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आर्थिक चोट पहुंचाकर भी बन सकते हैं कई दबाव

जयंतीलाल भंडारी, अर्थशास्त्री

जहां तक व्यापार की बात है, पिछले कुछ समय में भारत ने पाकिस्तान को हर तरह की सुविधा और प्राथमिकता देकर आपसी कारोबार बढ़ाने का मौका दिया है। अब पुलवामा आतंकी हमले के बाद यह परिदृश्य पूरी तरह से बदलने का समय दिखाई दे रहा है। विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) और इंटरनेशनल ट्रेड नियमों के आधार पर किसी भी देश को व्यापार में एमएफएन यानी सर्वाधिक तरजीही देश का दर्जा दिया जाता है। एमएफएन का दर्जा दिए जाने पर वह देश इस बात को लेकर आश्वस्त रहता है कि उसके द्वारा आयात किए जाने पर उसे आयात संबंधी विशेष रियायतें प्राप्त होंगी। साथ ही उसे व्यापार में नुकसान नहीं पहुंचाया जाएगा। भारत ने पाकिस्तान को 1996 में एमएफएन का दर्जा दिया था। पाकिस्तान को जब यह दर्जा मिला, तो उसको अधिक आयात कोटा देने के साथ उत्पादों को कम ट्रेड टैरिफ पर बेचे जाने की छूट भी मिली। 
हालांकि 23 साल पहले भारत की ओर से पाक को दिया गया यह दर्जा अब तक एकतरफा है। पाकिस्तान ने भारत को ऐसा कोई दर्जा नहीं दिया है। पाकिस्तान ने वर्ष 2012 में भारत को एमएफएन का दर्जा देने का एलान किया था, लेकिन अभी तक उसने वह वादा नहीं निभाया है। पाकिस्तान को एमएफएन का दर्जा देने के बाद भी भारत के साथ उसका आपसी कारोबार नहीं बढ़ा। भारत और पाकिस्तान के बीच 2017-18 में द्विपक्षीय व्यापार कारोबार 2.38 अरब डॉलर का हुआ, जो भारत के कुल वैश्विक कारोबार का महज 0.3 फीसदी रहा। पाकिस्तान को किया जाने वाला निर्यात 1.9 अरब डॉलर, यानी भारत के कुल निर्यात का 0.63 फीसदी रहा। भारत में पाकिस्तान से होने वाला आयात 48 करोड़ डॉलर है, जबकि भारत द्वारा जिन सार्क देशों श्रीलंका, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, मालदीव और अफगानिस्तान को यह दर्जा दिया गया है, उनके साथ भारत का विदेश व्यापार तेजी से बढ़ा है। 
वैसे भी इस समय पाकिस्तान भारी आर्थिक मुश्किल में है। वह एक बार फिर बेलआउट के लिए अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के दरवाजे पर दस्तक दे रहा है। दिसंबर 2017 से अब तक पाकिस्तानी रुपये का चार बार अवमूल्यन हो चुका है। चीन पर बहुत अधिक निर्भरता ने पाकिस्तान को आर्थिक रूप से कमजोर बना दिया है। इसका नतीजा यह हुआ है कि पाकिस्तान के पास अपने आयात बिलों का भुगतान करने के लिए कोई विशेष विदेशी जमा पूंजी शेष नहीं बची है। पाकिस्तान का निर्यात कम है और आयात इसका लगभग दोगुना है। पाकिस्तान पेट्रोलियम, इंडस्ट्रियल मटेरियल और खाद्य तेल जैसी जरूरी चीजों का आयात करता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में इन चीजों के दाम लगातार बढ़ रहे हैं, जबकि पाकिस्तान से निर्यात होने वाले कपास की कीमत लगातार घट रही है। एक ओर डोनाल्ड ट्रंप के अमेरिका के राष्ट्रपति बनने के बाद पाकिस्तान को मिलने वाली अमेरिकी आर्थिक मदद में काफी कमी आई है। इसमें और कटौती का खतरा भी मंडरा रहा है। दूसरी ओर चीन से मिल रहे कर्ज पर भी उसे खासा ब्याज देना पड़ रहा है। पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था की रफ्तार पर बिजली संकट का ग्रहण लगा हुआ है। आतंकवाद के चलते नकारात्मक छवि की वजह से पाकिस्तान में विदेशी निवेश लगातार घटता जा रहा है। यही वजह है कि पिछले दिनों जब सऊदी अरब के युवराज ने वहां निवेश की घोषणा की, तो पूरा पाकिस्तान जश्न मनाता दिखा।
भारत द्वारा एमएफएन का दर्जा वापस लेने से पाकिस्तान की आर्थिक घेराबंदी की राह आगे बढ़ेगी। इसके अलावा भारत के पास एक विकल्प यह भी है कि वह नदी समझौतों पर पुनर्विचार करके दबाव बनाए। सरकार ने इस दिशा में सोचना शुरू भी कर दिया है। अभी भारत अपनी छह बड़ी नदियों का 80 फीसदी पानी पाकिस्तान को देता है। माना जाता है कि भारत शुरू से ही पाकिस्तान को समझौते से कुछ अधिक पानी दे रहा है।  उसके दो तिहाई हिस्से में इन नदियों के पानी से सिंचाई होती है। ऐसे में, यदि भारत इन नदियों का कुछ अधिक पानी भारतीय क्षेत्र के लिए उपयोग में ले, तो पाकिस्तान के लिए बहुत सारी नई समस्याएं खड़ी हो सकती हैं। 
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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