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तो अब कहानियों में मिला करेंगे बछड़े और बैल

पंकज चतुर्वेदी वरिष्ठ पत्रकार

अग्रणी राज्य हरियाणा में डेयरी उद्योग एक ऐसी योजना को बढ़ाने की तैयारी कर रहा है, जिससे वहां की गायें बछडे़ पैदा ही न करें, वे बस बछियों को ही जन्म दें। इस योजना के पीछे कारण यह बताया गया है कि इससे आवारा पशुओं की समस्या से निजात मिलेगी। वैसे यह एक ऐसी योजना है, जिसकी चर्चा देश में पिछले सात साल से चल रही है। हालांकि कोई ज्यादा पुरानी बात नहीं है, बल्कि तीन दशक पहले तक गांव में बछड़ा होना शुभ माना जाता था, दो साल तक उसकी खिलाई-पिलाई हुई और फिर उसके बाद वह पूरे घर के जीवकोपार्जन का आधार होता था, घर के दरवाजे पर बंधी सुंदर बैलों की जोड़ी ही किसान गृहस्थ की संपन्नता और रुतबे का प्रमाण होती थी। लेकिन वह अर्थव्यवस्था अब विदा हो चुकी है। लेकिन इसके साथ ही गोवंश में नर की उपयोगिता भी खत्म हो चुकी है और ज्यादातर नर आवारा बनने के लिए अभिशप्त हैं। देश में गोरक्षा के नाम पर चलने वाले तमाम अभियान भी उन्हें बहुत ज्यादा महत्व नहीं देते।

सिर्फ बछिया पैदा करने वाली तकनीक के लिए डीप फ्रोजन सीमेन यानी डीएफएस को प्रयोगशाला में इस तरह तैयार किया जाता है कि इसमें केवल एक्स क्रोमोजोम ही हों। इसे लिक्विड नाइट्रोजन की ठंडक में सहेजकर रखा जाता है। फिलहाल यह तकनीक जर्सी व होरेस्टिक फ्रीजियन नस्ल की गायों में ही सफल है। देसी गायों में इसकी सफलता की दर 30 फीसदी से भी कम है। विदेशी नस्ल की गाय की कीमत ज्यादा है, उसका रखरखाव महंगा है और इस वैज्ञानिक तरीके से गर्भाधान के चार साल बाद उसके दूध की मात्रा में कमी आने का कटु सत्य भी सबके सामने है, हालांकि इसे छिपाया जाता है। यही नहीं, इस सीमेन के प्रत्यारोपण में 1,500 रुपये तक का खर्च आता है सो अलग। किसी भी देश की संपन्न्ता की बड़ी निशानी माने जाने वाले ‘लाइव स्टॉक’ या पशु धन की हर साल घटती संख्या से जूझ रहे देश में अपनी नस्लों का कम होना बड़ी चिंता की बात है। यह तो अपनी बॉयोडाइवर्सिटी को आघात पहुंचाना है। 

विभिन्न अध्ययनों में पाया गया है कि यह एक भ्रम है कि भारत की गायें कम दूध देती हैं। पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान, बरेली ने चार किस्म की भारतीय गायों- सिंघी, थारपारकर, वृंदावनी और साहीवाल पर शोध कर सिद्ध कर दिया है कि इन नस्लों की गायें न केवल हर दिन 22 से 35 लीटर दूध देती हैं, बल्कि ये संकर या विदेशी गायों से अधिक काल तक यानी आठ से 10 साल तक ब्याहती और दूध देती हैं। एनडीआरआई, करनाल के वैज्ञानिकों की ताजा रिपोर्ट तो और भी ज्यादा चौंकाने वाली है। उनकी रिपोर्ट में कहा गया है कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण ज्यादा तपने वाले भारत जैसे देशों में अमेरिकी नस्ल की गायें न तो जी पाएंगी और न ही दूध दे पाएंगी। हमारी देसी गायों की चमड़ी की मोटाई के चलते इनमें ज्यादा गरमी सहने, और कम चारे व रखरखाव में भी जीने की भरपूर क्षमता है। इसलिए यह माना जा रहा है कि कुछ साल बाद हमें अपनी इन देसी गायों की शरण में ही जाना पड़ सकता है।

हालांकि यह एक अलग मुद्दा है, देसी गाय अगर अधिक उपयोगी साबित हुईं, तो उनके लिए भी ऐसा सीमेन तैयार करने का शोध आगे बढ़ सकता है, जिससे सिर्फ देसी बछिया ही पैदा हो, देसी बछड़ा नहीं। इससे जुड़े हुए कई नैतिक मुद्दे हैं, जिन्हें दुनिया भर में अक्सर उठाया जाता रहा है। डेयरी उद्योग से जुड़े मवेशियों के व्यावसायिक उपयोग या दोहन के लिए हम तरह-तरह के तरीके बरसों से अपनाते रहे हैं। इस नए तरीके में हम उनके व्यावसायिक उपयोग को बढ़ाने के लिए उनकी प्रकृति से ही छेड़छाड़ करने जा रहे हैं। इस पर दुनिया भर में खासी बहस छिड़ी है, लेकिन हमारे यहां इस मुद्दे पर अभी तक कोई चर्चा नहीं है। दिलचस्प बात यह है कि बछडे़ का प्रजनन रोकने की कोशिश सरकारी स्तर पर उस राज्य में चलाई जा रही है, जो बेटियों को जन्म से पहले ही मार देने के लिए बदनाम था। उस दाग पर तो कुछ हद तक नियंत्रण पा लिया गया है। लेकिन अब इसी प्रदेश में गाय के बछड़े के पैदा होने की संभावना खत्म की जा रही है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:najariya hindustan column on 26 march