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कमजोर भविष्य की ओर ले जाएगा अपरिपक्व मातृत्व

संचिता शर्मा

कम उम्र में गर्भ धारण करने से न सिर्फ मां की सेहत को नुकसान पहुंचता है, बल्कि बच्चे का विकास भी (जन्म से पहले और जन्म के बाद, दोनों स्थितियों में) प्रभावित होता है। वयस्क माओं की तुलना में इन माओं के सामान्य से कम वजन और कम लंबाई के बच्चे पैदा करने की आशंका ज्यादा होती है। भारत में कम उम्र में मां बनने और कुपोषित बच्चों के आपसी रिश्तों की समग्रता से पड़ताल करने वाले एक वैश्विक अध्ययन का यह निष्कर्ष है। उल्लेखनीय है कि भारत दुनिया भर में कम उम्र में मां बनने वाली हर पांच में से एक महिला और हर तीन बौने बच्चों में से एक का घर है। पिछले सप्ताह द लांसेट चाइल्ड ऐंड अडोलेसेंट हेल्थ  में प्रकाशित इस अध्ययन के मुताबिक, वयस्क माओं की तुलना में किशोरावस्था में गर्भ धारण करने वाली लड़कियों से पैदा होने वाले बच्चों में बौनापन और सामान्य से कम वजन होने की आशंका 11 फीसदी ज्यादा होती है। इंटरनेशनल फुड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट (आईएफपीआरआई) के सैमुअल स्कॉट (इस अध्ययन के सह-लेखक) बताते हैं, ‘मां की शिक्षा, उनकी सामाजिक-आर्थिक हैसियत और उनका वजन ऐसे कारक थे, जो कम उम्र में गर्भधारण और बच्चों में सामान्य से कम लंबाई को आपस में मजबूती से जोड़ते हैं’। अपने अध्ययन के लिए उन्होंने राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण- 4, यानी एनएफएचएस- 4 के आंकड़ों का विश्लेषण किया है।
रिपोर्ट कहती है कि समय-पूर्व शादी को रोकने संबंधी नीतियों को लागू करने से कुपोषण के इस पीढ़ीगत चक्र को तोड़ने और बच्चों के स्वास्थ्य में सुधार लाने में मदद मिल सकती है। अध्ययन की सह-लेखिका पूर्णिमा मेनन की मानें, तो ‘जिन्होंने कम उम्र में गर्भ धारण किया, वे उन वयस्क माओं की तुलना में कम शिक्षित, गरीब और कम वजन वाली थीं। ऐसी महिलाओं को गर्भावस्था में, प्रसव के समय और बच्चे की शुरुआती अवस्था के दौरान अच्छी स्वास्थ्य सुविधाएं तो नहीं ही मिल पातीं, नवजात और छोटे बच्चे को दूध पिलाने का अभ्यास और रहन-सहन की स्थिति जैसे सभी कारकों में भी उनकी हालत वयस्क माओं की तुलना में खस्ता होती है।’ 
एनएफएचएस- 4 के अनुसार, साल 2015-16 में लगभग 27 फीसदी लड़कियों की शादी 18 साल से पहले हुई। उस साल 45 लाख महिलाएं गर्भवती हुईं, या मां बनी थीं। लगभग 38.4 फीसदी बच्चे सामान्य से कम लंबे थे, 35.7 फीसदी कम वजन के और 21 फीसदी गंभीर रूप से कुपोषित थे। ‘सेव द चिल्ड्रन’ की सीईओ बिदिशा पिल्लई कहती हैं, ‘विश्व स्तर पर समय-पूर्व गर्भावस्था के कारण पांच वर्ष से कम उम्र के 15.6 करोड़ से अधिक बच्चे कुपोषण के कारण सामान्य रूप से लंबे नहीं हैं। हर साल, लाखों लड़कियां समय से पहले मां बन जाती हैं, जिसके कारण उन्हें वयस्कों की जिम्मेदारी ओढ़ने को मजबूर होना पड़ता है। उनकी सेहत, शिक्षा और आर्थिक संभावनाओं को भी खतरे में डाला जाता है। दुनिया भर में 15 से 19 वर्ष की किशोरियों की मौत की दूसरी बड़ी वजह गर्भावस्था व प्रसव से पैदा होने         वाली समस्याएं ही हैं।’
आईएफपीआरआई के अध्ययन में यह भी पाया गया है कि वयस्क माताओं की तुलना में, कम उम्र में मां बनने वाली महिलाएं छोटी, कम वजन वाली और एनीमिक (खून की कमी से पीड़ित) थीं। स्वास्थ्य सेवाओं तक उनकी पहुंच भी कम थी। इतना ही नहीं, वे अपेक्षाकृत कम शिक्षित थीं, और उनका रहन-सहन भी अच्छा न था। यह तस्वीर बदली जा सकती है, यदि लड़कियों को शिक्षा व आजीविका मुहैया कराई जाए। देश भर के 600 जिलों में कम से कम 70,000 घरों में सर्वे करने वाले नंदी फाउंडेशन द्वारा तैयार टीन एज गल्र्स सर्वे से पता चलता है कि 73.3 फीसदी लड़कियां 21 साल की उम्र के बाद शादी करना चाहती हैं, लेकिन उनके पास पढ़ाई जारी रखने, शादी से इनकार करने, रोजगार की तलाश करने या गर्भावस्था को टालने का कोई विकल्प नहीं होता। हालांकि कम और मध्यम आय वाले देशों में जिन रणनीतियों से बाल विवाह रोका जा सका है, उसमें शामिल हैं- बिना शर्त नकदी हस्तांतरण, स्कूल में नामांकन या उपस्थिति की शर्त पर नकदी हस्तांतरण, स्कूल वाउचर, कौशल विकास से जुड़े पाठ्यक्रम और आजीविका का प्रशिक्षण। इन सबका शादी की उम्र बढ़ने पर सकारात्मक असर पड़ा है।

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  • Web Title:Najariya Hindustan Column on 21 may