Nazariya Column of Hindustan Hindi Newspaper by Environmentalist Radhika Khosla 7th of October 2019 Edition - जलवायु के मोर्चे पर सबको निभानी होगी भूमिका DA Image
17 नबम्बर, 2019|6:22|IST

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जलवायु के मोर्चे पर सबको निभानी होगी भूमिका

environmentalist radhika khosla

जलवायु परिवर्तन पर कुछ बड़ी शक्तियां अब भी खामोश हैं। पिछले दिनों संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील मंच से अनुपस्थित थे। 70 देश, 10 क्षेत्र, 100 शहर वर्ष 2050 तक कार्बन उत्सर्जन को शून्य करने पर सहमत हो गए हैं। हम पर्यावरण के मोर्चे पर विश्व स्तर पर अनेक बदलाव देखने लगे हैं, अत: आपातकालीन कदम उठाने की जरूरत है। जकार्ता, नैरोबी, मैक्सिको सिटी, साओ पाउलो से लेकर चेन्नई, मुंबई, नई दिल्ली, कोलकाता में पर्यावरण से जुड़ी छवियां चिंताजनक हैं। ये सब विकास की चुनौतियों वाले शहर हैं। इनकी तात्कालिक प्राथमिकताएं दीर्घकालिक चिंताओं के विपरीत जा रही हैं। ये सभी शहर अपने लोगों के लिए नौकरियों, बिजली, आवास इत्यादि समस्याओं से जूझ रहे हैं। आज पर्यावरण के हित में जागती जनभावनाओं का स्पष्ट संदेश है कि पर्यावरण की रक्षा करना भविष्य का नहीं, आज का मुद्दा है और अच्छी बात यह कि यह मुद्दा संयुक्त राष्ट्र के गलियारे में पूरी तरह से सलामत है। चूंकि रोजमर्रा के जीवन पर इसका प्रभाव पड़ता है, तो क्या लोगों की चिंता उस दिशा में बढ़ रही है, जब वे सोचने लगें कि जलवायु परिवर्तन रोकने के लिए हमें क्या करना है?

यह प्रश्न पूछने का अहम कारण यह है कि जलवायु संकट से निपटना अकेले कुछ देशों के प्रमुखों का कार्य नहीं है। वास्तव में, पेरिस समझौते में निर्धारित वैश्विक तापमान 2 डिग्री सेल्सियस कम करने की दिशा में सफलता इस बात पर निर्भर है कि इस लक्ष्य के लिए राष्ट्रों, शहरों, घरों और व्यक्तियों को कैसे तैयार किया गया है। जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर गठित वैश्विक पैनल (आईपीसीसी) की रिपोर्ट में कहा गया है, वैश्विक तापमान के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए केवल दो रास्ते हैं : एक, वैश्विक ऊर्जा मांग को काफी कम कर देना और दो, नकारात्मक उत्सर्जन प्रौद्योगिकियों (कार्बन कैप्चर और भंडारण के साथ जैव-ऊर्जा सहित) का उपयोग करना। ऐसी प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल करना, जिससे वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा को कम किया जा सके। हालांकि ऐसी प्रौद्योगिकियां अभी प्रदर्शन के चरण में ही हैं। कार्बन उत्सर्जन कम करने का पहला तरीका है- ऊर्जा मांग में कमी लाना, यह तकनीकी रूप से ज्यादा मुफीद है और इसकी लागत भी कम है। 

आज अधिकांश ऊर्जा सेवाओं का उपयोग चार व्यापक श्रेणियों में किया जाता है। ये श्रेणियां हैं- भवन, परिवहन, भोजन और वस्तु। इनमें से प्रत्येक में कई तरह की सेवाएं हैं, जो जीवन की बेहतर गुणवत्ता के लिए महत्वपूर्ण हैं, जो विकास की बुनियाद तैयार करने के लिए महत्वपूर्ण हैं। वर्तमान और भविष्य की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करना और इसके साथ ही ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन को कम करने की कठिन चुनौती भी है। उदाहरण के लिए, वातानुकूलन के लिए विशेष रूप से एसी का इस्तेमाल। एसी के लिए अमेरिका और जर्मनी में उतनी ही बिजली की मांग होने वाली है, जितनी बिजली की मांग अन्य तमाम कार्यों में मिलाकर होती है। ऐसे में, बुनियादी तौर पर हमारी जीवनशैली और उसमें अंतर्निहित सामाजिक मानदंडों को बदलना होगा। इतने सारे बदलाव करना तकनीकी बदलाव करने से ज्यादा कठिन लगता है। हमें ऐसी तकनीकी खोज को मुकाम पर पहुंचाना होगा, ताकि ज्यादा आसानी से उत्सर्जन को कम किया जा सके।

पर इससे हमारे रोजमर्रा के जीवन में बदलावों की जरूरत खत्म नहीं होगी। जीवन में बदलाव के कुछ प्रमुख उदाहरण हैं, ऊर्जा अनुकूल उपकरणों का उपयोग, मांसाहारी भोजन की कम खपत, सार्वजनिक परिवहन का उपयोग और कचरे में कमी करना। ये समाधान उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए और अधिक प्रासंगिक हैं, जहां बुनियादी ढांचा निर्माण का कार्य चालू है। वास्तु-शिल्प ऐसा हो कि प्रदूषण की गुंजाइश कम हो और ऊर्जा की कम से कम जरूरत पडे़। निजी वाहन और घरेलू खपत पर भी ध्यान देने की जरूरत है। यह एक ऐसा मोर्चा है, जहां व्यक्ति और समाज, दोनों की अहम भूमिका है। भूगोलविद् माइक हुल्मे ने कहा है, जलवायु परिवर्तन इतनी बड़ी समस्या नहीं है कि जिसे हल किया जाना चाहिए, क्योंकि यह एक ऐसी स्थिति है, जिसके तहत इंसान अपने जीने के तरीके और खुद को अनुशासित करने के ढंग तलाश करता है। 

Note: (ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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