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लोककथाओं की परंपरा और मूल्यों की पाठशाला

सदानंद शाही प्रोफेसर, काशी हिंदू विश्वविद्यालय

कभी दादी और नानी की सुनाई कहानियों में छिपे होते थे मानव मूल्य। अब कहीं इनकी चर्चा नहीं होती। सभ्य और विकसित होने के क्रम में मनुष्य ने आपसी व्यवहार के जो मानक बनाए, जो आदर्श निश्चित किए हैं, वे ही मानव मूल्य कहे जाते हैं। मुद्रण और लेखन कला के विकास के पूर्व इन मूल्यों के हस्तांतरण का सबसे विश्वस्त तरीका स्मृति और मौखिक आख्यान ही थे। दादी-नानी के मुंह से बचपन में सुनी कहानियां एक तरह से लोक शिक्षण का काम करती रही हैं। लोक कथाओं में सुखी जीवन की सामूहिक आकांक्षा भरी होती है। सुखी जीवन की यह कामना ‘निजी’ तक सीमित नहीं होती। जो कमजोर और साधनहीन हैं, लोक उनके सुख की भी कामना करता है। 
चिड़िया और दाल का दाना कहानी मनुष्य की अपराजेय जिजीविषा का आख्यान है। यह कहानी अनेक जनपदीय भाषाओं में थोडे़-बहुत फेरबदल के साथ मिलती है। एक चिड़िया कहीं जा रही थी। रास्ते में उसे चने का दाना मिला। वह जांत में दलकर दाल बनाने गई। चने की दो दालें तो हो गईं, लेकिन वे खूंटे में फंस गईं। चिड़िया की तमाम कोशिशों के बावजूद दाने नहीं निकले। उसकी समस्या यह है कि अब वह क्या खाए, क्या पीए, क्या ले परदेश जाए? वह दानों को निकलवाने के लिए जान लड़ा देती है। वह अपनी गुहार लेकर बढ़ई, राजा, रानी, सांप, लाठी, आग, समंदर, हाथी, रस्सी, चूहे और बिल्ली तक की यात्रा करती है और अंत में दाल का दाना निकलवाकर दम लेती है। खूंटे में फंसे दाल के दाने चिड़िया को मिल जाते हैं। वह दाने लेकर फुर्र हो जाती है। इस कथा में जीवन की चुनौतियों का रूपक है। यह लोककथा हमें सिखाती है कि ‘निर्बल को न सताइए’। यह लोक कथा अपार श्रम और यत्न करने का साहस और धैर्य भी देती है। इसी तरह, एक लोक कथा में एक लाल बुझक्कड़ चिड़िया की जान बचाने के लिए हार स्वीकार कर लेता। कथाकार को ऐसी जीत स्वीकार नहीं है, जिसमें किसी की मृत्यु या अहित छिपा हो।
ऐसी कथाओं से हमारा नाता टूट गया है। पहले बच्चे को पांच साल का होने पर विद्यालय भेजा जाता था, तब तक वह ऐसी ही कहानियों के माध्यम से शिक्षित होता था। फिर वह कबीर आदि की बानी से परिचित होता था और उसे पता चलता था कि सांच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप।  अब वह दो साल की उम्र से ही स्कूल भेजा जाने लगा है, तो कहानियों के लिए जीवन में अवकाश ही नहीं रह गया है। अंग्रेजी का लोभ और दबाव उसे संतों की बानी से दूर कर देता है। जैसे-जैसे हमारे जीवन से लोक कथाओं की विदाई होती गई है, वैसे-वैसे मानव मूल्यों की भी विदाई होती गई। इधर कुछ वर्षोें से विश्वविद्यालयों और शिक्षण संस्थानों में मूल्य शिक्षा की बात होने लगी हैऔर मूल्य शिक्षा की पाठशालाएं खुलने लगी हैं, मगर लोक कथाओं की भरपाई शिक्षण संस्थानों में होने वाली मूल्य शिक्षा से नहीं हो सकती। 
इसकी पहली वजह यह है कि मूल्य शिक्षा देने की प्रविधि हम विकसित नहीं कर पाए हैं। मूल्य शिक्षा के केंद्र उपदेश को ही सही माध्यम पाते हैं। लेकिन उपदेशक प्राय: पर उपदेश कुशल बहुतेरे  ही पाए जाते हैं। जो उपदेश दे रहे होते हैं, उसका रंच मात्र भी उनके जीवन में दिखाई नहीं देता। जीवन व्यवहार से मुक्त उपदेश प्रेरित  करने की बजाय ऊब पैदा करते हैं, जबकि लोक कथाएं जीवन व्यवहार के भीतर से अत्यंत रोचक ढंग से बाल मन को प्रभावित करती हैं। फिर मूल्य शिक्षा केंद्रों के भाग्य विधाता प्राय: ऐसे लोग होते हैं, जिन्हें मूल्य का अर्थ ‘दाम’ पता होता है। कितने का बजट है, उसे कैसे खर्च करना है, और बजट कैसे बढ़ाना है, वगैरह।
लेकिन यह भी नहीं हो सकता कि हम समाज को धीरे-धीरे मूल्यहीनता की ओर धकेल दें, इसलिए शिक्षाविदों को इस चुनौती का सामना करना होगा और मूल्य शिक्षा के बेहतर उपाय खोजने होंगे। जब तक ऐसा नहीं हो पाता, हमें किसी न किसी तरह लोक कथाओं की ओर लौटना होगा। अगर हम लोक कथाओं से टूट गए संबंध को जोड़ सके, तो हमें मानव मूल्यों की रक्षा के लिए किसी प्रायोजित दिवस या केंद्र पर निर्भर नहीं होना पड़ेगा।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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