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हिंदी न्यूज़ ओपिनियन प्याली में तूफानकोरोना डायरी-17 : जहानाबाद की माँ का दर्द समझें 

कोरोना डायरी-17 : जहानाबाद की माँ का दर्द समझें 

11 अप्रैल 2020,  शाम 4.30 बजे । बरसों पहले एक फिल्म देखी थी- मशाल। उस फिल्म के एक दृश्य में दिलीप कुमार अपनी बीमार पत्नी को अस्पताल पहुंचाना चाहते हैं। वह जीवन और मृत्यु के संघर्ष में...

कोरोना डायरी-17 : जहानाबाद की माँ का दर्द समझें 
Amitशशि शेखर ,नई दिल्लीSat, 11 Apr 2020 07:36 PM
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11 अप्रैल 2020,  शाम 4.30 बजे ।

बरसों पहले एक फिल्म देखी थी- मशाल। उस फिल्म के एक दृश्य में दिलीप कुमार अपनी बीमार पत्नी को अस्पताल पहुंचाना चाहते हैं। वह जीवन और मृत्यु के संघर्ष में फंसी हुई है। हर पल हालत खराब होती जा रही है पर कोई साधन नहीं मिल रहा। हताश, निरुपाय और निस्संग व्यक्ति को रूपायित करते हुए दिलीप कुमार चीखे थे, ह्यकोई है? कोई है? मदद करो भाई, ये बेचारी मर जाएगी।ह्ण बरसों बीत गए पर उनकी वो आवाज और भाव-भंगिमा मन के कोने में स्थाई टीस की भांति घर कर गयी थी । आज वह टीस पूरी शिद्दत से उभर आई है।

टी.वी. के स्क्रीन पर देख रहा था, बिहार के जहानाबाद में एक असहाय मां अपने तीन साल के बच्चे को गोद में लिए उसी बेकली, बेकरारी और बेपनाह वेदना में आपद्मस्तक सनी हुई दौड़ रही है, मदद की गुहार लगा रही है पर कोई सुनने वाला नहीं। बाद में उसका पति बताता है कि बच्चे की हालत ज्यादा खराब थी उसे बड़े अस्पताल के लिए रेफर किया गया था पर दो-दो एंबुलेंस खड़ी होने के बावजूद ड्राइवर ले जाने को तैयार न थे। उसके पीछे अपने बच्चे की निर्जीव देह कोख से चिपकाए वह मां बिलख रही थी। लॉकडाउन को लेकर दावे और वायदे तो बहुत किये जा रहे हैं पर वह मां कभी अपने बच्चे को, उसकी देह को, उसकी गर्माहट को, उसकी सांसों को धड़कनों को और अपनी उन लोरियों को, जो उसे सुलाने के लिए कभी गाई होंगी, भुला नहीं सकेगी। अफसोस! इतिहास इस तरह के हादसे दर्ज नहीं करता। इतिहास का विनम्र विद्यार्थी होने के बावजूद मुझे उससे शिकायत रही है कि वह सिर्फ नायकों, खलनायकों और विदूषकों की गाथाएं दर्ज करता है।

अब, जब यह तय हो गया है कि #लॉकडाउन कम से कम दो सप्ताह और बढ़ाया जाएगा, तब हुकूमतों को अपने उजले सत्ता महलों से निकलकर, दम तोड़ रही आदम और हौव्वा की इन संतानों पर ध्यान देना होगा। ये वे लोग हैं जिन्हें कभी कोरोना मारता है, तो कभी भूख और कभी लाचारी। कोरोना जैसे हमें नंगा करने आया है। जहानाबाद की झकझोर देने वाली घटना थोड़ी अलग है, पर हम अपने लिए हर रोज हादसे गढ़ने में लगे हैं। मेरठ की जलीकोठी इलाके में आज इंदौर की कुख्यात घटना दोहराई गई। वहां पहले चिकित्सा-कर्मियों की पिटाई की गई और जब पुलिस वालों ने दखल दिया, तो वे भी हमले के शिकार हुए। बाद में बड़ी संख्या में पुलिस बल ने वहां पहुंचकर उन्हें गिरफ्तार कर लिया। 

मेरी समझ में नहीं आता कि चिकित्सा-कर्मियों पर हमला करने वाले लोग किस प्रमाद के शिकार हैं? ग़ैरों के दुष्प्रचार के चलते वे जहां घृणा के पात्र बन रहे हैं, तो अपनों के ही दुष्प्रचार के कारण ऐसे काम कर रहे हैं जिससे उनके प्रति नफरत को हवा मिले। यही समय है, जब हर धर्म और संप्रदाय के सही सोच वाले लोग आगे आएं। कोरोना तो चला जाएगा। आपसी नफरत हमें हमेशा मारती रहेगी। अब, जब लॉकडाउन बढ़ रहा है तब हुकूमतों को किसानों, मजदूरों और इनके हित से जुडे़ तमाम आर्थिक उपादानों पर विचार करना होगा। कुछ यूरोपीय सरकारों ने तो छंटनी रोकने के लिए उद्योगों को बड़े-बड़े पैकेज दिए हैं। अमेरिका में लोगों को निकालना न पड़े इसके लिए कामगारों को अवैतनिक अवकाश पर भेजा जा रहा है। हमारे देश में 93.5 फीसदी से अधिक लोग असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं। इन्हें रोज अपने लिए कुआं खोद कर पानी पीना पड़ता है।

लम्बा लॉकडाउन उनके और उनके परिवारों के जीवन पर भुखमरी का खतरा लेकर आया है। अगर जल्दी कुछ न किया गया, तो हमारे समक्ष नया संकट पैदा हो सकता है क्योंकि पहले से ही खस्ता हाल पड़े लघु और मझोले उद्योगों में इतना माद्दा नहीं है कि वे महीनों अपने श्रमिकों को घर बैठाकर वेतन दे सकें। सूरत की घटना इसकी बानगी है। शुक्रवार की रात को सैकड़ों की संख्या में मजदूर वहां अपने घरों से निकल आए। सोशल डिस्टेंसिंग की सीख पेट की भूख पर भारी पड़ गई थी। उन लोगों ने वाहनों में आग लगा दी। पुलिस को उन पर नियंत्रण करने के लिए बल प्रयोग करना पड़ा। कुछ लोगों को गिरफ्तार भी किया गया है। संगीने अथवा लाठियां भूख से बिलबिलाते लोगों का इलाज नहीं हैं। यह समय सिर्फ सहायता का नहीं, बल्कि ह्यइनोवेशनह्ण का भी है। सरकार की मदद से उद्योगपतियों, आढ़तियों और कारोबारियों को नये तरीके ढूंढने पड़ेंगे। तय हो गया है कि #कोविड19 की यह हाहाकारी बला बहुत जल्दी टलने वाली नहीं है। कोई शोधार्थी इसे सितंबर तक खिंचता हुआ देख रहा है, तो कुछ और का मानना है कि यदि ऐसा हुआ तो नवंबर-दिसंबर में इसकी फिर से वापसी हो सकती है। चीन में सामने आ रहे नये मामलों को देखते हुए ऐसी आशंकाओं से समूचे तौर पर इंकार भी नहीं किया जा सकता। तय है कि इस विकट वक्त में सिर्फ विवेक बचा सकता है पर मेरठ, इंदौर अथवा सूरत की घटनाएं हमारी विवेकशीलता पर सवाल खड़े करती हैं।

आज के आंकड़ों पर गौर फरमाइए -

पिछले 24 घंटे में कोरोना से 36 मौतें, 768 नये मामले। कुल रोगी 7529 तथा कुल मौतें 242 हुई। अब तक 652 स्वस्थ हुए।

क्रमश: