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क्या मास्क के सहारे प्रदूषण से लड़ा जा सकता है

संचिता शर्मा, हेल्थ एडीटर, हिन्दुस्तान टाइम्स

इस गुलाबी ठंडक में आस-पास के बाजार पटाखों से कहीं ज्यादा मास्क और ‘रेस्परेटर’ (श्वास यंत्र) से पटे दिख रहे हैं। ऐसे में, तमाम विकल्पों में से सही को चुनना हमारे लिए खासा मुश्किल हो रहा है। सवाल कई हैं? क्या सभी मास्क या रेस्परेटर प्रदूषण से हमारी रक्षा करते हैं? किस प्रकार के मास्क या रेस्परेटर हमारे लिए मुफीद हैं? क्या महंगे रेस्परेटर ‘डिस्पोजेबल’, सर्जिकल मास्क से बेहतर होते हैं? निस्संदेह, ये सभी कुछ न कुछ हमारी सुरक्षा करते हैं, पर काफी कुछ इस पर निर्भर करता है कि वे हमारे चेहरे पर किस हद तक फिट बैठते हैं।
दरअसल, मास्क और रेस्परेटर तरल व वायुमंडलीय सूक्ष्म कणों (पीएम 10 और पीएम 2.5, दोनों) को तो छानते हैं, मगर वे रसायनों, गैस और वाष्प से हमारी रक्षा नहीं करते। अगर उन्हें ढंग से पहना जाए, तो रेस्परेटर न सिर्फ गाड़ियों से निकलने वाले उत्सर्जन से हमारी सुरक्षा करते हैं, बल्कि सांस और दिल से जुड़े रोगों का खतरा भी कम करते हैं। और तो और, ये छोटी बूंदों और रोगाणुओं (वायरस और बैक्टीरिया) को रोककर लोगों को संक्रमण से भी बचाते हैं। एन 95 रेस्परेटर तो वायरस और अन्य संक्रामकों का बखूबी सामना करता है, लेकिन वह भी तब, जब इसका दोबारा इस्तेमाल न किया जाए। चूंकि जिन लोगों को सांस या दिल से जुड़ी गंभीर बीमारियां हैं, या संक्रमण या सांस लेने में दिक्कतें पैदा करने वाली अन्य समस्याएं हैं, उन्हें रेस्परेटर से सांस लेने में परेशानी हो सकती है। इसीलिए उन्हें उपलब्ध विकल्पों में से बेहतर के चुनाव के बारे में अपने डॉक्टर से जरूर बात करनी चाहिए।
बाजार में उपलब्ध मास्क कितने प्रभावशाली हैं, यह जानने के लिए चीन में अध्ययन किया गया। इस अध्ययन का नतीजा बताता है कि बाजार में उपलब्ध ज्यादातर मास्क चेहरे पर पूरी तरह फिट न होने के कारण सूक्ष्म कणों और काले कार्बन से हमारा बचाव नहीं कर पाते हैं। इनमें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रमाणित मास्क भी शामिल हैं। यह अध्ययन बीएमजे जर्नल, ऑक्युपेशनल ऐंड एनवायरन्मेंटल मेडिसिन  में अप्रैल 2018 में प्रकाशित हुआ था। इसके लिए अतिसूक्ष्म कणों (पीएम 2.5) और काले कार्बन से सुरक्षा का दावा करने वाले कुल नौ तरह के मास्क के प्रभावों को जांचा गया था। 
मास्क और रेस्परेटर अच्छी तरह से पहनना चाहिए और उसे नाक और मुंह के ऊपर इस तरह फिट होना चाहिए कि दूषित हवा अंदर लीक न हो। प्रमाणित मास्कों की तुलना में अन्य आम मास्क कम प्रभावशाली होते हैं, क्योंकि वे चेहरे पर पूरी तरह से फिट नहीं बैठते। इनमें वे मास्क भी शामिल हैं, जो अतिसूक्ष्ण कणों को भी फिल्टर कर सकने वाली सामग्री से बने होते हैं। इतना ही नहीं, कानों में फंसने वाले मास्क की तुलना में वे मास्क कहीं ज्यादा चेहरे पर फिट बैठते हैं, जो सिर से पट्टी के सहारे बंधे होते हैं। अध्ययनों से यह भी पता चला है कि उच्च गुणवत्ता वाले मास्क भी तभी सुरक्षित होते हैं, जब वे अच्छी तरह से चेहरे पर फिट बैठ जाएं। इसकी वजह यह है कि मास्क पहनने के बाद लोग गहरी और थोड़ी तेज सांस लेते हैं, जिसके कारण लीकेज होने पर हम कहीं अधिक प्रदूषित हवा अपने फेफड़ों में भर लेते हैं।
किसी रेस्परेटर पर यदि ‘एन 95’ और ‘एन 99’ दर्ज है, तो इसका मतलब है कि परीक्षण के दौरान उसने क्रमश: 95 फीसदी व 99 फीसदी तक महीन कणों (0.3 माइक्रोन) को रोका है। अगर इन्हें सही ढंग से पहना जाए, तो एन 95 रेस्परेटर सामान्य या सर्जिकल मास्क की तुलना में कहीं बेहतर होते हैं। हालांकि तब भी बाहरी परिस्थिति में प्रदूषण की गिरफ्त में आने का खतरा बना रहता है। अगर डिस्पोजेबल फिल्टर साथ उपलब्ध न हो, तो फेसमास्क और रेस्परेटर को सिर्फ एक बार उपयोग करना चाहिए। मास्क का दोबारा इस्तेमाल संक्रमण का जोखिम बढ़ा सकता है, क्योंकि हमारी श्वसन-प्रक्रिया से पैदा होने वाली नमी और गरमी को भी मास्क सोखता है, जो वायुमंडल में मौजूद रोगाणुओं के साथ मिलकर हमें कई तरह से संक्रमित कर सकती हैं। हालांकि एन 95 और एन 99 सहित कई रेस्परेटर बच्चों या उन लोगों के लिए मुफीद नहीं होते, जिनके चेहरे पर बाल होते हैं। इसीलिए इनका पूरी तरह फिट हो जाना भी इनकी सुरक्षा की पूरी गारंटी नहीं।

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  • Web Title:najariya hindustan column on 6 november