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12 नबम्बर, 2019|9:30|IST

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मामूली सजा से क्या संदेश देना चाहती है आईसीसी

शिवेंद्र कुमार सिंह  वरिष्ठ खेल पत्रकार 

दक्षिण अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया के बीच केपटाउन टेस्ट में जो हुआ, वह नहीं होना चाहिए था। ऑस्ट्रेलियाई टीम ने सोची-समझी रणनीति के तहत बेईमानी की। पकड़े गए, तो माफी भी मांगी। टीवी पर पूरी दुनिया ने देखा कि किस तरह ऑस्ट्रेलिया के खिलाड़ी ने गेंद से छेड़छाड़ की, और कैमरे में पकड़े जाने के बाद किस चालाकी से कोच डरेन लेहमन ने उसे बचाने की कोशिश की। हालांकि बाद में कप्तान स्टीव स्मिथ ने इस पूरी बेईमानी को प्रेस कॉन्फ्रेंस में स्वीकार भी कर लिया। आईसीसी तक मामला पहुंच चुका था, लिहाजा उसने भी अपना फैसला सुनाया। गेंद से छेड़छाड़ करते पकड़े गए कैमरन बेनक्राफ्ट पर 75 फीसदी मैच फीस का जुर्माना हुआ और तीन डिमेरिट अंक दिए गए। कप्तान स्टीव स्मिथ पर एक मैच का प्रतिबंध लगा। सोचने की बात है कि जान-बूझकर छेड़छाड़ करने की गंभीर सजा पर क्या सिर्फ एक मैच का प्रतिबंध होना चाहिए? सवाल और भी हैं- मसलन,क्या आईसीसी ऐसी मामूली सजा देकर दुनिया की बाकी टीमों को बेईमानी का रास्ता दिखा रही है? क्या ऑस्ट्रेलिया और दुनिया की बाकी टीमों के लिए खेल के नियम अलग-अलग हैं? ऐसे कई सवाल इस शर्मनाक हरकत के बाद खड़े हुए हैं। अलग बात है कि ज्यादातर मौकों पर ‘ई-मेल’ के जरिए संवाद कायम करने वाली आईसीसी ऐसे किसी सवाल का जवाब नहीं देगी। 

इनमें भी तीसरा सवाल सबसे गंभीर है, जिसे लेकर भारतीय क्रिकेटर हरभजन सिंह का दर्द भी सामने आया है। 2007-08 में ऑस्ट्रेलिया में हुए ‘मंकीगेट एपीसोड’ के बाद यह कंगारूओं की टीम का सबसे बड़ा विवाद है। ‘मंकीगेट एपीसोड’ से आहत हरभजन ने इसीलिए खुलकर कहा है कि आईसीसी पक्षपात करती है। उन्होंने सवाल उठाया है कि 2001 में जरूरत से ज्यादा अपील के लिए अगर छह भारतीय खिलाड़ियों पर प्रतिबंध लग सकता है, तो गेंद से छेड़छाड़ साबित होने के बाद भी इतनी मामूली सजा क्यों? भज्जी ने सिडनी टेस्ट में हुए ‘मंकीगेट एपीसोड’ पर खुद को सुनाए गए तीन टेस्ट मैच के बैन का भी जिक्र किया है। भज्जी को इन सवालों का जवाब शायद ही मिले। खैर, आईसीसी से ज्यादा कड़ा फैसला तो ऑस्ट्रेलिया की सरकार ने लिया। इससे पहले कि क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया ना-नुकुर का मन बनाती, प्रधानमंत्री ने हस्तक्षेप किया।

उन्होंने इस घटना को शर्मनाक बताया। उनके हस्तक्षेप का ही असर है कि स्टीव स्मिथ और डेविड वॉर्नर यानी कप्तान और उप-कप्तान को अपने-अपने पद से हटना पड़ा। क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया इस मामले की जांच के लिए एक टीम भी दक्षिण अफ्रीका भेज रही है। स्मिथ और वॉर्नर पर आजीवन प्रतिबंध की तलवार भी लटक रही है। अफसोसनाक यह है कि ये सारे कड़े फैसले आईसीसी की तरफ से नहीं लिए गए, जिसकी जिम्मेदारी है कि वह खेल को नियम और गरिमा के अनुरूप चलाए। यह पहला मौका नहीं है, जब आईसीसी ने ऐसा बेतुका फैसला किया हो। कुछ दिन पहले ही श्रीलंका में चल रही टी-20 त्रिकोणीय सीरीज के दौरान बांग्लादेश की टीम ने श्रीलंका के खिलाफ एक मैच में मैदान में जबर्दस्त हुड़दंग किया था। बांग्लादेश के खिलाड़ियों ने मैदान में न सिर्फ श्रीलंकाई टीम के खिलाड़ियों, बल्कि अंपायर से भी बदसुलूकी की थी। ड्रेसिंग रूम में तोड़फोड़ की तस्वीरें भी सामने आईं। इस मामले में भी आईसीसी ने महज मैच फीस का जुर्माना करके मामले को ठंडा कर दिया था। ऐसे फैसले आईसीसी की उपयोगिता पर सवाल उठाते हैं। 

हाल के दिनों में क्रिकेट फैंस ने देखा है कि ओवर के बीच में 12वां खिलाड़ी मैदान में ‘ड्रिंक्स’ लेकर आ जाता है। टेस्ट मैच के दौरान कोच ‘वॉकी-टॉकी’ से ‘मैसेज’ करता है। इसकी आलोचना कमेंटरी टीम भी करती है, पर उसके पास इन्हें रोकने का अधिकार नहीं है। आईसीसी के लिए यह ‘हाई-टाइम’ है। मगर इस बीच जमाना तेजी से बदला है। अब मैदान में मौजूद रहने भर से काम नहीं चलेगा। क्रिकेट को ‘जेंटलमैंस-गेम’ कहने मात्र से भी काम नहीं चलेगा। अब जरूरत पड़ने पर ‘ऐक्शन’ लेने का समय है। सोशल मीडिया की सक्रियता के दौर में संवाद का तरीका बदलने की भी जरूरत है, वरना न खेल-भावना बचेगी, न खेल आगे बढ़ेगा। 
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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