
अकेले आदमी को अपना मकान लेने में कितनी परेशानी होती है, इसका दर्द कोई दूसरा नहीं जान सकता। उससे तरह-तरह के सवाल पूछे जाते हैं। सबसे बड़ा सवाल तो यही होता कि वह शादीशुदा है या अकेला। उसका अकेला होना...

वसंत पंचमी की बात चले और सरस्वती पुत्र निराला की याद न आए, यह संभव नहीं। ‘वर दे वीणा वादिनी’ का महाघोष करने वाला यह महाकवि इसी दिन इस धरती पर जन्मा और अपनी अमर वाणी से हिंदी कविता में अमर...

हिंदी के जिन लेखकों ने अपनी कृतियो में देश-विभाजन से उपजी मानवीय त्रासदी का सबसे मार्मिक अंकन किया है, सैयद मोहम्मद ख्वाजा बदीउज्जमां उनमें अग्रणी हैं। छाको की वापसी उनका सर्वाधिक चर्चित...

कृष्णा सोबती उन लेखकों में थीं, जिनकी रचनाओं का इंतजार रहता था। लेकिन लेखन के प्रति उनका अनुशासन उन्हें पूरी तरह संतुष्ट हुए बिना अपनी किसी रचना को पाठकों तक जाने से रोकता था। इसी कारण उन्होंने पहला...
प्रख्यात पाकिस्तानी शायरा फहमीदा रियाज़ अपनी बेबाकी और जुझारूपन के कारण जितना विवादों और चर्चाओं में रहीं, उतनी ही संजीदगी से अपनी रचनाशीलता में जुटी रहीं। पाकिस्तान का निजाम उनसे खार खाए रहता तो...
1. संस्कृत से उपजी भारतीय आर्यभाषाओं के अपभ्रंश से 1050 से 1150 के बीच हिंदी का जन्म माना गया है। 2. 1165 से 1192 के बीच दरबारी कवि चंदबरदाई ने ‘पृथ्वीराज रासो’ के रूप में...
पं. बाबूराव विष्णु पराड़कर हिंदी पत्रकारिता के भीष्म पितामह कहे जाते हैं। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान हिंदी पत्रकारिता को जनजागरण के हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया, तो आजादी के बाद इसे नव...
हिंदी दिवस के मौके पर हम उन पुरोधाओं को याद कर रहे हैं जो गैर हिंदीभाषी होने के बावजूद हिंदी को भाषा ही नहीं बल्कि देश को जोड़ने की कड़ी मानते थे। पेश है पांच दिनी शृंखला 'हिंदी मेरी शान’ की...
अयोध्या विवाद तो पुराना है। खूनी-लड़ाइयां बहुत हुईं। बहुत से आंदोलन हुए। सबका मूल सवाल एक ही था। क्या बाबरी मस्जिद से पहले वहां कोई राम मंदिर था? क्या राम जन्मभूमि मंदिर को तोड़कर बाबरी मस्जिद बनी...
जिस तरह चुपचाप लिखते थे, उसी तरह चुपचाप चले भी गए तेजिंदर। साहित्य उनके लिए शोहरत की बजाय साधना की चीज थी। आत्म प्रदर्शन से वह ताउम्र दूर रहे, लेकिन यह उनकी कलम की शक्ति ही थी, जब भी उनकी कोई कृति...