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दुर्लभ बीमारियां जिन्हें डॉक्टर भी नहीं समझ पाते

संचिता शर्मा, हेल्थ एडीटर, हिन्दुस्तान टाइम्स

स्टीफन हॉकिंग की दुर्लभ न्यूरो-डिजनरेटिव बीमारी का उनकी ख्याति में, उनके विशिष्ट भौतिक विज्ञानी होने से कम योगदान नहीं है। उनकी शख्सियत के कारण उस बीमारी ने ऐसी जागरूकता पैदा की, जो सहानुभूति से आगे जाकर शोध और दवाओं की खोज के लिए बड़े स्तर पर फंड जुटाने में कामयाबी का जरिया बनी। ऐसी ही एक दुर्लभ बीमारी मिस्थेनिया गे्रविस भी है, जिसमें इंसान तेजी से थकने लगता है, मांसपेशियां कमजोर हो जाती हैं और आंखें खोले रखने में भी दिक्कत आती है। इस क्रॉनिक ऑटोइम्यून न्यूरोमस्कुलर डिजीज में तंत्रिका तंत्र से मांसपेशियों की ओर जाने वाली तरंगें बाधित होने लगती हैं। यह बीमारी किसी भी उम्र में हमला कर सकती है, पर 40 से कम उम्र की महिलाओं और 60 साल से ज्यादा वाले पुरुषों में इसकी आशंका ज्यादा है। इसका कोई इलाज नहीं है, लक्षण नियंत्रित रखने के लिए आजीवन दवाएं लेते रहना ही विकल्प है। और कई बार दिक्कत बढ़ सकती है।

ऐसा ही एक वाकया हुआ, जब एक मित्र अचानक गिर गई। उसकी पलकें बंद होने लगीं, जबान लड़खड़ाने लगी, मांसपेशियां इतनी कमजोर कि चलना मुश्किल हो गया। इस अचानक और दोबारा दिखे लक्षण से ठीक पहले दवाएं लेने के बावजूद वह काफी देर से सहज हो पाई। उसने बताया कि यह एक क्रॉनिक बीमारी है और उसे जीवन भर हर चार घंटे पर दवाएं लेते रहना होगा। खतरनाक मिस्थेनिक उसके साथ छाया की तरह हर वक्त मौजूद है। कई बार तो हालत ऐसी हो जाती है कि वेंटिलेटर का सहारा लेना पड़ता है। 

वह 32 साल की थी, जब पहली बार इसकी चपेट में आई। यह दो दशक पहले की बात है। तब तक इस बीमारी का नाम न तो उसने सुना था, न किसी परिचित ने। उसने बताया - ‘अचानक सीने में बाईं ओर भारीपन महसूस हुआ, कमजोरी लगी और सांस लेना मुश्किल हो गया। लगा, जैसे दिल का दौरा पड़ रहा है।’ उसके चिकित्सक को भी यही लगा, लेकिन वे भी हैरत में आ गए, जब जांच में दिल की बीमारी का कोई लक्षण नहीं मिला। लेकिन लक्षण वैसे ही बने रहे। वह बताती है, ‘जिस वक्त यह सब हुआ, लग रहा था कि मैं टनों बोझ से दबी हुई हूं। फिर ये लक्षण गायब भी हो गए।’ 

परीक्षणों में कुछ न मिलने के बावजूद किसी नए नतीजे की उम्मीद में इलाज की प्रक्रिया के साथ जांच जारी रही- ‘मुझे एक दिन में टीबी की 14 दवाएं तक दे दी गईं। इसने मुझे और ज्यादा परेशान कर दिया, तो मैंने दवाएं फेंक दीं।’ अब न्यूरोलॉजिस्ट की बारी थी। उसे न्यूरो मस्कुलर दवाएं दी गईं, बाद में पता चला कि वे तो मिस्थेनिया ग्रेविस के बिल्कुल उलट थीं। होम्योपैथी की अनगिनत गोलियां भी कुछ न कर पाईं। बाद में उसकी बीमारी या ‘कमजोरी’ को  साइकोसोमैटिक यानी मनोवैज्ञानिक बता दिया गया। 

मनोवैज्ञानिकों का मानना था कि ‘मैं खुश नहीं रहती। अवसाद की शिकार हूं और मुझे अपने को इससे बाहर लाना होगा। इसका इतना बुरा असर हुआ कि मैं खुद पर ही संदेह करने लगी।’ शुक्र है कि बाद में कैलिफोर्निया में एपल वैली के एक न्यूरोलॉजिस्ट ने अंतिम रूप से उसकी बीमारी को मिस्थेनिया ग्रेविस बताया। उसके रोग को सही पहचान होने में तीन साल लग गए। दवाओं से जीवन फिर से पटरी पर तो लौटा, लेकिन इसे रफ्तार फिर भी नहीं मिली- ‘मैं कई झटके झेल चुकी हूं। अंतिम बड़ा झटका बीते अगस्त में लगा, जब तीन हफ्ते तक व्हील चेयर पर रहना पड़ा। मिस्थेनिया ग्रेविस के लक्षण आमतौर पर समय के साथ बढ़ते हैं और शुरुआती वर्षों में तो तेजी से बिगड़ते हैं, लेकिन मेरे दोस्त कहते हैं कि मैंने बीते दो दशकों में इसे हराया है।’ 

पौष्टिक भोजन, संतुलित जीवन शैली और न्यूनतम तनाव मददगार तो हो सकता है, लेकिन इस दुर्लभ बीमारी वालों की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इसका पता डॉक्टरों को ही नहीं होता, जो रोग की शिनाख्त और इलाज को मुश्किल बना देता है। ‘मेरे मामले में सबसे ज्यादा कारगर मेरा बहुत कुछ पढ़ते रहना तो था ही, बीमारी काल्पनिक ठहराए जाने के बावजूद खुद पर भरोसा न खोना बहुत सहायक बना।’ (ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:sanchita Sharma article in Hindustan on 29 march