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परंपरा के पुराने संकल्पों को याद करने का पर्व

सूर्यकांत द्विवेदी

गोवर्धन पर्व का सीधा संबंध प्रकृति और पशु धन से है। दीपावली से अगले दिन कार्तिक शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को भारतीय जनमानस इस पर्व को मनाता है। इस दिन  गायों की पूजा करने, अन्न कूट का भोग लगाने की परंपरा है। लेकिन यह त्योहार यहीं तक सीमित नहीं है। भारतीय समाज लोक परंपराओं, पौराणिक मान्यताओं और विभिन्न लोक संस्कृतियों में रचा-बसा समाज है। यह समाज अपने त्योहारों से कुछ न कुछ लेता है और अपनी मान्यताओं के अनुसार समाज को कुछ देता है। 

गोवर्धन पर्व का आशय केवल गऊ पूजा नहीं है। इसके पुराने आख्यान पर जाएं, तो दो बातें महत्वपूर्ण हैं। एक, व्यक्ति पूजा और दूसरा एकाधिकार। धार्मिक दृष्टि से एकल पूजा को श्रेष्ठ कहा गया है, लेकिन व्यक्ति पूजा को निषेध माना गया है। ब्रज के लोग व्यक्ति पूजा करते थे। उनको लोभ था कि इंद्र की पूजा करने से उन पर उनकी कृपा होती रहेगी। वर्षा होती रहेगी, तो धन-धान्य की कमी नहीं रहेगी। दूसरे ब्रजवासियों को भय था कि यदि इंद्र की पूजा बंद कर दी, तो वह कुपित हो जाएंगे। अतिवर्षा कर दी, तो नाहक परेशानियों का सामना करना पड़ेगा। भय बहुत बड़ा कारक होता है। भय से धर्म की उत्पत्ति तो नहीं होती, लेकिन भय के बिना प्रीत भी नहीं होती। दो ही कारणों से हम व्यक्ति पूजा करते हैं- डर से या प्रभाव से। भगवान श्रीकृष्ण ने इसी डर को समाप्त किया। ब्रजवासियों से कहा कि इंद्र की पूजा बंद कर दो, कुछ नहीं होगा। लेकिन ब्रजवासियों के हृदय में भय व्याप्त था। वे बोले, कान्हा तुम कहते तो हो, लेकिन हमारा मन नहीं मानता। यदि इंद्र नाराज हो गए, तो? लीलाधर श्रीकृष्ण ने बहुत समझाया, तब व्यक्ति पूजा बंद हुई। पूजा बंद होने से इंद्र कुपित हो गए। अतिवर्षा होने लगी। तब गिरधारी भगवान श्रीकृष्ण ने उंगली पर पर्वत को उठाकर समस्त लोगों को उसकी छाया में ले आए। यह लीला सात दिन तक चलती रही। अंत में, इंद्र  भगवान को भी अपनी गलती का एहसास हुआ। उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण से कहा कि मुझे अब अनुभव हुआ कि व्यक्ति से बढ़कर समष्टि की पूजा महान होती है।

गोवर्धन पर्व वस्तुत: इसी समष्टि की पूजा है। यह पर्व अहं ब्रह्मास्मि से बाहर निकालता है। दिवाली से अगले दिन गोवर्धन पर्व का आयोजन भी कहीं न कहीं हमको लोक संस्कृतियों से प्रकृति की ओर ले जाता है। दिवाली पांच त्योहारों की पर्व माला है। धनतेरस यानी धातु, नरक चतुर्दशी यानी तन-धन, दिवाली- प्रकाश धन, गोवर्धन यानी पशु धन और भैया दूज-प्रेम धन। इन सभी में लक्ष्मी का वास है। लक्ष्मी का पहला वास धातु माना गया है। दूसरा वास अन्न और तीसरा पशु धन। गाय भी लक्ष्मी जी की ही प्रतीक हैं। गाय से हटकर लक्ष्मी की कल्पना नहीं की जा सकती। 

विडंबना देखिए, आज हम बातें चाहे जितनी भी कर रहे हों, लेकिन इसी पशु धन की रक्षा नहीं कर पा रहे हैं। यूं गोशालाएं हैं, लेकिन किस हाल में, यह किसी से छिपा हुआ नहीं है। गायों को हम कितना भोजन देते हैं, यह भी सर्वविदित है। पहले गौ-ग्रास हर घर में निकाली जाती थी, अब बंद है। इस ग्रास से गाय का भला नहीं होता था, लेकिन हम इस ग्रास के माध्यम से गायों के संवर्धन का संकल्प लेते थे। गुरु वशिष्ठ ने गायों के कुल का विस्तार किया था। उन्होंने कामधेनु, कपिला, देवनी, नंदिनी और भौमा आदि प्रजातियां विकसित की। श्रीकृष्ण ने गऊ पूजा और गौशालाओं के निर्माण की नींव रखी। गायों को चराकर गोपाष्टमी मनाने की परंपरा रखी। 

गोवर्धन का पर्व हमारे पुराने संकल्पों को याद दिलाता है। गोवर्धन की प्रासंगिकता भी यही है कि हम प्रकृति के धर्म को समझें। प्रकृति के दोहन से बचें। प्रदूषण से स्वयं बचें और अपने पशुओं को भी बचाएं। गायों की पूजा करने और अन्नकूट का भोग लगाने मात्र से गोवर्धन का संदेश पूरा नहीं होता। इस पर्व के व्यापक अर्थ हैं। प्रकृति के प्रति हमारी नादानियों के संकेत हमको हाल-फिलहाल में मिल भी रहे हैं। असमय वर्षा, ऋतुओं का बदलता मिजाज और प्रदूषण की मार क्या यह बताने को काफी नहीं है कि अब हमको फिर से एक छतरी यानी एक और गोवर्धन पर्वत की आवश्यकता है। गोवर्धन जी की यह परिक्रमा हमारे संकल्प के साथ प्रारंभ हो, यही लोकमानस की शुभेच्छा है।   

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  • Web Title:najariya hindustan column on 7th november