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घरेलू राजनीतिक मतभेदों को विश्व मंच पर उठाने की भूल

विनोद शर्मा

विदेश यात्रा के दौरान राहुल गांधी द्वारा भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) पर लगातार किए जा रहे हमलों को देखकर पूर्व विदेश मंत्री यशवंत सिन्हा ने पिछले हफ्ते एक ट्वीट किया। इस बागी भाजपा नेता ने कांग्रेस अध्यक्ष का नाम तो नहीं लिया, लेकिन उनकी सलाह को पढ़कर मजमून समझना किसी के लिए मुश्किल नहीं था। उनका ट्वीट था, ‘मैं सभी नेताओं से अपील करना चाहता हूं कि वे विदेशों में घरेलू मुद्दों पर चर्चा करने से बचें। प्रधानमंत्री ने जरूर इस नियम को सबसे पहले तोड़ा है, मगर दूसरों को इसे दोहराने की जरूरत नहीं।’

राहुल ने जर्मनी और ब्रिटेन में बोलते हुए प्रधानमंत्री, भाजपा और आरएसएस पर कहीं अधिक आक्रामक हमले किए। उन्होंने जहां आरएसएस और मुस्लिम ब्रदरहुड को (क्रमश: प्रखर हिंदू राष्ट्र और मुस्लिम उम्माह बनाने के स्पष्ट लक्ष्यों के कारण) एक धरातल पर रखा, वहीं प्रधानमंत्री पर देश को खतरे में डालने का आरोप भी लगाया। बहरहाल, किसी की गलती को इस आधार पर न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता कि उसके साथ पहले गलत हो चुका है। यह सही है कि इस कड़वे टकराव के लिए तलवारें तभी खिंच गईं थीं, जब 2014 में न्यूयॉर्क के मेडिसन स्क्वायर गार्डन में भारतीय प्रवासियों को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने कांग्रेस को बुरा-भला कहा था। घर के विरोधियों पर विदेश में हमला बोलना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अच्छी छवि नहीं बनाता। यह एक अनुभवी राजनयिक का मानना है।

इससे पहले मुख्य धारा की पार्टियों द्वारा घरेलू सियासी जंग को विदेशों में ले जाने के उदाहरण बहुत कम हैं। पुराने नेताओं के ऐसे प्रकरण शायद ही याद आते हैं, जिसमें उन्होंने विदेशी जमीन पर और विदेशी मेजबान के सामने इस तरह आरोप-प्रत्यारोप किए हों। 1980 के दशक के अंत में श्रीलंका में शांति सेना भेजने को यदि भूल जाएं, तो राजीव गांधी, पीवी नरसिंह राव, वीपी सिंह, इंद्र कुमार गुजराल, अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह के शासनकाल में विदेश नीति को लेकर एक व्यापक सहमति रही। 1994 में तो नरसिंह राव द्वारा विपक्षी नेता अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में कश्मीर पर भारत का पक्ष रखने के लिए एक टीम को संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग भेजना काफी बुद्धिमानी वाला कूटनीतिक कदम माना गया। अपने उद्देश्य में सफल होकर लौटी इस टीम में फारूक अब्दुल्ला और सलमान खुर्शीद जैसे नेता थे। उस समय इस्लामाबाद कश्मीर मसले का अंतरराष्ट्रीयकरण करने में जुटा था। पाकिस्तान की इस योजना को मात देने के लिए भारत ने जो पटकथा तैयार की, वह एक अध्ययन का विषय हो सकती है कि किस तरह मुश्किल हालात से लड़ने में राष्ट्रीय एकता काम आती है। तब पाकिस्तान की प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो ने अपने देशवासियों से कहा था कि संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग से कश्मीर प्रस्ताव चीन की सलाह पर वापस लिया गया है, (जबकि वास्तव में बीजिंग, नई दिल्ली को ही सुन रहा था, क्योंकि मानवाधिकारों पर पश्चिम के साथ उसके अपने मतभेद थे)।

इस तरह के एक अन्य सेहतमंद मेलजोल का उदाहरण वह घटना है, जिसे खुद वीपी सिंह ने मुझे 1992 की अपनी पाकिस्तान यात्रा के दौरान बताया था। तब वह बेनजीर भुट्टो के आमंत्रण पर कराची में दक्षेस देशों के विपक्षी नेताओं की बैठक में भाग लेने गए थे। इसके बाद, उन्हें राष्ट्रपति गुलाम इशाक खान और प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के साथ मुलाकात करने के लिए पाकिस्तान सरकार का मेहमान भी बनना था। मगर सम्मेलन में जिस प्रस्ताव पर सहमति बनी, वह लोकतंत्र में ‘सत्ता के समानांतर केंद्रों’ को लेकर आलोचनात्मक था। इसे बेनजीर भुट्टो की सहमति से राष्ट्रपति इशाक खान पर परोक्ष हमले के रूप में देखा गया, नतीजतन मेजबान सरकार ने वीपी सिंह की यात्रा का आधिकारिक कार्यक्रम रद्द कर दिया। इसकी सूचना वीपी सिंह ने कराची से फोन करके दी। मेरा उनसे सवाल था, ‘क्या नरसिंह राव के दबाव में ऐसा हुआ होगा?’ उन्होंने ऐसी किसी बात से तुरंत इनकार किया और कहा, ‘ऐसा कतई नहीं हो सकता... भारत की जमीन से बाहर हम सब एक हैं।’ आज के नेताओं को इन सबसे सबक लेना चाहिए।

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  • Web Title:najariya hindustan column on 29 august by vinod sharma