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स्मृति शेष कृष्णा सोबती : नानी अब नहीं मिलेगी

Krishna Sobati

कृष्णा सोबती उन लेखकों में थीं, जिनकी रचनाओं का इंतजार रहता था। लेकिन लेखन के प्रति उनका अनुशासन उन्हें पूरी तरह संतुष्ट हुए बिना अपनी किसी रचना को पाठकों तक जाने से रोकता था। इसी कारण उन्होंने पहला उपन्यास चन्ना अब तक छपने नहीं दिया था। पांच दशक पहले यह इलाहाबाद से छपने को था, पर प्रकाशक का इसकी भाषा में कुछ बदलाव उन्हें मंजूर नहीं हुआ। नतीजतन यह अब तक सामने नहीं आ सका था, जिसे अब राजकमल प्रकाशन ने छापा है। विभाजन-पूर्व के खेतिहर समाज की लड़की चन्ना की इसी गाथा का एक मार्मिक अंश : 

चन्ना स्कूल से लौटी तो कुछ अनमनी-सी थी। मोटर से 
उतरी, सईदा बीबी ने बस्ता पकड़ा और हंसकर बोली, ‘बच्ची, आज देर हो गई...’ बच्ची ने चिढ़कर कहा, ‘कुछ खाने को दो।’
‘हां-हां, बच्ची, ऊपर चलो...’
‘सईदा बीबी, मां घर में है?’
‘नहीं बच्ची...’
बच्ची सीढि़यों पर जोर से पैर मारते-मारते ऊपर चढ़ गई। सईदा बीबी जान गई कि गुस्से में है। झटपट खाने-पीने के लिए नौकर से कहा।

‘सईदा बीबी, मैं कल स्कूल नहीं जाऊंगी।’ सईदा बीबी ने इसका जवाब न देना ही ठीक समझा। चन्ना को और गुस्सा आया। जूती समेत पांव मेज पर रख दिया, जहां अभी-अभी नौकर खाने की प्लेटें रख गया था। इस आदत से सईदा बीबी तंग आ गई है, पर मना करने से क्या मानती है? चन्ना ने लापरवाही से खाना शुरू किया। खाते-खाते दरवाजे पर खड़े जग्गू पर नजर पड़ी। बोली, ‘यहां क्यों खड़े हो?’ जग्गू हंसता हुआ-सा दरवाजे के पीछे खड़ा रहा। चन्ना को स्कूल की बात याद आ गई। क्रोध आया, ‘जग्गू जाओ नीचे, तुम यहां न आया करो।’ सईदा बीबी ने जग्गू को चले जाने के लिए हाथ से संकेत किया और चन्ना से बोली, ‘बच्ची, यह बुरी बात है।’
चन्ना और तड़पी, ‘क्यों?’ और चन्ना ने प्लेट पांव से छुई और नीचे पटक दी।

सईदा बीबी का जी जला। बचपन में जो बातें उसे अच्छी लगती थीं, वही बुरी लगने लगी हैं। कोई अक्ल की बात सीखती ही नहीं। जी आया आज दो-एक लगाकर ठीक कर दूं, पर फिर पी गई।
स्कूल में सजा मिलने के बाद सईदा बीबी के सामने यह सब करने में उसे बुरा नहीं लगा। उल्टा ऐसा मन हो रहा है कि सईदा बीबी को और चिढ़ाए।
सईदा बीबी ने प्लेट के टूटे हुए टुकड़ों को उठाया, उठकर जाने ही लगी थी तो श्यामा आ गई। पल-भर में सब कुछ समझा। कितनी ढीठ है। तेवर चढ़ाकर बोली, ‘सईदा बीबी, तुमसे प्लेट टूटी है?’
सईदा बीबी श्यामा के तेवर देखकर सोच रही थी कि अपना नाम ही ले दूं कि चन्ना ने सिर हिलाया और कहा, ‘मां, मैंने तोड़ी है।’ मुंह पर भय का चिह्न तक नहीं था।
‘क्यों?’ श्यामा ने चाहा तो यह कि पूछने के साथ-साथ जरा कान भी खींचे।

‘ऐसे ही...’ कुछ रुककर चन्ना बोली, ‘मर्जी मेरी!’ सईदा बीबी के देखते-देखते श्यामा ने आगे बढ़कर चन्ना के मुंह पर चांटा जमा दिया। सईदा बीबी की आंखें यकीन नहीं कर सकीं। चन्ना ने आज पहली बार मार खाई। लड़के-लड़कों में खेलकर भी उसने अधिक बार दूसरों को मारा ही है और जब-जब किसी से खाई है तो दुगने जोर से लौटाई है। सजा और उस पर यह चांटा—आंसू ऊपर आते-आते अटक गए। मन हुआ कि चीखकर कहे, ‘नानी-नानी!’ पर नानी तो सामने नहीं। मां की ओर देखा, उसके मुंह पर पश्चाताप था या नहीं—यह सब नहीं समझी। आग्नेय नेत्रों से सईदा बीबी की ओर देखा, ऐसे जैसे कहती हो—आज चाची होती तो क्या मुझे मारने देती? और पूरे जोर से मेज को लात मारी। एक साथ कई प्लेटें टूट गईं। सईदा बीबी ने ऐसा नहीं सोचा था और यह सब तूफान देखकर श्यामा ने जाना कि क्रोध के आवेश में आकर चन्ना को मारने से अच्छा नहीं हुआ। यह बहुत-सी प्लेटें...प्लेटों की कोई बात नहीं, पर इतनी जिद्द, इतनी असभ्यता। गुस्से से कहा, ‘सईदा बीबी, ले जाओ इसे नीचे। खाने के कमरे में ले जाया करो इसे।’ चन्ना को मारते देख सईदा बीबी के तन-बदन में आग लग गई थी। आखिर यह कौन राह है लड़की को ठीक करने की? मतलब क्या था लड़की पर इस तरह बरसने का? और जब दूसरी बार बच्ची ने मेज का मेज उलटा दिया था तो पता नहीं क्यों, सईदा बीबी को बुरा नहीं लगा। और सोचा था कि श्यामा लाख पढ़ी-लिखी हो, पर क्या इतना ही होने से पराई मां अपनी हो जाएगी?
सईदा बीबी ने ऐसी शक्ल बनाई, जैसी श्यामा ने कभी नहीं देखी और बच्ची की ओर होकर बोली, ‘चलो बच्ची, नीचे।’

बच्ची को मार खाने के बाद सईदा बीबी का वात्सल्य-भरा हाथ सहारा-सा लगा। जाते-जाते चांटा फिर याद आ गया और मां को अंगूठा दिखाकर बोली, ‘मैं कभी भी नहीं बोलूंगी कभी भी नहीं।’ आवाज में रुके हुए आंसू मिले हुए थे। सईदा बीबी के साथ जब नीचेवाले कमरे में पहुंची तो इतनी देर का धीरज सब ढल गया, और अपना छोटा-सा हाथ गाल पर धरकर बोली, ‘सईदा बीबी, मुझे दर्द होता है...’ सईदा बीबी को लड़की की बात पर हंसी आ गई।
‘मैं नहीं मां से बोलती...’ चन्नो बोलती थी और सईदा बीबी ध्यान बदलने के लिए बोली, ‘बच्ची, झटपट कपड़े बदल डालो। फिर झूला झूलने चलना। मैं भी चलूंगी।’
‘सच, सईदा बीबी, तुम मेरे साथ झूलोगी?’

सईदा बीबी ने अपनी बात के हुए असर पर खुश होकर कहा, ‘हां-हां, बच्ची!’ चन्ना ने मुंह-हाथ धोया, कपड़े बदले और सईदा बीबी कन्धे से बाल संवारने लगी। देखा, चन्ना की आंखों में पानी घिरता आ रहा है। सिर पर प्यार का हाथ फेरकर बोली ‘मां बलिहारी जाए, रोएं तुम्हारे दुश्मन...’ और अपनी ओढ़नी से आंखें पोंछने लगी। चन्ना को देर में पता लगा कि वह तो रो रही है और जब सईदा बीबी बोली तो रोते-रोते वहीं अटक आ गई। सईदा बीबी का हाथ छिटकाकर बोली, ‘मुझे साबुन लग गया है, मैं नहीं...’ और सुबक-सुबक कर रो पड़ी। सईदा बीबी सब समझी, पर जो समझी वह बच्ची से कहा नहीं। उसे देर तक गोदी में लिए बैठी रही। चन्ना ने जब सईदा बीबी की काली ओढ़नी में मुंह छिपा ऊपर किया तो एक बार फिर रोकर बोली, ‘सईदा बीबी, मैं तो नानी के पास जाऊंगी...’ सईदा बीबी ने बच्ची के मुंह पर हाथ रखा, ‘शुभ हो बच्ची, तुम क्यों जाओ नानी के पास...’

‘नहीं-नहीं। सईदा बीबी, मैं तो नानी के ही पास जाऊंगी।’
‘नहीं बच्ची, नानी तो पूरी 
हो गई।’
‘पूरी?’ चन्ना ने विस्मय से आंखें फैलाईं।
‘बच्ची, नानी तो ऊपर गई।’ सईदा बीबी ने समझा कि लड़की को पूरी बात जाननी चाहिए, पर क्या जानती नहीं? शाहनी का सब कुछ लड़की के सामने हुआ— ‘बेटी, नानी को मरे तो कई महीने हो गए हैं।’
चन्ना ने अपनी आंखों से नानी को मरते देखा था, अपनी आंखों से उसे घर से जाते देखा था, पर आज तक उसकी बचपन की कल्पनाओं ने उसे कभी इस विश्वास से अलग नहीं किया कि गई नानी फिर आएगी जरूर। और अब सईदा बीबी कहती है कि नानी मर गई, मर गई, मर गई...चन्ना की आंखों ने जो कुछ नानी का देखा था, सब खुलकर सामने आ गया, नए मानी के साथ, नए अर्थ के साथ। आज इतने महीनों के बाद आंखें बन्द किए पड़ी हुई और उसके सिरहाने बैठी हुई बहुत-सी औरतें और रोते हुए नाना...

‘नानी मर गई, सईदा बीबी!’
‘हां बच्ची!’ कहते-कहते सईदा बीबी ने देखा कि बच्ची की आंखों में आंसू बहे आ रहे थे। ‘नानी अब नहीं मिलेगी...नहीं मिलेगी...सईदा बीबी...’ और चन्ना ने अपनी दोनों बांहें फैला दीं, और जब सईदा बीबी ने बच्ची को गोदी में ले लिया तो महीनों के जमे आंसू सईदा बीबी की ममता से उसकी आंखों में उमड़ आए।
नानी आज हमेशा के लिए मर गई थी।

साझेदारी ही साहित्य का बुनियादी मूल्य
साहित्य ही मानवीय जीवन में प्रवाहित साझे चेतना स्वरूपों को संचित कर उसे प्रवाहित करता है। कोई भी विधा हो, रचनात्मक अभिव्यक्ति का माध्यम हो- वह इकहरा नहीं होता। यहां तक कि नितांत निज के आंतरिक उद्गम से प्रवाहित कविता भी अन्तर और वाह्य के तत्वों के प्रभावों को समेटकर साझी निधि की रसानुभूति देती है। इंसान की साझी अनुभूतियों को या यूं कहें- किसी भी साझेपन के बाहर व्यक्ति की हस्ती या किसी भी समाज की संरचना जाति भेद पर मुकम्मल तस्वीर नहीं बना सकती। भारतीय स्वभाव की गुंथीली द्वंद्वात्मकता इस बात को प्रमाणित करती है कि हमारी चिंतन-भूमि विभिन्नताओं को खारिज नहीं करती। उन्हें स्वीकार करती है। 

हमारा लोकतंत्र, साहित्य और समाज बेहिसाब रंग-रूपों में सुसज्जित है, उसमें किसी भी एक जाति, धर्म में परिभाषित करना आज के समयों में बेमानी है। विशेषकर भारत जैसे राष्ट्र में जो विभिन्न सम्प्रदायों और जातियों का निवास-स्थल रहा है। मिश्रित संस्कृति का केंद्र रहा है। भारतीय राष्ट्र की अवधारणा सदा से बहुलतावादी रही है। भारतीय समाज एक रूप नहीं नाना रूप है। स्वयं हिंदू धर्म के नाना रूप हैं। 

ठीक यही बात हिन्दी के संदर्भों में भी कही जा सकती है। विभिन्न समाजों, धर्मों और भाषाओं से आत्मसात कर सकने की क्षमता इसमें मौजूद है। इसी से इसके पास अखिल भारतीय सम्प्रेषण की कुंजी है। जो हमारे उस शक्ति विमर्श से भी जुड़ी है, जहां से हमारे राष्ट्र का अस्मिता प्रकरण शुरू होता है। हिन्दी का कथ्य आख्यान शैली और पाठ विभिन्नताओं को अपनी विस्तृत सीमाओं से बाहर नहीं करता। नहीं करना चाहिए। हिन्दी राष्ट्र के एकत्व और लोकतांत्रिक सद्भाव की भाषा है।

किसी राजनैतिक दल के प्रभाव तले इसका संकीर्ण वैचारिक आतंक और अलगाववादी हिंसा का तेवर हिन्दी भाषा में व्याप्त राष्ट्रीय भावना को घायल कर सकता है।
(‘पूर्वग्रह’ के एक अंक के लोकार्पण में कृष्णा सोबती)

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