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पवनसुत का वह रूप, जिसे हम भूलते जा रहे हैं

सदानंद शाही प्रोफेसर, काशी हिंदू विश्वविद्यालय

हनुमान एक ऐसे लोक देवता हैं, जो बहुत ही सहज हैं, सहजता से उपलब्ध हैं। वह विद्या, बुद्धि और बल, तीनों के देवता हैं। लोक परंपरा उन्हें भय दूर करने वाला बताती है, तो शास्त्र परंपरा उन्हें विशिष्ट विद्वान व कवि के रूप में देखती आई है। भूत-पिशाच का भय दूर करना हो या फिर परीक्षा की वैतरणी पार करनी हो, किसी इंटरव्यू में सफलता हासिल करनी हो या फिर अखाडे़ में किसी को पटखनी देना हो- हनुमानजी आपके साथ हैं। हनुमान की सहजता का कुछ ज्यादा ही फायदा उठाया गया। हद तो तब हो गई, जब कुछ राजनेताओं ने हनुमान को दलित, मुसलमान, तो कुछ ने जाट करार दे दिया। ऐसा इसलिए कि हनुमानजी के बंदर होने और बलवान होने को हम इतनी अहमियत देते आए हैं कि उनके व्यक्तित्व के बाकी रूप नजरों से ओझल हो जाते हैं। कुछ भी ऊटपटांग और अराजक करते समय हम हनुमानजी को सबसे पहले याद करते हैं, जबकि हनुमान का व्यक्तित्व धीर मति योद्धा का रहा है। लंका में जाना, सीता का पता लगाना और लंका को जलाकर खाक कर देना केवल बाहुबल का मामला नहीं है, बल्कि बुद्धि कौशल का है, जिसे हम नजरंदाज करते हैं, जबकि हमारे जितने भी लिखित साहित्यिक साक्ष्य हैं, वे हनुमान को परम बुद्धिमान, विद्वान, श्रेष्ठ कवि और वैयाकरण बताते रहे हैं।
हिंदीभाषी प्रदेशों में उनसे हमारी मुलाकात हनुमान चालीसा नामक किताब से होती है। यह किताब तुलसीदास के नाम पर प्रचलित है, लेकिन तुलसीदास की भाषा और साहित्यिक गुणवत्ता से परिचित लोग जानते हैं कि यह तुलसी की कृति नहीं है। किसी हनुमान भक्त ने यह चालीसा लिखी होगी और इसे महत्व दिलाने के लिए तुलसीदास के नाम से जोड़ दिया होगा। हनुमान चालीसा  का वह अज्ञात रचयिता कम से कम सच्चा भक्त रहा होगा, जिसका पहला उद्देश्य हनुमानजी के  गुण और प्रभाव को सरल भाषा में लोगों तक पहुंचाना रहा होगा। बहरहाल, इस किताब में हनुमानजी के बारे में पहली ही बात, जिसे उस अज्ञात कवि ने दर्ज किया है, उनका ज्ञान गुन सागर होना है। और सारे पराक्रम की चर्चा बाद में है। थोड़ा और बड़े होने पर जो किताब हनुमानजी से हमारा अधिक प्रभावशाली परिचय कराती है, वह है तुलसीदास की रामचरितमानस। 
यद्यपि तुलसीदास का उद्देश्य हनुमान के भक्त स्वरूप का निदर्शन करना है, लेकिन वह भी हनुमान को ज्ञानिनामग्रगण्यम् के रूप में याद करना नहीं भूलते। लेकिन हनुमानजी का सही परिचय वाल्मीकि रामायण में मिलता है। वाल्मीकि हनुमान को वाणी का मर्म समझने वाले वेदों के ज्ञाता व्यक्ति के रूप में पाते हैं। वह हनुमान के जिस गुण पर सबसे ज्यादा रीझते हैं, वह है हनुमान का व्याकरण ज्ञान। हनुमान का कवि होना तभी से  प्रसिद्ध और मान्य है, जब से रामकथा का अस्तित्व है। कहते हैं कि जब आदि कवि वाल्मीकि ने अपनी रामकथा पूरी कर ली, तभी उन्हें पता चला कि रामकथा के अनूठे किरदार और राम के परम भक्त हनुमान ने भी रामायण  की रचना की है। उन्हें आशंका हुई कि यदि हनुमान की रामायण सामने आ गई, तो वाल्मीकि की रामायण को कौन पूछेगा? उन्होंने सीधे जाकर हनुमान से ही अपनी आशंका कह सुनाई। हनुमान अपने राम की तरह भक्त वत्सल भी थे। सो उन्होंने अपनी रामकथा समुद्र में डूबो दी। लेकिन इससे हनुमान की रामायण का अस्तित्व खत्म नहीं हुआ। यह कथा रामकथा के एक और गायक का पता देती है। 
भारत में पोलैंड के राजदूत रहे नोबेल पुरस्कार विजेता कवि आक्टोवियो पॉज को भारत प्रवास के दौरान हनुमान की इन खूबियों के बारे में पता चला, तो वह हनुमान से जुड़ी किंवदंतियों को महसूस करने के लिए बाकायदा गाल्ता की पहाड़ियों तक गए और हनुमान के सच को समझने की कोशिश की। अपने इन सारे अनुभवों को आधार बनाकर उन्होंने किताब लिखी मंकी द ग्रामेरियन  हिंदी में कहें, तो किताब का नाम होगा ‘वैयाकरण हनुमान।’ यह किताब सबसे पहले 1972 में फ्रेंच में छपी। पॉज के लिए तमाम दूसरी चीजों से ऊपर हनुमान एक वैयाकरण व कवि थे। हनुमान का चरित्र मनुष्यता के इतिहास में कविता की तरह विस्फोट करता है, जिसे  पॉज समझते हैं और हम हैं कि उन्हें बंदर-विमर्श से आगे ले जाने को तैयार ही नहीं होते। वजह शायद यही है कि हनुमान से हमारा रिश्ता लोभ भर का रह गया है। 
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:najariya hindustan column on 19 April