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चीन की गिरती विकास दर   में भारत की संभावनाएं

जयंतीलाल भंडारी, अर्थशास्त्री

इन दिनों देश और दुनिया के अर्थ-विशेषज्ञ यह कहते दिखाई दे रहे हैं कि चीन की विकास दर जिस तेजी से घट रही है और वहां जिस तेजी से मंदी का परिदृश्य पैदा हो रहा है, उसमें भारत के लिए नए मौके उभर रहे हैं। इन मौकों को अपनी मुट्ठी में करके भारत तेजी से विकास की डगर पर आगे बढ़ सकता है। हाल ही में चीन के राष्ट्रीय सांख्यिकी ब्यूरो (एनबीएस) ने कहा है कि चीन में सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी की वृद्धि दर वर्ष 2018 में घटकर 6़ 6 फीसदी पर आ गई है। यह पिछले 28 वर्षों में अब तक की सबसे धीमी वृद्धि दर है। इससे चीन की अर्थव्यवस्था में धीमापन का पता चलता है। 
चीन की मंदी की प्रकृति ढांचागत है। पिछले 28 वर्षों में जोरदार वृद्धि के दौरान चीन विशिष्ट निवेश और निर्यात आधारित मॉडल के सहारे आगे बढ़ रहा था। चीन में वित्तीय बचत और विदेशी निवेश का प्रयोग बड़ी परियोजनाओं और  निर्यातोन्मुखी विनिर्माण में किया गया। इसके कारण वह  दुनिया की फैक्टरी के रूप में उभरकर सामने आया। उसका विदेशी मुद्रा भंडार लगातार बढ़ता गया और व्यापार अधिशेष दुनिया के अधिकांश देशों से अधिक हो गया। लेकिन 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के बाद चीन की सरकार विभिन्न पूंजी आधारित क्षेत्रों को जमकर सस्ता कर्ज मुहैया कराती रही, जिससे वृद्धि तो मजबूत बनी रही, लेकिन पूंजी की उत्पादकता में काफी कमी आई और विकास दर में कमी आ गई। अब चीन अपनी अर्थव्यवस्था को नए सिरे से संतुलित करने के लिए निर्यात से हटकर इनोवेशन और खपत में निवेश बढ़ाने की रणनीति पर आगे बढ़ा है। मगर अब चीन के लिए निकट भविष्य में मंदी घटाना और विकास दर बढ़ाना कठिन काम है। 
ऐसे में, भारत के लिए चार तरह के मौके उभरते दिख रहे हैं। एक, चीन को भारत से निर्यात बढ़ सकता है। दो, अमेरिका के साथ उसकी कारोबारी जंग के कारण भारत से अमेरिका को निर्यात में तेज बढ़ोतरी हो सकती है। तीन, भारत के लिए वैश्विक आपूर्ति शृंखला में अपनी जगह बनाने का अवसर बनेगा तथा चार, भारत दुनिया का नया कारखाना बन सकता है। 
भारत से चीन को होने वाले निर्यात के बढ़ने की संभावना इसलिए बढ़ गई है कि उसे ऑर्गेनिक केमिकल, लौह अयस्क और कपास जैसे कच्चे माल की बड़ी मात्रा में जरूरत है। अमेरिका के साथ कारोबारी जंग के कारण वहां से आने वाले ऐसे पदार्थों की आवक कम हो गई है। ऐसे में, भारत के लिए चीन में कपास, लौह अयस्क, ऑर्गनिक केमिकल व विर्निमित उत्पादों के वास्ते नई बाजार संभावना दिखाई दे रही है। अमेरिका और चीन के बीच ‘ट्रेड वॉर’ से भारत को फायदा हुआ है। पिछले साल जून से लेकर नवंबर 2018 के बीच भारत से चीन को निर्यात में 32 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। 
एक बात, जो इस दौर में भारत को आकर्षक बनाए हुए है, वह है उभरते बाजारों में बड़े निवेश योग्य विकल्पों की कमी के बीच भारत की अधिक आर्थिक अनुकूलता। भारत में अमेरिका के राजदूत केनेथ आई जस्टर का कहना है कि भारत अमेरिकी उद्योग, कारोबार और कंपनियों के लिए नया निवेश हब बन सकता है। चूंकि कई अमेरिकी कंपनियां लगातार चीन में उद्योग कारोबार करने में बढ़ती दिक्कतों की शिकायत कर रही हैं। ऐसे में, गुणवत्तापूर्ण मैन्युफैक्चरिंग उत्पादन में चीन से अच्छी स्थिति रखने वाला भारत अमेरिकी अर्थव्यवस्था में उसकी जगह ले सकता है। 
चीन की मंदी के बीच तेजी से उभरते हुए आर्थिक मौकों का फायदा उठाने के लिए हमें अपने आर्थिक सुधारों को गतिशील करना होगा। विभिन्न आर्थिक अध्ययनों में यह बात उभरकर सामने आई है कि जीएसटी भारत के लिए लाभप्रद है, पर उपयुक्त क्रियान्वयन के अभाव में इसका लाभ अर्थव्यवस्था को पर्याप्त रूप में नहीं मिल पाया। इसलिए जीएसटी दरों से संबंधित उलझनों का निराकरण किया जाना होगा। फिर देश की अर्थव्यवस्था को ऊंचाई देने के लिए मैन्युफैक्र्चंरग सेक्टर की अहम भूमिका बनानी होगी। उन ढांचागत सुधारों पर भी जोर देने की जरूरत है, जिससे निर्यातोन्मुखी विनिर्माण क्षेत्र को गति मिल सके। 
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:najariya hindustan column on 8 february