इमरान खान की शपथ और पाकिस्तान की भाषा समस्या
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान उर्दू में शपथ ग्रहण करते समय बार-बार लड़खड़ा रहे थे। कई शब्दों का उच्चारण करने में उनकी पेशानी से पसीना छूटा। इसे लेकर उनका मजाक भी बन रहा है। उर्दू में लिखी शपथ को...

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान उर्दू में शपथ ग्रहण करते समय बार-बार लड़खड़ा रहे थे। कई शब्दों का उच्चारण करने में उनकी पेशानी से पसीना छूटा। इसे लेकर उनका मजाक भी बन रहा है। उर्दू में लिखी शपथ को पढ़ पाने में इमरान खान को हुई कठिनाई को गहराई से समझने की जरूरत है। आबादी की दृष्टि से आज के पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत पंजाब है। देश की 65 फीसदी आबादी वहीं बसती है। वहां पंजाबी हर स्तर पर बोली-समझी जाती है। मगर स्कूलों-कॉलेजों में उसके पढ़ने-लिखने की कोई सुविधा नहीं है। राष्ट्रभाषा होने के कारण उर्दू को वहां कामकाज की भाषा का दर्जा प्राप्त है। पंजाबी समाज को न चाहते हुए भी उर्दू पढ़नी पड़ती है, क्योंकि यह अनिवार्य विषय है। उर्दू को सरकारी स्तर पर मिलने वाले महत्व के कारण पंजाबी की अनदेखी होती रही है। इसके खिलाफ अब पंजाब खड़ा हो रहा है।
पाकिस्तान में इसी साल मार्च में जनगणना शुरू हुई थी। तभी से पंजाब सूबे में पंजाबी और उर्दू बोलने वाले आमने-सामने खड़े हो गए। यहां पर उर्दू जानने वालों की भी मातृभाषा पंजाबी ही है। मगर आरोप है कि उनमें से बहुत से जनगणना अधिकारी मातृभाषा उर्दू लिखवा रहे थे। इसके चलते लोग सड़कों पर उतर आए। लाहौर, बहावलपुर, स्यालकोट वगैरह में ‘पंजाबी प्रचार’ नाम की एक संस्था के बैनर तले सभाएं और सेमिनार हुए। सबकी चाहत थी कि पंजाब में पंजाबी बची रहे। क्या आप सोच सकते हैं कि भारत के पंजाब प्रांत की असेंबली में पंजाबी के प्रयोग पर रोक हो? पाकिस्तान के पंजाब प्रांत की असेंबली में पंजाबी का इस्तेमाल निषेध है।
हैरानी इस बात से होती है कि इकबाल, फैज अहमद फैज और साहिर लुधियानवी जैसे शायरों ने अपनी मातृभाषा यानी पंजाबी में क्यों नहीं लिखा? जाहिर है, पंजाब में पंजाबी की बेकदरी का इतिहास पुराना है। इमरान खान जैसे लोग तो उर्दू सांकेतिक रूप से ही पढ़े हैं। वह वहां के उस उच्च वर्ग से आते हैं, जो अंग्रेजी ही पढ़ता-लिखता है। इनका उर्दू से खास सरोकार नहीं रहता। इसलिए इन्हें फारसी और अरबी के शब्दों से लबरेज उर्दू को पढ़ने में दिक्कत होती है।
पाकिस्तान में उर्दू को राष्ट्रभाषा बनाकर देश की मिट्टी की भाषाओं के साथ जो अन्याय किया गया, उसका सारा श्रेय मोहम्मद अली जिन्ना को भी जाता है, जिन्हें इमरान खान अपना नायक मानते हैं। हालांकि वहां सबसे ज्यादा जुल्म हिंदी के साथ ही हुआ। पाकिस्तान बनते ही वहां हिंदी के प्रकाशन बंद हो गए। उस दौर में लाहौर से आर्य गजट, प्रकाश और अमर भारत वगैरह हिंदी के अखबार प्रकाशित हो रहे थे। वहां कई हिंदी प्रकाशन भी सक्रिय थे। इनमें राजपाल प्रकाशन खास था। हिंदी के प्रसार-प्रचार के लिए कई संस्थाएं जुझारू प्रतिबद्धता के साथ जुटी हुई थीं। इनमें धर्मपुरा स्थित हिंदी प्रचारिणी सभा का योगदान कभी भुलाया नहीं जा सकता। लाहौर के गवर्नमेंट कॉलेज, फोरमेन क्रिश्चियन कॉलेज, खालसा कॉलेज, दयाल सिंह कॉलेज, डीएवी वगैरह में हिंदी की स्नातकोत्तर स्तर तक की पढ़ाई की व्यवस्था थी। इसी तरह रावलपिंडी के तमाम कॉलेजों में हिंदी पढ़ी-पढ़ाई जा रही थी। कराची यूनिवर्सिटी का हिंदी विभाग भी काफी समृद्ध हुआ करता था। भीष्म साहनी, कृष्णा सोबती, देवेंद्र सत्यार्थी, उपेंद्र नाथ अश्क समेत दर्जनों हिंदी लेखक उसी पृष्ठभूमि के हैं। रावलपिंडी में रहकर ही गीतकार शैलेंद्र और आनंद बख्शी ने हिंदी का ककहरा सीखा था। पाकिस्तान में हिंदी को शत्रुओं की भाषा माना गया। इसीलिए उसके आगे बढ़ने ही नहीं, बने रहने के सारे रास्ते भी बंद कर दिए गए।
पंजाबी को भले ही शत्रुओं की भाषा न माना गया हो, लेकिन रास्ते उसके भी बंद कर दिए गए। हालांकि यह उस जमीन की भाषा थी, इसलिए बिना किसी संरक्षण और पोषण के हर किसी की जबान पर चढ़ती रही। जिन्होंने उर्दू या अंग्रेजी सीखी भी, वे भी पंजाबी के उच्चारण का लब-ओ-लहजा नहीं छोड़ सके। यह लहजा ज्यादातर पाकिस्तानियों की भाषा में सुना जा सकता है। क्या हम उम्मीद करें कि शपथ ग्रहण के दौरान शब्दों से जूझना बाकी दुनिया की तरह खुद इमरान को भी याद रहेगा और वह भाषा के मसले का हल खोजेंगे? (ये लेखक के अपने विचार हैं)
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