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जमीन के नीचे की विरासत

Illustration - Nitesh Chaudhary

अयोध्या विवाद तो पुराना है। खूनी-लड़ाइयां बहुत हुईं। बहुत से आंदोलन हुए। सबका मूल सवाल एक ही था। क्या बाबरी मस्जिद से पहले वहां कोई राम मंदिर था? क्या राम जन्मभूमि मंदिर को तोड़कर बाबरी मस्जिद बनी है? दो सौ बरस से जनमानस को मथता यह सवाल इलाहाबाद हाईकोर्ट के सामने भी था। लगा जमीन की खुदाई से इस समस्या का समाधान निकलेगा। अदालत ने इसी रास्ते समाधान ढूंढ़ने की कोशिश भी की।

इतिहास की किताबें किसी देश की सांस्कृतिक विरासत को समेट नहीं सकतीं। फिर भी हर देश की अपनी ऐतिहासिकता होती है। पुरातत्त्वीय साक्ष्य और ऐतिहासिक मूल्य होते हैं। इतिहास और पुरातत्त्व की सत्य के उद्घाटन के अलावा कोई वैचारिक या सांस्कृतिक प्रतिबद्धता भी नहीं होती है। शायद इसीलिए अयोध्या विवाद के केंद्र में इतिहास और पुरातत्त्व आ गया। इस विवाद का सबसे महत्त्वपूर्ण और बड़ा सवाल यह बन गया कि क्या किसी मंदिर या धार्मिक स्थल को तोड़कर वहां बाबरी मस्जिद बनाई गई थी।

साल 1986 में ताला खोलने के अदालती फैसले के विरोध में जब बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी बनी थी, तभी से कमेटी और उसके नेता सैयद शहाबुद्दीन कई दफा यह सार्वजनिक घोषणा कर रहे थे कि अगर यह सिद्ध हो जाए कि बाबरी ढांचे से पहले वहां कोई मंदिर था और मौजूदा मस्जिद उसे तोड़कर बनाई गई है, तो हम शरीयत के मुताबिक उसे मस्जिद नहीं मानेंगे। मुस्लिम नेता स्वयं वहां जाकर उस ढांचे को गिरा देंगे। इसके बाद इस चुनौती का जबाव देने के लिए दोनों तरफ से ऐतिहासिक और पुराता्त्विवक साक्ष्य इकट्ठा किए जाने लगे। प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के वक्त इस सवाल पर दोनों पक्षों की छह दौर की बैठकें हुईं। छठी बैठक में जब चार घंटे के इंतजार के बाद बाबरी पक्ष के विशेषज्ञ नहीं आए तो बैठक बिना किसी नतीजे के खत्म हो गई। इससे पहले दोनों पक्षों ने इस मुद्दे पर साक्ष्यों का आदान-प्रदान भी किया। प्रो़ आरएस शर्मा, प्रो़ अतहर अली, प्रो़ सूरजभान, प्रो़ डीएन झा और जावेद हबीब बाबरी कमेटी की तरफ से और विश्व हिंदू परिषद की ओर से प्रो़ बीपी सिन्हा, डॉ. स्वराज प्रकाश गुप्ता, प्रो. हर्ष नारायण, प्रो. केएम लाल, प्रो़ देवेंद्र स्वरूप, बलदेव राज ग्रोवर सबूत पेश करने वालों में थे।

अब इतिहास और पुरातत्त्व अयोध्या विवाद के केंद्रीय बिंदु बन गए थे। चौतरफा ऐतिहासिक साक्ष्यों की पड़ताल शुरू हो गई। ढांचा गिरने के बाद जनवरी 1993 में भारत के राष्ट्रपति ने ‘प्रेसीडेंशियल रेफरेंस' के जरिए सुप्रीम कोर्ट से यह पूछा कि क्या राम जन्मभूमि - बाबरी ढांचे से पहले वहां किसी हिंदू मंदिर या हिंदू धार्मिक भवन का अस्तित्व था। सुप्रीम कोर्ट को लगा कि सरकार उसके कंधे पर रख बंदूक चलाना चाहती है। लिहाजा लंबी सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने इस सवाल पर राय देने से मना कर दिया और संविधान के अनुच्छेद 143(ए) के तहत किया गया ‘रेफरेंस' सरकार को वापस लौटा दिया।.

इस विवाद पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 30 सितंबर, 2010 को जो फैसला सुनाया, उसमें हाईकोर्ट ने इस सवाल का जवाब ढूंढ़ लिया। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ‘आर्कलॉजिक ल सर्वे ऑफ इंडिया' की उस रिपोर्ट को मंजूर कर लिया, जिसमें कहा गया था कि बाबरी ढांचे के नीचे खुदाई में दसवीं शताब्दी के हिंदू मंदिर के कई सबूत मिले हैं। तीन जजों की इस बेंच ने अपने फैसले में एएसआई की रिपोर्ट को ही आधार माना।

हाईकोर्ट के आदेश से एएसआई ने 12 मार्च, 2003 से 7 अगस्त, 2003 के बीच राम जन्मभूमि परिसर की खुदाई की। खुदाई के बाद एएसआई ने 22 सितंबर, 2003 को कोर्ट को अपनी रिपोर्ट सौंपी। एएसआई के टीम लीडर और सुपरिंटेंडेंट आर्केलॉजिस्ट डॉ. बीआर मनी ने अपनी शुरुआती टिप्पणी में एएसआई की कार्यप्रणाली का ब्योरा दिया। समूची खुदाई और ढांचों के अभिलेखीकरण की पूरी प्रक्रिया की वीडियोग्राफी की गई। यह खुदाई न्यायिक पर्यवेक्षकों, वकीलों और संबंधित पक्षों या उनके नामित व्यक्तियों की मौजूदगी में संपन्न हुई। खुदाई में पारदर्शिता हो, इस खातिर सारी उत्खनित सामग्री दोनों पक्षों की मौजूदगी में ही सील की जाती थी। इसे उसी दिन फैजाबाद के कमिश्नर की ओर से उपलब्ध कराए गए स्ट्रांग-रूम में रखा जाता था। हर रोज इस स्ट्रांग-रूम को खोलने के बाद सील कर दिया जाता था।

सुरक्षा और दूसरी औपचारिकताओं के कारण खुदाई के काम में कुछ देरी हुई। मानसून ने हालात और भी खराब कर दिए। पूरी जगह को कई रंगों वाली वाटरप्रूफ शीट से ढकना पड़ा था। इस वजह से कई खाइयों में नमी और अंधेरा हो गया। बंदरों ने भी इस शीट पर कूद-फांद शुरू कर दी। अयोध्या में हनुमानगढ़ी और राम जन्मभूमि इलाके में हजारों बंदर रहते थे। बंदरों से बचाने के लिए इन शीटों को बांस और बल्ली के सहारे टिकाया गया। इससे अंधेरे की स्थिति पैदा हो गई। अब फोटोग्राफी में असुविधा होने लगी। खाइयों के भीतर कई मीटर नीचे तक लाइट लगानी पड़ी। चारों ओर लगाई गई ग्रिलों और खंभों ने उस पूरे इलाके में चलना-फिरना भी मुश्किल कर दिया।

एएसआई ने कुल 90 खाइयां खोदीं। पूरे क्षेत्र को पांच हिस्सों में बांटा। इनमें पूर्वी, दक्षिणी, पश्चिमी, उत्तरी क्षेत्र और उभरा हुआ प्लेटफार्म शामिल था। इन सभी क्षेत्रों में क्रमवार खुदाई हुई, जिससे ढांचों की प्रकृति और उसकी सांस्कृतिकता का अंदाजा लगे।

इस खुदाई में अलग-अलग कालखंड के विभिन्न स्तरों पर जानवरों की हड्डियां भी पाई गईं। लेकिन उत्तरी और दक्षिणी हिस्सों की खाइयों में कंकालों के अवशेष मिले। ये कंकाल उत्तर-मुगल युग के थे। खुदाई में जो शुंग और गुप्तकाल के विभिन्न ढांचे मिले, उनकी प्रति या फिर उपादेयता का पता नहीं चल सका। गुप्तकाल से लेकर उत्तर-मुगलकाल तक अलग-अलग स्तरों पर निवास के चिह्न लुप्त होते दिखाई दिए। विशेषज्ञों के मुताबिक विवादित ढांचे के नीचे का क्षेत्र मुगलकाल में इस ढांचे का बनने तक सार्वजनिक उपयोग की जगह के तौर पर था। यह एक सीमित क्षेत्र था, जिसके चारों ओर आबादी रहती थी। इस जगह पर बड़ी संख्या में मिले काली पॉलिश वाले मिट्टी के बरतनों ने इस मान्यता को और भी पुख्ता किया कि राम और अयोध्या की कहानी कृष्ण और हस्तिनापुर से पुरानी है। .

एएसआई की रिपोर्ट में खुदाई के दौरान पाए गए अभिलेखों के तीन हिस्सों पर एक संक्षिप्त टिप्पणी भी है। इनमें एक नागरी में और दो अरबी में पाए गए थे। अरबी अभिलेख में एक 16वीं शताब्दी की नस्ख शैली में था। इसमें कुरान की एक आयत खुदी थी। दूसरा अरबी अभिलेख भी 16वीं शताब्दी के शुरुआत की शैली में था। इसमें अल्लाह शब्द खुदा था। एएसआई के मुताबिक नागरी का पांच वणोंर् वाला अभिलेख 11वीं शताब्दी का था। 2 सितंबर, 2003 को एएसआई ने अपनी 574 पन्नों की रिपोर्ट तस्वीरों के साथ हाईकोर्ट को सौंपी। .

नामवर सिंह - मंदिर बने न बने, यह राम जानें! लेकिन इस पुस्तक का मंदिर अमर है। ऐसा मंदिर एक लेखक ही बना सकता है। भगवान राम अयोध्या में रहे, लेकिन उन्हें आम लोगों ने काशी पहुंचाया। तुलसीदास ने काशी में रामचरित मानस रची और अब पांच सौ साल से भी ज्यादा समय बाद बनारस के ही लेखक हेमंत शर्मा की यह पुस्तक आई है। राम और उनकी जन्मभूमि पर ऐसी प्रामाणिक पुस्तक पहले कभी नहीं आई। मेरा जीवन सार्थक हुआ।

प्रभात प्रकाशन से सद्य: प्रकाशित पुस्तक ‘युद्ध में अयोध्या' और ‘अयोध्या का चश्मदीद' के अंश.

 

 

 

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