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भारतीय लॉन टेनिस के लिए बंध रही नई उम्मीदें

मनोज चतुर्वेदी वरिष्ठ खेल पत्रकार

भारतीय टेनिस ने दुनिया को रामनाथन कृष्णन, विजय अमृतराज, रमेश कृष्णन और लिएंडर पेस जैसे दिग्गज खिलाड़ी दिए हैं। इनमें हम यदि पेस को छोड़ दें, तो बाकी सभी का सिंगल्स में शानदार प्रदर्शन रहा है। इन सभी खिलाड़ियों के उभरने के समय में काफी अंतर है और यह अंतर एक दशक तक का है। यह बताता है कि हमें लगातार बड़ी प्रतिभाएं नहीं मिली हैं। दिलचस्प बात यह है कि पिछले एक दशक में जितने भी खिलाड़ियों ने टेनिस में थोड़ी-बहुत चमक बिखेरी है, वे सभी विदेशों में ट्रेनिंग लेने के बाद ही इस लायक बने। इनके अलावा सोमदेव देववर्मन और युकी भांबरी भी टॉप 100 में हैं, पर ये दोनों ही इस स्थिति में ज्यादा देर टिके नहीं रह सके। इस कड़ी में ही नया नाम जुड़ा है प्रजनेश गुणोरन का।

प्रजनेश ने अभी कुछ ही समय पहले 97वीं रैंकिंग हासिल की थी। इसके बाद इंडियन वेल्स में हुए बीएनपी पारिबास टेनिस टूर्नामेंट में तीसरे राउंड में इवो कार्लोविच से हारने के पहले उन्होंने 17वीं सीड निकोलोज बासिलशविली और इससे पहले 13वीं रैंकिंग तक पहुंच चुके बेनोइट पेयरे को हराकर यह तो दिखा दिया है कि उनमें टिके रहने का माद्दा है। इन प्रदर्शन के बाद अगले हफ्ते उनकी रैंकिंग में और सुधार संभव है। प्रजनेश का लक्ष्य इस साल किसी समय पहले 50 खिलाड़ियों में अपना नाम दर्ज कराना है। संन्यास लेने के बाद भी लगातार टेनिस से जुड़े रहने वाले विजय अमृतराज ने जब प्रजनेश को इंडियन वेल्स में खेलते देखा, तब उन्हें वह टॉप 50 वाला मेटीरियल नजर आए। 

हम यदि पिछले कुछ सालों को देखें, तो देश को डबल्स में तो पेस के अलावा महेश भूपति और रोहन बोपन्ना जैसे दिग्गज खिलाड़ी मिले, लेकिन सिंगल्स में विश्व स्तरीय खिलाड़ी मिलने में लगातार दिक्कत हो रही है। मौजूदा टेनिस का पावर गेम में बदल जाना भी इसकी वजह हो सकती है। युगल में तो दो खिलाड़ियों के बीच जिम्मेदारी बंट जाने से इसमें इस्तेमाल होने वाली ताकत का स्तर कुछ कम हो जाता है, लेकिन सिंगल्स में खेलने के लिए अतिरिक्त फिटनेस की जरूरत पड़ती है। मौजूदा समय में टेनिस खेलने के लिए पहले के मुकाबले ज्यादा दमखम की जरूरत पड़ती है। आयोजकों ने खेल को बेचने के वास्ते लंबी रैलियां करने के लिए गेंद का वजन बढ़ा दिया और कोर्ट की तेजी को कम कर दिया, जिससे खिलाड़ियों को अंक पाने के लिए ज्यादा जूझना पड़ता है। कहा जाता है कि यूरोपीय और अमेरिकी खिलाड़ियों की तुलना में भारतीय खिलाड़ियों के शरीर की संरचना की अपनी सीमाएं हैं। वे जब अतिरिक्त फिटनेस के लिए प्रयास करते हैं, तो शरीर धोखा दे जाता है। इसे हम महेश भूपति के एक उदाहरण से समझ सकते हैं। भूपति ने करियर के शुरुआती दिनों में एक विदेशी ट्रेनर रखा था। उसने शरीर पुश करने के लिए उन्हें बहुत दौड़ाया, जिससे वह हैमस्ट्रिंग का शिकार बन गए। यह उनके शरीर के बोझ न ले पाने के कारण हुआ। 

प्रजनेश की शुरुआत भी कुछ ऐसे ही हुई, लेकिन प्रजनेश की कभी न हार मानने वाली प्रवृत्ति उन्हें निरंतर आगे ले जा रही है। एक समय था, जब उन्होंने पांच साल तक भारतीय सर्किट में खेला ही नहीं और लगातार चोट की समस्या करियर को मुश्किल में डाल रही थी। हालांकि वह अमेरिका में कॉलेज टेनिस खेलते रहे। इसके बाद उन्होंने कुछ साल पहले जर्मनी की अलेक्जेंडर वास्के अकादमी में ट्रेनिंग ली। जिसके बाद प्रजनेश की बॉडी लैंग्वेज ही बदल गई। प्रजनेश के साथ ही इस समय भारतीय टेनिस में दो और सिंगल्स खिलाड़ी युकी भांबरी और रामकुमार रामनाथन अपना जलवा बिखेर रहे हैं। युकी भांबरी इन तीनों में सबसे पहले टॉप 100 में पहुंचने वाले थे, लेकिन जल्द ही ताकत के जवाब देने से वह पिछड़ गए। रामकुमार रामनाथन 111वीं रैंकिंग तक पहुंचने के बाद अब 133वीं रैंकिंग पर हैं। ये तीनों ही टॉप 100 में आ जाएं, तो माना जा सकता है कि भारतीय टेनिस की तकदीर बदल सकती है। नए खिलाड़ियों के आने का सिलसिला जारी रहे, इसके लिए देश में ऐसी व्यवस्थाएं करनी होंगी कि युवाओं को शुरुआती ट्रेनिंग के लिए विदेश न जाना पड़े। 
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Nazariya Column in Hindustan 14th March