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पूर्वोत्तर की जीवन रेखा सियांग को बचाने का समय

पंकज चतुर्वेदी वरिष्ठ पत्रकार

अरुणाचल प्रदेश की जीवन रेखा कहलाने वाली सियांग नदी एक बार फिर किनारे बसे लोगों में खौफ पैदा कर रही है। हालांकि नदी का जल स्तर खतरे के निशान से भी नीचे है, लेकिन उसमें दो-दो मीटर ऊंची लहरें उठ रही हैं, जैसे कि समुद्र में ज्वार-भाटे के समय उठती हैं। पीढ़ियों से इस नदी के सहारे अपना जीवन काट रहे पासीघाट इलाके के लोगों का कहना है कि नदी में ऐसी ऊंची लहरें उन्होंने कभी देखी नहीं। इस समय इलाके का मौसम बेहद सामान्य है और ऐसे में तेज आवाज के साथ असामान्य रूप से उछलती लहरें केवल मेबो क्षेत्र को प्रभावित कर रही हैं। वहीं मेबो क्षेत्र से लगभग 31 किलोमीटर आगे नामसिंग और इसके आसपास के इलाकों में नदी का प्रवाह बिल्कुल सामान्य है। याद करें, पिछले साल भी अक्तूबर में इस नदी का पानी पूरी तरह काला हो गया था। 

सियांग नदी का उदभव पश्चिमी तिब्बत के कैलाश पर्वत और मानसरोवर से दक्षिण-पूर्व के तमलुंग त्सो (झील) से हैं। तिब्बत में कोई 1,600 किलोमीटर के रास्ते में इसे यरलुंग त्संगपो कहते हैं। भारत में दाखिल होने के बाद इस नदी को सियांग या दिहांग नाम से जाना जाता है। कोई 230 किलोमीटर का सफर तय करने के बाद यह लोहित नदी से जुड़तीहै।अरुणाचल के पासीघाट से 35 किलोमीटर नीचे उतरकर इसका जुड़ाव दिबांग नदी से होता है, जो ब्रह्मपुत्र में परिवर्तित हो जाती है। बीते दो सप्ताह से सियांग नदी में उठ रहीं रहस्यमयी लहरों के कारण लोगों में भय है। आम लोगों में यह धारणा है कि इसके पीछे चीन की ही साजिश है। 14 अगस्त की रात से अचानक उठ रहीं भयंकर लहरों के कारण बोरगुली, सिंगार, सेरम, नामसेंग आदि दर्जनों गांवों की नदी किनारे की हजारों हेक्टेयर जमीन पानी में समा गई और नदी का विस्तार आबादी की ओर हो गया। इससे पहले चीन के नजदीक पड़ने वाले अपर सियांग के तुतिंग व गेलियों गांव में मछलियों और मवेशियों के मरने की खबरें भी आई थीं। 
पिछले साल अक्तूबर में भी बेहद साफ और निर्मल जल वाली सियांग नदी का पानी बेहद मटमैला हो गया था। इसका कई सौ किलोमीटर हिस्से का पानी एकदम काला हो गया था और पीने के लायक नहीं बचा था, वहां मछलियां भी मर गई थीं। नदी के पानी में सीमेंट जैसा पतला पदार्थ होने की बात जिला प्रशासन ने अपनी रिपोर्ट में कही थी। सियांग नदी के पानी से ही अरुणाचल प्रदेश की प्यास बुझती है। तब चीन ने कहा था कि उसके इलाके में 6.4 ताकत का भूकंप आया था, शायद यह मिट्टी उसी के कारण नदी में आई होगी। हालांकि भूगर्भ वैज्ञानिकों के रिकॉर्ड में इस तरह का कोई भूकंप उस दौरान दर्ज नहीं किया गया था। इससे पहले भी साल 2012 में सियांग नदी रातोंरात अचानक सूख गई थी। इससे पहले 9 जून, 2000 को सियांग नदी का जल स्तर अचानक 30 मीटर उठ गया था और लगभग पूरा शहर डूब गया था। 

सियांग नदी में यदि कोई गड़बड़ी होती है, तो अरुणाचल प्रदेश की बड़ी आबादी का जीवन संकट में आ जाता है। पीने का पानी, खेती, मछली पालन सभी कुछ इसी पर निर्भर हैं, सबसे बड़ी बात सियांग में प्रदूषण का सीधा असर ब्रह्मपुत्र जैसी विशाल नदी और उसके किनारे बसे सात राज्यों के जनजीवन व अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। उधर तिब्बत में यारलुंग सांगपो नदी को शिनजियांग के ताकलीमाकान की ओर मोड़ने के लिए चीन दुनिया की सबसे लंबी सुरंग बनाने की योजना पर काम कर रहा है। हालांकि सार्वजनिक तौर पर चीन ऐसी किसी योजना से इनकार करता रहा है। लेकिन यह बात किसी से छिपी नहीं है कि चीन ने इस नदी को जगह-जगह रोककर यून्नान प्रांत में आठ जल विद्युत परियोजनाएं शुरू की हैं। पिछले साल मई में चीन भारत के साथ सीमावर्ती नदियों की बाढ़ आदि के आंकडे़ साझा करने से इनकार कर चुका है। हांगकांग से प्रकाशित साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट  की एक ताजा रिपोर्ट बताती है कि चीन अरुणाचल प्रदेश से सटी सीमा पर भारी मात्रा में खनन कर रहा है, क्योंकि उसे वहां चांदी और सोने के अयस्क के बडे़ भंडार मिले हैं। भारत के लिए यह समय इस जीवन-रेखा को बचाने का है। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Senior Journalist Pankaj Chaturvedi article in Hindustan on 03 september