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दंड देकर बच्चों को सिखाने की जिद्दी धारणाएं 

दिलीप रांजेकर सीईओ, अजीम प्रेमजी फाउंडेशन

राजस्थान के एक स्कूल में बिताई गई ठंड की वह दोपहर हमारे लिए खास थी, क्योंकि हमें बाल-सभा (बच्चों की संसद) में शामिल होने का मौका मिला था। बाल-सभा के ढांचे, परिकल्पना और कामकाज को हमारे सामने प्रदर्शित करने के लिए पूरी सभा में भी बड़ा रोमांच था। बच्चे उत्साहित थे और स्कूल के काम में मशगूल दिख रहे थे। बच्चों के जाने के बाद शिक्षक-शिक्षिकाओं के साथ समाज, शिक्षा और स्कूल में उनके अनुभवों को लेकर एक उत्साहवर्धक बातचीत हुई। तमाम अन्य मुद्दों के अलावा हमने शारीरिक दंड के बारे में उनके विचारों पर भी बातचीत की। सभी शिक्षक-शिक्षिकाओं ने सिद्धांतत: यह माना कि बच्चों को किसी भी तरह से डराना-धमकाना सिखाने की प्रक्रिया के लिए नुकसानदेह है। इस मुद्दे पर उनके दृढ़ मत से हमें बड़ी खुशी हुई। जब हम स्कूल से निकलने ही वाले थे कि तभी एक शिक्षिका ने मुझसे पूछा, बच्चों को सजा दिए बगैर अनुशासित रखें भी तो कैसे? उनके विचार में बच्चों को अनुशासित करने का एकमात्र तरीका था, उनको सजा देना। यह मत कि बच्चों के लिए सजा जरूरी है, सिर्फ शिक्षक-शिक्षिकाओं के बीच नहीं, बल्कि अभिभावकों समेत पूरे समाज में गहरी जड़ें जमाए हुए है। लगभग सात साल पहले अनेक अभिभावक अपने बच्चों को अजीम प्रेमजी फाउंडेशन के स्कूलों में भेजने को लेकर सशंकित रहते थे, क्योंकि हमारे शिक्षक-शिक्षिकाएं बच्चों को सजा नहीं देते हैं। अभिभावक हमसे पूछते थे कि यह कैसा स्कूल है, जो बच्चों को मारता-पीटता नहीं है?
हालांकि बच्चों और शिक्षा के बारे में अनेक मान्यताएं आज बदल गई हैं, फिर भी शिक्षक-शिक्षिकाएं और अभिभावक, दोनों ही लगभग नियमित रूप से बच्चों को दंड देने या डराने-धमकाने का रास्ता अपनाते हैं, ताकि बच्चे उनके बनाए नियमों का पालन करें। कई शिक्षक-शिक्षिकाएं तो बेहद क्रूर और कष्टकारक तरीकों का इस्तेमाल करते हैं। कड़ी सजा से बच्चे के दिमाग पर गंभीर व स्थाई प्रभाव पड़ सकता है। वर्ष 2007 में मेरे स्कूल के सहपाठी पास होने के ठीक 40 साल बाद दोबारा उस स्कूल में इकट्ठा हुए। इस दौरान चार शिक्षकों को सम्मानित करने का फैसला हुआ, हममें से ज्यादातर लोगों ने इन शिक्षकों द्वारा हमें दी गई कठोर सजाओं को याद करके इसका विरोध और बहिष्कार किया। 40 साल का लम्बा वक्त भी उन स्मृतियों को मिटा नहीं सका था। 
बच्चे को अनुशासित करने के लिए हम दंड का सहारा क्यों लेते हैं? इसकी कई वजहें हैं। उन्हें यह लगता है कि सजा देने से असर तुरंत होता है, इससे समस्या का निपटारा तत्काल हो जाता है, और इससे नियंत्रण स्थापित होता है। इसकी दूसरी और ज्यादा खतरनाक वजह, जो अक्सर हमारे मनोवैज्ञानिक डीएनए का हिस्सा होती है, वह ताकत के प्रति हमारा यह नजरिया है कि यह एक ऐसी चीज है, जिसका इस्तेमाल किसी कमजोर व्यक्ति को दबाने और अपनी आज्ञा मनवाने के लिए किया जा सकता है। तीसरी वजह है, सीखने के लिए भय को अनिवार्य मानने का हमारा पूर्वाग्रह। चौथी और महत्वपूर्ण वजह है कि शिक्षक-शिक्षिकाओं को इसका विकल्प ही नहीं मालूम। हमारी शिक्षण व्यवस्था ऐसे बच्चों से संवाद करना नहीं सिखाती, जो संभव है कि नियमों का पालन न करें। पेशेवर योग्यता के अभाव में आप या तो पारंपरिक पद्धतियों का ही इस्तेमाल करने लगते हैं या फिर वह करते हैं, जो गुस्सा उनसे करवाता है। 
स्कूल व कक्षा में स्फूर्तिदायी माहौल का निर्माण किया जाना चाहिए। शिक्षण के स्तर पर ही ऐसी मान्यताएं विकसित करनी चाहिए कि सीखने-सिखाने की प्रक्रिया का अर्थ है शिक्षक-शिक्षिका व विद्यार्थी के बीच एक सहज और समर्थक संबंध विकसित करना, जिसमें भय और आशंका के लिए कोई जगह न हो। कक्षा में गलतियां करने को सीखने का एक अभिन्न हिस्सा मानना चाहिए और इसके लिए विद्यार्थियों का न तो उपहास किया जाना चाहिए और न ही उन्हें उलाहना देना चाहिए। भावी पीढ़ियों के प्रति यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम उन्हें ऐसे समाज का हिस्सा बनने में मदद करें, जिसमें खुलापन हो, जो तर्कशील व संवेदनशील हो और सबसे बढ़कर, जो किसी भी तरह के भय से मुक्त हो। 
    (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:najariya hindustan column on 14 november