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आतंक के खिलाफ लड़ाई की धार कुंद करती कोशिश

अवधेश कुमार

निश्चय ही यह तमिलनाडु के बाहर बाकी देश को हतप्रभ करने वाला प्रकरण है। तमिलनाडु मंत्रिमंडल ने पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या में सजा काट रहे सभी सात अभियुक्तों को रिहा करने की राज्यपाल से सिफारिश करने का फैसला किया है। सातों पिछले 27 वर्ष से जेल में बंद हैं। फैसला भले ही अन्नाद्रमुक सरकार का हो, वहां की अधिकतर पार्टियां इसके पक्ष में हैं। द्रमुक प्रमुख एमके स्टालिन भी इसकी मांग कर चुके हैं। हालांकि यह पहली बार नहीं है। फरवरी 2014 में तमिलनाडु की तत्कालीन मुख्यमंत्री जयललिता ने भी सभी दोषियों की रिहाई का फैसला किया था। दरअसल, अभी सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका पर तमिलनाडु के राज्यपाल से राजीव गांधी की हत्या में दोषी एजी पेरारिवलन की दया याचिका पर विचार करने को कहा है,जिसके बाद पेरारिवलन की मां मुख्यमंत्री से मिलीं और यह फैसला हो गया।

वस्तुत: पेरारिवलन ने राज्यपाल के पास दया याचिका दायर की है। जबसे उसकी दया याचिका की खबर आई, तमिलनाडु की राजनीति में वैसा ही माहौल बनाने की कोशिश हुई, जैसी 2014 के आरंभ में हुई थी। तब सुप्रीम कोर्ट ने 18 फरवरी, 2014 को तीन मुजरिमों-मुरूगन, संथम और पेरारिवलन की मौत की सजा उम्र कैद में बदल दी थी। इसी के बाद सबकी रिहाई की मांग तेज हो गई और जयललिता सरकार ने इसका निर्णय भी कर दिया। रिहाई हो भी जाती, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने तत्कालीन केंद्र सरकार की याचिका पर 20 फरवरी, 2014 को इनकी रिहाई रोक दी।

21 मई, 1991 को तमिलनाडु के श्रीपेरंबदुर में राजीव गांधी की हत्या में शामिल वी श्रीहरण उर्फ मुरूगन, टी सतेंद्रराजा उर्फ संथम, ए जी पेरारिवलन उर्फ अरिवु, जयकुमार, रॉबर्ट पायस, पी रविचंद्रन और नलिनी 25 साल से जेल में बंद हैं। इनकी रिहाई के लिए तमाम मुहिम चलती रही हैं। हाईकोर्ट और राष्ट्रपति तक यह मामला बार-बार पहुंचता रहा है। नलिनी की फांसी की सजा को तो तमिलनाडु के राज्यपाल ने 24 अप्रैल, 2000 को उम्र कैद में बदल दिया और बाद में उसकी रिहाई के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका डाली गई,  हालांकि कोर्ट ने 28 अक्तूबर, 2014 को इसे खारिज कर दिया। रिहाई की यह अपील वहां कई स्तरों पर अलग-अलग तरीके से होती रही है। 

यह सब स्पष्ट करता है कि इस रिहाई मुहिम में कैसी-कैसी ताकतें लगी होंगी और कितने स्तरों से प्रयास हुए होंगे। पेरारिवलन ने तो राष्ट्रपति से दया याचिका खारिज होने के बाद आरटीआई के जरिए गृह मंत्रालय से याचिका खारिज होने का आधार तक पूछ लिया था? यह अपनी तरह की पहली घटना थी, जब आरटीआई में यह सवाल आया था। जाहिर है, यह सब मुद्दे को हवा देने की ही कुटिल रणनीति थी। 

इस मामले में ध्यान देने की बात है कि सुप्रीम कोर्ट ने इनमें से किसी को निर्दोष नहीं माना। और अगर वे निर्दोष नहीं हैं, तो फिर इनके पक्ष में किसी भी तरह की सहानुभूति का कोई कारण नहीं हो सकता। लेकिन राजनीति में अपने-अपने तरह से फैसले होते हैं और उन्हें भुनाने की कोशिशें भी। यही यहां भी हुआ। यह सामान्य बात नहीं है कि लगातार लिट्टे की मुखालफत करने वाली जयललिता ने तब इनकी रिहाई का फैसला किया था और अब उनकी उत्तराधिकारी सरकार ने।  

यह सच तो छानबीन में और जैन आयोग की जांच में भी साफ हो गया था कि राजीव गांधी की हत्या लिट्टे के षड्यंत्र का हिस्सा था और जिन्हें सजा मिली, वे किसी न किसी रूप में उसमें संलिप्त थे। स्वयं लिट्टे ने स्वीकार किया कि राजीव गांधी की हत्या उसने ही कराई थी। ऐसे में इस राजनीति का क्या अर्थ, जो आतंकवाद लड़ने की हमारी मंशा पर ही सवाल खड़े कर दे। यहां सवाल और भी तमाम हैं। जिस तरह दया याचिकाओं को दबाकर रखा गया, यानी उन्हें स्वीकारने या रद्द करने में हीलाहवाली की गई, वह भी सवाल खड़े करती है। क्या यह सब वोट बैंक की राजनीति की देन नहीं है। दुर्भाग्य से पूर्व प्रधानमंत्री की हत्या के अभियुक्तों को बचाने की राजनीति आज भी थमी नहीं है। ऐसी मुहिम आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई की धार को ही कुंद करेंगी।
(ये लेखक के अपने विचार हैं) 

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  • Web Title:Nazia Hindustan column by Awadhesh Kumar on 12 september