najariya hindustan column on 4 february - नगदी हस्तांतरण में नहीं है कृषि संकट का हल DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

नगदी हस्तांतरण में नहीं है कृषि संकट का हल

हिमांशु एसोशिएट प्रोफेसर, जेएनयू

कृषि क्षेत्र की लगातार खराब होती हालत के बीच किसानों को राहत पहुंचाने के नए प्रयोग शुरू हो गए हैं। न्यूनतम समर्थन मूल्य और कर्जमाफी के बाद इसमें अब एक नई चीज जुड़ गई है, बैंक खातों में सीधे नगदी का हस्तांतरण। पहले एक के बाद एक कई राज्यों ने ऐसी योजनाएं लागू कीं और अब केंद्र सरकार ने भी यही रास्ता अपनाया है। नगदी हस्तांतरण का तरीका बहुत लोकप्रिय हो सकता है और राजनीतिक रूप से भी इसका बड़ा फायदा भी मिल सकता है, लेकिन यह उम्मीद व्यर्थ है कि इससे हमारा कृषि संकट खत्म हो जाएगा। इसका सबसे मुख्य कारण तो यह है कि यह संकट सिर्फ इसीलिए नहीं है कि कृषि में आमदनी बहुत कम है। 
ताजा संकट का एक अहम कारण तो वर्तमान आयात-निर्यात नीति है, जिसमें कई खामियां भी हैं और तदर्थवाद भी। फिर हमारे पास कृषि मंडियों का न तो पर्याप्त इन्फ्रास्ट्रक्चर है और वहां सटोरियों की गिरोहबंदी भी समस्या को जटिल बना देती है। यह गिरोहबंदी किसानों को अपनी पैदावार का असल बाजार भाव लेने से रोकती है। ये समस्याएं तो अपनी जगह हैं ही, साथ ही इनमें जब 2014 और 2015 का सूखा जुड़ गया, तो इस संकट का निर्माण भी हो गया। यह भी सच है कि अचानक नोटबंदी के झटके और जल्दबाजी में उठाए गए जीएसटी के कदम ने हमारी ग्रामीण अर्थव्यवस्था की हालत खस्ता कर दी।
नगद राशि हस्तांतरण की योजनाओं के पास इनमें से किसी भी समस्या का समाधान नहीं है। साथ ही ये हमें किसी आपदा के दौरान सुरक्षा की गारंटी भी नहीं देतीं। यह आपदा प्राकृतिक भी हो सकती है और किसी सरकारी नीति के कारण भी। कृषि के लिए हमें देश में जिन संरचनात्मक सुधारों की जरूरत है, यह उनका विकल्प भी नहीं है। न तो यह किसानों को फसलों पर अचानक आ जाने वाले संकटों से बचाती है और न ही मुआवजे का कोई वादा करती है। कृषि उत्पादों की कीमत में आई अचानक गिरावट ने कृषि संकट को काफी गहरा दिया है, लेकिन मूल रूप से यह कई सारी नीतियों की नाकामी का नतीजा है। फिर यह संकट इसलिए भी गहराया है कि गैर कृषि क्षेत्र में हम रोजगार के पर्याप्त अवसर नहीं पैदा कर पाए हैं। इसको हम ग्रामीण क्षेत्र में मजदूरी कम होते जाने से भी समझ सकते हैं।
सिर्फ कालिया योजना ही ऐसी है, जिसमें भूमिहीन मजदूरों की सुध ली गई है, बाकी ज्यादातर योजनाओं में किसान की जमीन के अनुपात में ही धन हस्तांतरण का खाका तैयार किया गया है। लेकिन असल समस्या फायदा पाने वालों की पहचान करने की है। हमारे पास जमीन की मिल्कियत के रिकॉर्ड बहुत अच्छी स्थिति में नहीं हैं, इसलिए हो सकता है कि यह धन उन बहुत से लोगों के खातों में पहुंच जाए, जो खेती ही नहीं करते। मौजूदा संकट इस वजह से भी है कि ग्रामीण क्षेत्रों में मांग में कमी आई है। आगे चलकर यह कमी अल्प या मध्यम समय के लिए दूर भी हो सकती है। लेकिन यह कृषि में घट रहे निवेश का विकल्प नहीं हो सकती, जो 2.3 फीसदी सालाना की दर से घट रहा है। कर्जमाफी और अन्य योजनाओं के चलते राज्यों की वित्तीय हालत अब ऐसी नहीं रह गई कि वे कृषि में निवेश के लिए अलग से धन की व्यवस्था कर सकें। राज्यों की कुल जमा कर्जमाफी 1.9 खरब रुपये तक पहुंच गई है। नगदी हस्तांतरण योजना उनकी हालत और खस्ता कर देगी।
नगदी हस्तांतरण के समर्थक यह तर्क दे सकते हैं कि यह योजना ज्यादा कार्य-कुशल होती है, लेकिन यह उस असंतुलन को सुधारने का काम नहीं कर सकती, जो कृषि बाजार की वजह से पैदा होता है। दुनिया भर में कृषि अब बागवानी और फसलों के कई रूपों में हाथ आजमा रही है, इसका खर्च भी बढ़ रहा है और मशीनीकरण भी, जिससे कृषि की लागत बढ़ती है। किसान सरकार से दान नहीं चाहते, वे तो ऐसा तंत्र चाहते हैं, जो विश्व स्तर पर उन्हें स्पद्र्धात्मक बना सके। नगदी हस्तांतरण करके सरकार इन जिम्मेदारियों से बच जाती है। कम हुआ निवेश किसानों के जोखिम को बढ़ा देता है और वे बाजार तथा दूसरी जगहों से उभरने वाले खतरों का मुकाबला करने की स्थिति में नहीं रह जाते।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:najariya hindustan column on 4 february