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बेरोजगारी के दौर में बेसिक इनकम की अवधारणा

नियाज फारूकी सीनियर असिस्टेंट एडीटर, हिन्दुस्तान टाइम्स

आने वाले वर्षों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (कृत्रिम बुद्धिमता) ऑटोमेशन यानी स्वचालन को एक अभूतपूर्व मुकाम पर ले जाएगी। यह हमारे जीने और रोजगार के तरीकों को व्यापक रूप से बदल देगी। मैकिंजे के मुताबिक, इसकी वजह से 2030 तक दुनिया भर में 80 करोड़ लोग बेरोजगार हो सकते हैं। विकासशील देशों में स्थिति तो और भयावह हो सकती है। माना जा रहा है कि इस अवधि में भारत में 69 फीसदी नौकरियां गैर-प्रासंगिक हो जाएंगी। तकनीकी संसाधनों के अत्यधिक असमान वितरण को देखते हुए यह एक ऐसी तस्वीर है, जो हमें डराती है। हालांकि एलन मस्क या मार्क जकरबर्ग जैसे बड़े खिलाड़ी, जिनके इनोवेशन आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के इस विकास-क्रम को प्रभावित कर सकेंगे, यही मानते हैं कि इसका समाधान यूनिवर्सल बेसिक इनकम (यूबीआई) में छिपा है।
गरीबों के लिए न्यूनतम आय की गारंटी की घोषणा भारत में पिछले दिनों कांग्रेस अध्यक्ष ने की। सत्तारूढ़ भाजपा के पास भी कमोबेश ऐसे ही वादे हैं। मगर इसके मौजूदा स्वरूप में लागू करने से इस तरह की योजनाओं से सरकारी खजाने पर भारी दबाव पड़ता है। ऐसे में, क्या भारतीय राजनीतिक वर्ग ने अनजाने में एक ऐसे भविष्य की रूपरेखा तो नहीं तय कर दी, जिसमें हमारे सामने बेरोजगार लोगों का एक स्थाई वर्ग होगा, जिसको जीवित रहने के लिए राज्य के समर्थन की दरकार रहेगी?
औद्योगिक क्रांति के साथ जब मशीन का उद्भव हुआ था, तब इसने बहुत हद तक कार्य-संस्कृति को लोकतांत्रिक बना दिया था। मगर आज इतिहास में पहली बार इंसान अपने अस्तित्व को लेकर दुविधा में है। हम में से कई लोग बेरोजगार होने के खौफ में जी रहे हैं, क्योंकि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस न सिर्फ हमारे शारीरिक श्रम को गैर-प्रासंगिक बनाती है, बल्कि यह इंसानी मस्तिष्क को भी चुनौती देती है। और यह समय के साथ बेहतर होती जाएगी। हालांकि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के प्रसार के साथ रोजगार के नए दरवाजे भी खुल सकते हैं, लेकिन इसके लिए इंसान को अपनी दक्षता लगातार निखारनी होगी और उसे समयानुकूल बनाकर रखना होगा। मगर दिक्कत यह है कि इस बदलाव के इतनी जल्दी अनुकूल होने के लिए न तो हम भावनात्मक तौर पर तैयार हैं ,और न ही मानसिक रूप से। हमारा बुनियादी ढांचा भी इसके लिए तैयार नहीं है। 
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ऐसी नौकरियों का पिटारा बेशक खोल दे, जो अभी हमारी कल्पना से बाहर हैं और साथ-साथ रोजगार के नुकसान की भरपाई भी कर दे, मगर यह अभूतपूर्व असमानता की वजह भी बन सकती है। इसमें इस इंटेलिजेंस से संपन्न विकसित देश और जकरबर्ग जैसे लोग इतनी तेजी से आगे बढ़ेंगे कि इससे विपन्न लोग शायद ही वहां तक पहुंचने की सोच पाएं। वह ऐसा दौर होगा, जिसमें शुरू में अप्रत्याशित विकास तो होगा, लेकिन वेतन या रोजगार में मामूली वृद्धि होगी। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस द्वारा संचालित ऑटोमेशन से उत्पादों की लागत अंतत: कम होगी, जिसके कारण बची हुई नौकरियों के वेतन में कमी और अर्थव्यवस्था व रोजगार में ठहराव आएगा। यह बाजार के पतन का कारण भी बन सकता है। ऐसे में, अर्थव्यवस्था को चालू रखने के लिए व्यावसायिक समझ यूबीआई बनाएगा। 
इस ‘बेसिक इनकम’ को डच इतिहासकार रटगर ब्रेगमैन ‘लोगों के लिए उद्यम पूंजी’ कहते हैं। यह नौकरियों में नुकसान की भरपाई कर सकता है और इनोवेशन में भी मदद कर सकता है। कई सर्वे बताते हैं कि इस उम्र के युवा अपने काम के घंटों को सुखद नहीं मानते। संभव है, यूबीआई की मदद से किए जाने वाले क्रिएटिव काम हैप्पीनेस इंडेक्स में हमारी स्थिति बेहतर बनाएं। कभी लोग अकारण शोर मचाते थे कि मशीनों व कंप्यूटर उनकी नौकरी खा जाएंगे। पर इतिहास में पहली बार न सिर्फ इंसान की शारीरिक ताकत, बल्कि उसके सोचने की शक्ति को भी ललकारा जा रहा है। औद्योगिक और आईटी युग से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस युग की तरफ जाने का मतलब वास्तव में नौकरियों का नुकसान है, यानी ‘शोर’ के सच होने की खबर बहुत दूर नहीं। ऐसे में, भारत जैसे विकासशील देशों में यूबीआई जैसे कदम इसके समाधान में भागीदार बन सकते हैं।

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  • Web Title:najariya hindustan column on 7 february