज ऐसी ही हस्तियां रही हैं, जिनमें से ज्यादातर को सियासी हुकूमतों के जुल्म भी सहने पड़े। फहमीदा रियाज़ इसी विरसे की शायर, गद्यकार और नारीवादी विचारक थीं और उन्हें भी पाकिस्तान में फौजी तानाशाह जिया-उल-हक के दौर में कई मुकदमे और जलावतनी झेलनी पड़ी। 

पिछली सदी के नौवें दशक में सात साल तक फहमीदा ने अपने पति और जुल्फिकार अली भुट्टो की पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के सक्रिय कार्यकर्ता जाफर अली उजन और दोबच्चों के साथ दिल्ली में जलावतनी में बिताये। उन्हें प्रसिद्ध पंजाबी कवि अमृता प्रीतम के अनुरोध पर इंदिरा गांधी ने बुलाया था। पाकिस्तान सरकार ने उनकी पत्रिका ‘आवाज़’ को बंद कर उन पर दस मुकदमे थोप दिए थे। उन्हीं दिनों कराची से प्रकाशित पत्रिका ‘आज’ के जाने-माने संपादक अजमल कमाल ने ‘ग्यारह हिन्दुस्तानी शायर’ नाम से भारतीय कविता का एक संकलन अनूदित और प्रकाशित किया था, जिसमें अमृता प्रीतम से पंकज सिंह और इन पंक्तियों के लेखक तक की कवितायें थीं। एक मुलाकात में फहमीदा ने वह किताब देखकर अपने पास रख ली और कहा, ‘मैं अब इसे वापस नहीं करूंगी। इसकी जगह मेरे दिल में है। यह मुझे हिन्दुस्तान की जबानों से जोड़े रखेगी।’ 

फहमीदा को हिन्दुस्तान से दिली मुहब्बत थी। हिन्दीभाषी समाज से, उसके कवियों-बुद्धिजीवियों, उसकी सियासी सरगर्मियों से एक ऐसा लगाव, जिसे देख कर लगता नहीं था कि वे विदेशी और वह भी ऐसे मुल्क की हैं, जिसकी सरकारों से हमारी सरकारों के रिश्ते हमेशा छत्तीस के रहते हैं। जलावतनी के दौर में उनकी बहुत सी नज्में और गजलें हिंदी में छपीं और उन्हीं दिनों उन्होंने हिन्दुस्तान-पाकिस्तान और वहां औरतों के हालात पर ‘गोदावरी’ नाम से एक रिपोर्ताज-उपन्यास भी लिखा, जो बाद में प्रकाशित हुआ। जब भी मौका हाथ आता, वे दिल्ली आना नहीं भूलतीं। उनकी नज्म ‘दिल्ली तिरी छांव’ बताती है कि दिल्ली से वे कैसा नाता महसूस करती थीं। सच तो यह है कि  ऐसा ही नाता वह पूरे हिन्दुस्तान से महसूस करती थीं। इस प्यार और पाकिस्तानी फौजी हुक्मरानों से उनकी चिढ़ की बड़ी वजह तो यही थी कि वे लोकतंत्र, सेकुलरवाद और मार्क्सवाद से गहरे प्रभावित थीं और उनका नारीवाद भी खासा जुझारू था। दूसरी वजह शायद यह कसक थी कि मेरठ  में पैदा होने के बावजूद उन्हें पाकिस्तान जाना पड़ा, क्योंकि उनके पिता अविभाजित भारत में लाहौर में सरकारी नौकरी करते थे। पाकिस्तान में उन्हें आजादी व लोकतंत्र की खुली हवा में रहने का मौका नहीं मिला, इसलिए भी हिन्दुस्तान और दिल्ली आना उन्हें हमेशा अच्छा लगता था। हर बार उनसे मिलना एक ऐसी महिला से मिलना था, जो दमखम और हिम्मत वाली है, जो तानाशाहों और उन्मादी शासकों का सामना करने को हर वक्त तैयार है, फिर भी अपने तईं बहुत खुश और मुक्त है। उनके  व्यक्तित्व में प्रसन्नता और जुझारूपन, दोनों गुण इस तरह घुले-मिले थे कि देखकर आश्चर्य होता था। 

फहमीदा रियाज़ सिगरेट बहुत पीती थीं, लेकिन माचिस शायद ही कभी अपने पास रखती थीं। सभाओं, गोष्ठियों,  दोस्तों के बीच कहती भी मिलतीं कि अरे भई, कोई मेरे लिए माचिस ला दो। मुझे याद है एक बार किसी कांफ्रेंस हाल में कोई साहित्यिक बैठक चल रही थी, जिसमें  सार्क देशों के प्रतिनिधि भी थे। पाकिस्तान दूतावास के कुछ आला अधिकारी, वहां की सरकार में सांस्कृतिक ओहदों पर बैठे लोग भी थे। फहमीदा हम कुछ लोगों को लेकर एक अलग कोने की मेज पर बैठी सिगरेट पी रही थीं। उन दिनों ऐसी जगहों में सिगरेट पीना पूरी तरह वर्जित नहीं था, बल्कि हर ऐसी जगह एक कोना हुआ करता था, जहां बैठकर सिगरेट नोशी की जा सकती थी।

फहमीदा देख रही थीं कि पाकिस्तान के सांस्कृतिक अफसर,जाहिर है उनमें कुछ जासूस भी होंगे, फहमीदा को बड़े गौर से देख रहे हैं। अचानक फहमीदा ने कहा कि अब वापस पाकिस्तान जाने पर मेरे लिए और भी शामत आने वाली है। मैंने पूछा, ऐसा क्यों तो बोलीं, ‘मैं सिगरेट जो पी रही हूं। ये इन लोगों को बर्दाश्त नहीं हो रहा है। इसका मेरे खिलाफ इस्तेमाल किया जाएगा।’ इसके बावजूद फहमीदा लगातार सिगरेट पीती रहीं। यानी उनमें सत्ताधारियों को, शासकों को तंग करने, उन्हें चिढ़ाने या उनकी नाराजगी खुद से मोल लेने का भी गजब का गुण था। 

हाल के वर्षों में उनका भारत आना कुछ कम हो गया था। मुझे याद है कि हमारे पुराने मित्र देवीप्रसाद त्रिपाठी के यहां कुछ साल पहले फहमीदा आई थीं और हमने वहां उनके साथ दावत की थी। दरअसल बहुत से लोग हैं दिल्ली में, उनका आना जिनके लिए एक दावत की तरह होता था। लेकिन आखिरी बार जब यहां उनसे मुलाकात हुई, वो इस बात से बहुत ज्यादा संजीदा दिखीं कि हिन्दुस्तान को आखिर क्या हो गया है? ये किस रास्ते पर जा रहा है और क्या इसका भविष्य पाकिस्तान जैसा होने वाला है?  मुझे लगता है कि ‘तुम भी हम जैसे निकले भाई’... उसी दौर की रचना है उनकी, जो बड़ी मकबूल और मशहूर हुई। फहमीदा जब भी यहां आतीं, लोग उनसे यह नज्म सुनाने की फरमाइश  करते। वे भी इसे बड़े बेलौस-बेबाक अंदाज,बल्कि चुनौती देती हुई सुनातीं। एक विदेशी मेहमान, जो इतनी बेबाकी से अपनी रचनाएं सुना रहा हो, वह भी व्यवस्था विरोधी, जिसमें इतना मजाक, व्यंग्य, तिरस्कार भरा हुआ हो, बड़े साहस और जोखिम का काम है। मुझे लगता है कि पाकिस्तान के शायर हमेशा से बड़ा जोखिम उठाते रहे हैं। हिन्दी के कवि इतना जोखिम नहीं उठाते। फहमीदा हिन्दी-उर्दू एकता, हिन्दुस्तान-पाकिस्तान एकता की इतनी गहरी पैरोकार थीं कि उतनी शिद्दत और उतना जज्बा मुझे किसी और लेखक में नहीं दिखाई दिया।

कविता जिसने देश निकाला दिलाया 

चादर और चार-दीवारी

हुज़ूर मैं इस सियाह चादर का क्या करूंगी 

ये आप क्यूं मुझ को बख्शते हैं ब-सद इनायत 

न सोग में हूं कि उस को ओढूं

गम-ओ-अलम खल्क  को दिखाऊं

न रोग हूं मैं कि इस की तारीकियों में खफ्फित से डूब जाऊं

न मैं गुनाहगार हूं न मुजरिम 

कि इस स्याही की मेहर अपनी जबीं पे हर हाल में लगाऊं

अगर न गुस्ताख मुझ को समझें 

अगर मैं जां की अमान पाऊं

तो दस्त-बस्ता करूं  गुजारिश 

कि बंदा-परवर 

हुज़ूर के हुजरा-ए-मुअत्तर में एक लाशा पड़ा हुआ है 

न जाने कब का गला सड़ा है 

ये आप से रहम चाहता है 

हुज़ूर इतना करम तो कीजे 

सियाह चादर मुझे न दीजिए 

सियाह चादर से अपने हुजरे की बे-कफन लाश ढांप दीजिए 

कि उस से फूटी है जो उफूनत 

वो कूचे कूचे में हांफती है 

वो सर पटकती है चौखटों पर 

बरहनगी तन की ढांपती है 

सुनें जरा दिल-खराश चीखें 

बना रही हैं अजब हयूले 

जो चादरों में भी हैं बरहना 

ये कौन हैं जानते तो होंगे 

हुज़ूर पहचानते तो होंगे 

ये लौंडियां हैं 

कि यर्गमाली हलाल शब-भर रहे हैं

दम-ए-सुब्ह दर-ब-दर हैं

हुज़ूर के नुतफे को मुबारक के निस्फ विर्सा से बे-मो’तबर हैं

ये बीबियां हैं 

कि जौजगी का खि़राज देने 

कतार-अंदर-कतार बारी की मुंतजिर हैं 

ये बच्चियां हैं 

कि जिन के सर पर फिरा जो हजरत का दस्त-ए-शफकत 

तो कम-सिनी के लहू से रीश-ए-सपेद रंगीन हो गई है 

हुज़ूर के हजला-ए-मोअत्तर में जिंदगी ख़ून रो गई है 

पड़ा हुआ है जहां ये लाशा 

तवील सदियों से कत्ल-ए-इंसानियत का ये खूं-चकां तमाशा 

अब इस तमाशा को खत्म कीजे 

हुज़ूर अब इस को ढाप दीजिए 

सियाह चादर तो बन चुकी है मिरी नहीं आप की जरूरत 

कि इस ज़मीं पर वजूद मेरा नहीं फकत इक निशान-ए-शहवत 

हयात की शाह-राह पर जगमगा रही है मिरी जेहानत 

जमीन के रुख पर जो है पसीना तो झिलमिलाती है मेरी मेहनत 

ये चार-दीवारियां ये चादर गली सड़ी लाश को मुबारक 

खुली फजाओं में बादबां खोल कर बढ़ेगा मिरा सफीना 

मैं आदम-ए-नौ की हम-सफर हूं

कि जिस ने जीती मिरी भरोसा-भरी रिफाकत 

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फहमीदा रियाज़ की दो चर्चित कविताएं

तुम बिल्कुल हम जैसे निकले

तुम बिल्कुल हम जैसे निकले

अब तक कहां छिपे थे भाई

वो मूरखता, वो घामड़पन

जिसमें हमने सदी गंवाई

आखिर पहुंची द्वार तुम्हारे

अरे बधाई, बहुत बधाई।

प्रेत धर्म का नाच रहा है

कायम हिंदू राज करोगे?

सारे उल्टे काज करोगे!

अपना चमन ताराज करोगे!

तुम भी बैठे करोगे सोचा

पूरी है वैसी तैयारी

कौन है हिंदू, कौन नहीं है

तुम भी करोगे फतवे जारी

होगा कठिन वहां भी जीना

दांतों आ जाएगा पसीना

जैसी तैसी कटा करेगी

वहां भी सब की सांस घुटेगी

माथे पर सिंदूर की रेखा

कुछ भी नहीं पड़ोस से सीखा!

क्या हमने दुर्दशा बनाई

कुछ भी तुमको नजर न आयी?

कल दुख से सोचा करती थी

सोच के बहुत हंसी आज आयी

तुम बिल्कुल हम जैसे निकले

हम दो कौम नहीं थे भाई।

मश्क करो तुम, आ जाएगा

उल्टे पांव चलते जाना

ध्यान न मन में दूजा आए

बस पीछे ही नजर जमाना

भाड़ में जाए शिक्षा-विक्षा

अब जाहिलपन के गुन गाना।

आगे गड्ढा है यह मत देखो

लाओ वापस, गया जमाना

एक जाप सा करते जाओ

बारम्बार यही दोहराओ

कैसा वीर महान था भारत

कैसा आलीशान था-भारत

फिर तुम लोग पहुंच जाओगे

बस परलोक पहुंच जाओगे

हम तो हैं पहले से वहां पर

तुम भी समय निकालते रहना

अब जिस नरक में जाओ वहां से

चिट्ठी-विठ्ठी डालते रहना।

 

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दिल्ली तिरी छांव

दिल्ली! तिरी छांव बड़ी कहरी

मिरी पूरी काया पिघल रही

मुझे गले लगा कर गली गली

धीरे से कहे ‘तू कौन है री?’

मैं कौन हूं मां तिरी जाई हूं

पर भेस नए से आई हूं

मैं रमती पहुंची अपनों तक

पर प्रीत पराई लाई हूं

तारीख की घोर गुफाओं में

शायद पाए पहचान मिरी

था बीज में देस का प्यार घुला

परदेस में क्या क्या बेल चढ़ी

नस नस में लहू तो तेरा है

पर आंसू मेरे अपने हैं

होंठों पर रही तिरी बोली

पर नैन में सिंध के सपने हैं

मन माटी जमुना घाट की थी

पर समझ जरा उस की धड़कन

इस में कारूंझर की सिसकी

इस में हो के डालता चलतन!

तिरे आंगन मीठा कुआं हंसे

क्या फल पाए मिरा मन रोगी

इक रीत नगर से मोह मिरा

बसते हैं जहां प्यासे जोगी

तिरा मुझ से कोख का नाता है

मिरे मन की पीड़ा जान जरा

वो रूप दिखाऊं तुझे कैसे

जिस पर सब तन मन वार दिया

क्या गीत हैं वो कोह-यारों के

क्या घाइल उन की बानी है

क्या लाज रंगी वो फटी चादर

जो थर्की तपत ने तानी है

वो घाव घाव तन उन के

पर नस नस में अग्नी दहकी

वो बाट घिरी संगीनों से

और झपट शिकारी कुत्तों की

हैं जिन के हाथ पर अंगारे

मैं उन बंजारों की चीरी

मां उन के आगे कोस कड़े

और सर पे कड़कती दो-पहरी

मैं बंदी बांधूं की बांदी

वो बंदी-खाने तोड़ेंगे

है जिन हाथों में हाथ दिया

सो सारी सलाखें मोड़ेंगे

तू सदा सुहागन हो मां री!

मुझे अपनी तोड़ निभाना है

री दिल्ली छू कर चरण तिरे

मुझ को वापस मुड़ जाना है

 

 

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  • Web Title:memory article of famous Pakistani poet Fahmida Riyaz by Manglesh Dabral