नक्सल प्रभावित जंगल के जीवट से मेडल तक की यात्रा
जकार्ता में चल रहे एशियाई खेलों में दुति चंद ने रजत पदक जीता है। जीत तो वह शायद स्वर्ण पदक जातीं, पर पैर पड़ने में जरा सी चूक रह गई और वह 0.02 सेकंड से पिछड़ गईं। पूरे दो दशक बाद सौ मीटर की रेस में...

जकार्ता में चल रहे एशियाई खेलों में दुति चंद ने रजत पदक जीता है। जीत तो वह शायद स्वर्ण पदक जातीं, पर पैर पड़ने में जरा सी चूक रह गई और वह 0.02 सेकंड से पिछड़ गईं। पूरे दो दशक बाद सौ मीटर की रेस में भारत ने कोई पदक जीता है। दुति ओडिशा से हैं और आदिवासी हैं। दुति के साथ कुछ और लडकियां भी कतार में हैं, जिन पर हिन्दुस्तान की उम्मीदें टिकी हैं- जौना मुर्मू व पूर्णिमा हेम्ब्रम। इनमें दुति का नाम नया नहीं है। दुति को पिछली बार राष्ट्रमंडल खेलों से बेदखल कर दिया गया था। यह 2014 की बात है। उनमें मर्दाने हार्मोन टेस्टास्टरोन की मात्रा अधिक पाई गई थी। इसमें उनका दोष नहीं था, उनकी कुदरती बनावट ही ऐसी थी। पिछले एशियाई खेलों में वह इसी विवाद के कारण भाग नहीं ले सकी थीं। उन्होंने इसके खिलाफ कोर्ट ऑफ ऑर्बिटेशन में अपील की और उनका पक्ष जीत गया। इस वजह से इंटरनेशनल एथलीट एसोसिएशन को महिला एथलीटों से संबंधित नियमों में बदलाव करने पड़े थे। इसके बाद दुति 2016 के रियो ओलंपिक में फर्राटा दौड़ी थीं। दुति की सफलता में उस माहौल का खासा योगदान है, जिसमें वह पली-बढ़ी हैं।
आदिवासी समाज में खेल की तरफ खास तरह का रुझान होता है। जंगल की विपरीत परिस्थितियां, मीलों चलकर पानी लाने की मजबूरी ,जंगली जानवरों का मुकाबला और प्राकृतिक विपदाओं का कहर उन्हें चट्टान-सा मजबूत बना देता है। इसलिए आदिवासी कुदरती तौर पर खिलाड़ी होते हैं। बस मौके की कमी होती है। यह अच्छी बात है कि अब इनके प्रति रुझान बढ़ रहा है और सरकारें भी उनके प्रशिक्षण के मामले में जागरूक हो रही हैं। पर समस्या यह है कि ये आदिवासी बच्चे अपनी क्षमता को पहचानते नहीं हैं। आदिवासी समाज बेहद संकोची है। वे लोगों से मिलना-जुलना बहुत पसंद नहीं करते। उन्हें उनके गांव से बाहर निकाल लाना भी एक बड़ी चुनौती है। ऐसे हालात में दुति महीनों से अपने घर नहीं गईं और लगातार मेडल हासिल करने के लिए संघर्ष कर रही थीं। फिर आदिवासी इतने साधन संपन्न भी नहीं होते कि बच्चों को खेल की कोचिंग दिलवा सकें।
दिलचस्प बात यह है कि दुति ही नहीं, भारत की बाकी दोनों आदिवासी खिलाड़ी भी ओडिशा से हैं और तीनों ही वहां के कलिंगा संस्थान में पढ़ाई कर रही हैं। इन खिलाड़ियों की कामयाबी के साथ ही यह संस्थान भी चर्चा में आ गया है। इस संस्था की बुनियाद पेशे से शिक्षक रहे अच्युत सावंत ने रखी है। सावंत साधनहीन बच्चों की परवरिश के लिए जाने जाते हैं। उन्हें अच्छा जीवन देना उनकी प्रतिभा को पहचानकर उसके मुताबिक प्रशिक्षण, खान-पान वगैरह का इंतजाम करना उनका संकल्प है। पर इस संकल्प के पीछे उनकी अपनी विपन्नता की दर्द भरी कहानी है। वह बताते हैं कि एक रेल दुर्घटना में पिता के निधन के बाद भारी संकट आ गया। सात भाई-बहनों के सामने पेट भरने की समस्या थी। दो दिन में एक जून के खाने का जुगाड़ मुश्किल था। ऐसी परिस्थिति में भी वह पढ़-लिख गए और उसी समय उन्होंने यह ठान लिया कि अब सारा जीवन आदिवासी और विपन्न बच्चों के लिए समर्पित कर देंगे। किसी तरह पांच हजार रुपये से दो स्ंास्थानों की स्थापाना की। एक नि:शुल्क संस्थान है, तो दूसरे में छात्र भुगतान करके दाखिला पाते हैं। संस्थान में चार बरस की उम्र से स्नातकोत्तर तक नि:शुल्क शिक्षा मिलती है। यह रिहाइशी स्कूल है। ज्यादातर बच्चे नक्सल पीड़ित परिवारों के हैं। बांग्लादेश के नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री मोहम्मद यूनुस सावंत के इस प्रयोग से इतने प्रभावित हुए कि उन्हें ऐसा ही संस्थान खोलने के लिए बांग्लादेश आमंत्रित किया। अब देश के कई हिस्सों के अलावा उनका संस्थान बांग्लादेश में भी चल रहा है। लेकिन सावंत की कामयाबी सिर्फ इतनी नहीं है कि उन्होंने ऐसे संस्थान तैयार किए हैं। उनकी असली सफलता यह है कि उन्होंने देश को एक मॉडल दिया है, जिस पर चलते हुए आदिवासी समाज की प्रतिभाओं को आगे लाया और स्थापित किया जा सकता है। ओडिशा के जो आदिवासी इलाके अभी तक नक्सली हिंसा के लिए चर्चा में थे, अब वे दुति चंद की वजह से सुर्खियों में हैं, यही क्या कम है? (ये लेखिका के अपने विचार हैं)
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