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Hindi News ओपिनियन प्याली में तूफानकोरोना डायरी-10 : जमात को जो सोचना था 

कोरोना डायरी-10 : जमात को जो सोचना था 

31 मार्च 2020,  रात 9 बजे । मैंने कल भी सवाल उठाया था, मानवता बड़ी या धार्मिक कर्मकांड? आज यह प्रश्न कनपटी पर पड़े किसी झन्नाटेदार तमाचे की भांति लोगों के दिमाग को सनसना रहा है। कल दिल्ली में...

कोरोना डायरी-10 : जमात को जो सोचना था 
शशि शेखर ,नई दिल्लीTue, 31 Mar 2020 11:48 PM
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31 मार्च 2020,  रात 9 बजे ।

मैंने कल भी सवाल उठाया था, मानवता बड़ी या धार्मिक कर्मकांड? आज यह प्रश्न कनपटी पर पड़े किसी झन्नाटेदार तमाचे की भांति लोगों के दिमाग को सनसना रहा है। कल दिल्ली में तबलीगी जमात के लोगों के सामने आने के बाद से 19 प्रदेशों की पुलिस मुश्किल में पड़ गई है। जमात की मजलिस में सैकड़ों लोग इकट्ठा हुए थे और ये इन्हीं प्रदेशों से आए थे। हंगामा मचने की सबसे बड़ी वजह यह है कि इनमें से 10 लोगों की मौत हो चुकी है ।ये सारे के सारे कोविड-19 के शिकार थे। सवाल सुलग रहा है - इन्होंने ये बीमारी कहीं और लोगों में तो नहीं बाँट दी ? 

कल भी पुलिस ने जिन लोगों को ‘रेस्क्यू‘ किया, उनमें क़रीब पचास लोग संक्रमण के शिकार पाए गए। दिल्ली से लौटते वक्त उन्होंने रास्ते में कितने लोगों को यह अभिशाप सौंपा होगा? सिर्फ वे ही क्यों, उन जैसे और भी तमाम लोग हो सकते हैं। सही संख्या का आकलन तो तब हो पाएगा जब इन सारे महानुभावों की जांच रिपोर्ट आ जाए। तबलीगी जमात का मकसद भले ही अच्छा हो, पर महामारी के इस वक्त में उन्हें इतना बड़ा आयोजन करने की जरूरत क्या थी? जब हज तक पर रोक लग गई है, तो ये लोग धार्मिक शिक्षा के नाम पर इसी वक्त आयोजन क्यों कर रहे थे? अगर इसे कुछ दिन टाल दिया जाता, तो भला कौन-सा आसमान टूट पड़ता? बहुत से मंदिर, मस्जिद, शिवालय, दरगाह, चर्च आदि इस समय धर्मावलंबियों का स्वागत नहीं कर रहे। ऐसे में मजलिस का आयोजन चौंकाता है।

इस जंजाल के सामने आने के बाद दिल्ली का पुलिस -प्रशासन एक बार फिर सवालों के कटघरे में आ खड़ा हुआ है। मजलिस के आयोजकों का दावा है कि हमने तो पहले ही प्रशासन से रेस्क्यु की गुहार लगाई थी। अगर यह सच है, तो यह मामला और गंभीर हो जाता है। पहले दिल्ली के दंगों, फिर लॉकडाउन के दौरान लोगों का पलायन और अब जमात की मजलिस ! तमाम सवाल सिर उठाने लगे हैं? हालांकि , हुकूमत पर दोष मढ़कर बैठ लेना आसान है। यकीनन, जमात अपनी सामाजिक जिम्मेदारी का निर्वाह करने में नाकाम रही। यही नहीं, देश के मुख्तलिफ हिस्सों से जिस तरह मजलिसों से तबलीगी जमात से जुड़े विदेशी पकड़े जा रहे हैं, वह भी चौंकाता है। इन लोगों का धार्मिक कार्य से भारत आना गलत नहीं है, संविधान इसकी इजाजत देता है पर टूरिस्ट वीजा पाने वालों को भी बताना होता है कि वे कहां जा रहे हैं और वहां कब तक रहेंगे? अब जमशेदपुर जाने वाला अगर रांची में ही टिका रह जाए, तो यह नियम विरुद्ध है। पूरे देश में ऐसे तमाम मामले सामने आए हैं। उम्मीद है, जमात इस पर गौर फरमाएगी और प्रशासन भी ऐसे मामलों पर नजर रखेगा। 

यही नहीं अन्य स्थानों पर भी मजहब नाम पर भीड़ इकट्ठा हो रही है । बिहार के अंधराठाड़ी में मरकज में कुछ लोगों के जुटाव की सूचना पर पुलिस पहुंची, तो हिंसक झड़प हो गई। संकट के इस समय में ऐसी घटनाएं तरह-तरह की दिक्कतों से जूझ रही हुकूमत के लिए कुछ और परेशानियां बढ़ा देती हैं ।अंतत: नुकसान सिर्फ आम आदमी का होता है। ऐसे में हिन्दू-मुसलमान के नाम पर दुकान चलाने वालों की बन आई है ।क्या आपको यह प्रश्न परेशान नहीं करता कि हम जहालत से मुक्ति पाकर आगे बढ़ेंगे या उसे फिर से ओढ़- बिछाकर मध्ययुग में पहुंचना चाहेंगे? इस सारी हलचल से अलग ऐसे लोग भी हैं, जो पैदल या साइकिल पर चलते चले जा रहे हैं। लखनऊ के शहीद पथ पर आज ‘हिन्दुस्तान’ संवाददाताओं को मोहम्मद नवील मिले। गुड़गांव में लॉकडाउन हो गया और पास में कोई काम न रहा, तो साइकिल से ही मोतिहारी के लिए निकल लिए। वहां पत्नी है और दो बच्चियां हैं। परदेस में भूखा मरने से अपने घर का ही चना-चबेना बेहतर। तय है कि सरकारें लोगों को जहां-तहां रोक पाने में अभी तक कामयाब नहीं हुई हैं।

हालाँकि, हर आदमी में नवील जैसा साहस नहीं होता। कोलकाता से पैदल जा रहे सागर दास की कथा अंदर तक झकझोरती है। वे पांच श्रमिकों के साथ कोलकाता से जमुई के लिए निकले थे। सागर पता नहीं कैसे उनसे बिछड़ गया? भूख आंतें चबाने लग पड़ी थी और सागर दास के होठों को एक बूंद पानी तक नसीब नहीं था। हताशा इतनी घर कर गई कि जामतारा के पास उसने नदी में छलांग लगा दी। वह तो मल्लाहों की नजर उस पर पड़ गई। वे नदी में कूद पड़े और उसे किनारे खींच लाए। अब वह क्वारंटीन सेंटर में है। यहां कई दिन बाद उसे दाना-पानी नसीब हुआ।  ये तो उन लोगों की कथाएं थीं, जो या तो धर्म के नाम पर बीमारी से भी नहीं डरते या भूख ने उन्हें दर-बदर कर दिया है पर जिनके पेट भरे हैं, उनकी अलग दिक्कतें हैं। तमाम शहरों में महिला थाने में तैनात कर्मियों की शामत आ गई है। घरों में नौकरानियों का प्रवेश वर्जित है। पति-पत्नी बाहर नहीं निकल सकते। कौन क्या काम करे, इस पर झगड़ा हो रहा है। पहले से ही दिन-रात मशक्कत कर रहे पुलिस वालों के लिए यह एक और परेशानी है।

क्रमश: