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धान की रोपाई और स्कूल जा रहे बच्चों की पढ़ाई

रुक्मिणी बनर्जी

अभी चारों तरफ धान की रोपाई चल रही है। खेतों में मेहनत करते हुए लोग दिखाई दे रहे हैं। अच्छी फसल के लिए रोपाई ठीक समय पर होना जरूरी है। आसमान में काले बादल छाए हुए हैं। आज जरूर बारिश होगी। किसान जानते हैं कि अगर शुरुआत में चूक हो गई, तो फिर बाद में फसल अच्छी नहीं होगी। हम नालंदा जिले में इस्लामपुर प्रखंड के एक मध्य विद्यालय में हैं। खिड़की से हरे-हरे खेत दिख रहे हैं। हम छठी कक्षा के बच्चों से बातचीत करने में लगे हैं। एक महीना ही हुआ है इन्हें मध्य विद्यालय में आए हुए। छोटे स्कूल से अब वे बड़े स्कूल में आए हैं। बड़ी कक्षा, ज्यादा छात्र और मोटी-मोटी किताबें।
हर कक्षा में 50 से ऊपर बच्चे हैं। पिछले दस वर्षों में देश भर के स्कूलों में बच्चों के एडमीशन पर बहुत काम हुआ है। लेकिन शिक्षा व्यवस्था की गुणवत्ता पर प्रश्न चिह्न बना हुआ है। पिछले 12 साल से ‘असर’ की रिपोर्टें हमें बता रही हैं कि देश भर में बच्चों की पढ़ने-लिखने की मूलभूत क्षमताएं बिल्कुल संतोषजनक नहीं हैं। पढ़ाई-लिखाई को नए सिरे से मजबूत करने का बिहार सरकार का इरादा दिख रहा है। हाल ही में सरकार ने यह तय किया गया है कि प्राथमिक कक्षा के बच्चों (खासकर जो तीसरी से पांचवीं में हैं) के पढ़ने और गणित की बुनियादी कौशल पर विशेष जोर दिया जाएगा। कई साल पहले जहानाबाद और पूर्वी चंपारण में प्रशासन व प्रथम के संयुक्त प्रयास चलाए गए विशेष कार्यक्रम में बच्चों की प्रगति साफ नजर आई थी। सफलता के कई कारण थे- संकुल कोऑर्डिनेटरों का नेतृत्व, शिक्षकों की मेहनत व अधिकारियों का सकारात्मक सहयोग। इसका कुछ श्रेय सीखने-सिखाने की पद्धति को भी जाता है, जिसमें बच्चों के लिए उनके पढ़ने और गणित के वर्तमान स्तर के अनुसार समूह बनाया गया था, न कि उस कक्षा के अनुसार, जिसमें वे पढ़ रहे हैं।
लेकिन जो बच्चे पिछली कक्षाओं में बुनियादी दक्षता हासिल किए बिना अब छठी में आ गए हैं या सातवीं-आठवीं तक पहुंच गए हैं, उनका क्या होगा? उनकी दक्षता को कब और कैसे मजबूत किया जाएगा? पिछले डेढ़ महीने से हम लोग इस चुनौती का सामना करने का नया प्रयोग नालंदा जिला में कर रहे हैं। हर मध्य विद्यालय में तीन या चार गांवों से बच्चे आते हैं। उनके गांव और टोले के हिसाब से बच्चों के समूह बनाए गए हैं। हर समूह में चार-पांच बच्चे हैं, जो छठी से आठवीं के हो सकते हैं। वैसे भी ये आस-पास रहते हैं।  साथ-साथ स्कूल आते हैं। एक साथ खेलते हैं। आजकल ये अपने ही मोहल्ले में रोजाना शाम को एक घंटा समूह में बैठकर गणित की गतिविधियां कर रहे हैं। उन्हें साधारण जोड़-घटाव, गुणा-भाग रोचक तरीके से हल करने का काम दिया गया है। बच्चे बडे़ उत्साह के साथ समूह में चर्चा करके इसे हल कर रहे हैं। पिछले एक महीने में पूरे नालंदा में अभी तक लगभग 15,000 से ज्यादा ऐसे समूह सक्रिय हो गए हैं। इस कोशिश का उद्देश्य है- बच्चों में बुनियादी गणित की दक्षता को मजबूत करना। लेकिन इसके अलावा एक और भी महत्वपूर्ण उद्देश्य है कि बच्चे एक-दूसरे की मदद और सहयोग से सीखें। अटक जाने पर आपस में पूछकर समाधान करें। सरकारी विद्यालयों के शिक्षक अक्सर कहते हैं कि बच्चों के मां-बाप जागरूक नहीं हैं, वे अपने बच्चों पर ध्यान नहीं देते हैं। नालंदा जिले में हो रहे इस प्रयास से हम यह भी जानना चाहते हैं कि क्या बच्चों को अपने आप से समूह में काम करता देखकर अभिभावक भी उसमें सहायता कर रहे हैं?     
बच्चों को सक्षम बनाने के लिए हमें नई सोच, नए प्रयोग, नए उत्साह और नई उम्मीद को बांधने की जरूरत है। बच्चों को उनकी कक्षाओं में फेल करने से नई ऊर्जा नहीं मिल सकती है। बच्चे आज जो कुछ भी कर सकते हैं, वहां से हमें पहला कदम बढ़ाना होगा। आगे के कदम बच्चे खुद बढ़ाने लगेंगे। इन बच्चों की पढ़ाई, धान की रोपाई की तरह ही है। अभी विद्यालयों में कक्षा छह में आए बच्चों पर गंभीरता से ध्यान देने, उनके साथ सही और प्रभावी तरीके से काम करने और उनकी देखरेख करने से यह नई फसल निश्चित रूप से ज्यादा और अच्छी पैदावार वाली साबित होगी।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं) 

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  • Web Title:Rukmini Banerji article in Hindustan on 16 august