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सुलगते पहाड़ों के राख होते जंगलों की दास्तान

अनिल प्रकाश जोशी, पर्यावरणविद्

जंगल की आग पहाड़ों के इतिहास का वर्षों से हिस्सा रही है। पिछली सदी में मुख्य रूप से 1911, 1921 और 1930 की वनाग्नि भयानक रही और इनमें 1995 की वनाग्नि को सबसे बड़े दावानलों में गिना जाता है। वन सर्वेक्षण संस्थान की रपट के अनुसार, पूरे देश में 2004 से 2017 तक कुल 3,40,000 बार वनाग्नि की घटनाएं हुईं। और यह मात्र हिमालय की ही कहानी नहीं है, बल्कि पूरे देश ने आग की घटनाएं झेली हैं। इस बार भी पहाड़ों में वनाग्नि ने कहर ढाना शुरू कर दिया है। गरमी बढ़ने की शुरुआत ऐसी ही रहेगी, तो आने वाले महीने पहाड़ों के लिए घातक सिद्ध होंगे। पिछले दशक में दावानल ने हजारों हेक्टेयर वनों को ही नहीं लीला, बल्कि पूरे पारिस्थितिकीय तंत्र को भी तबाह किया, क्योंकि वन मात्र पेड़-पौधों का संसार नहीं, बल्कि पूरे जीव-जंतुओं का तंत्र है। वनाग्नि का नुकसान वनों की क्षति से नहीं लगाया जा सकता, बल्कि इससे मिट्टी, पानी और वनोत्पादों का भी क्षरण होता है। ये सब वनाग्नि से सीधे प्रभावित होते हैं, लेकिन इसका व्यापक असर तो सब पर पड़ता है।
अब फिर जंगल की आग पहाड़ों में विकराल रूप लेने वाली है। अब तक दावानलों की 491 घटनाएं हो चुकी हैं और करीब 676 हेक्टेयर वन क्षेत्र तबाह हो गए हैं। सबसे ज्यादा घटनाएं नैनीताल और अल्मोड़ा जिले में हुई हैं। इसके अलावा टिहरी, चमोली, चंपावत लगभग सभी पहाड़ी जिलों में वनाग्नि ने अपनी पैठ बनानी शुरू कर दी है। हिमाचल प्रदेश में भी कमोबश ऐसे ही हालात हैं। यहां के पहाड़ उत्तराखंड के मुकाबले ज्यादा ऊंचे हैं, जिससे यहां वनों का क्षेत्रफल कम है, पर करीब 80 ऐसी रेंज हैं, जो संवेदनशील मानी जाती हैं। वहां भी वनाग्नि की घटनाएं शुरू हो गई हैं।
वनाग्नि की तमाम घटनाओं से हमने कभी कोई सबक नहीं लिया और न ही आज तक कोई ठोस रणनीति तैयार हो पाई है। जंगल से जुड़े विभागों का ढांचा कुछ इस तरह का है कि उसकी जिम्मेदारी सूचना देने तक सीमित रह जाती है। वन सर्वेक्षण संस्थान भारतीय सुदूर संवेदन संस्थान पर निर्भर होता है, जो सैटेलाइट की मदद से वनाग्नि की शुरुआती जानकारी वन संस्थान को देते हैं। वन सर्वेक्षण संस्थान सूचना को फॉरेस्ट गार्ड तक भी पहुंचाने की कोशिश करता है। सबके पास मोबाइल है, इसलिए यह काम कठिन भी नहीं होता। पर सब धरा रह जाता है, क्योंकि दावानल सब कुछ घंटों में ही निपटा देता है। वनाग्नि पर यही समझ विकसित की जाए, तो काफी हद तक इस पर नियंत्रण संभव हो पाएगा। सूचना की विवेचना और पूर्व-चेतावनी व्यवस्था इसमें बड़ी भूमिका निभा सकती है। आद्र्रता की मात्रा, वन प्रकार, मिट्टी की नमी, तापक्रम जैसी सूचनाओं से पूर्व-चेतावनी तैयार की जा सकती है, पर इसकी कोशिश दिखाई नहीं देती।
वनाग्नि का एक सामाजिक पहलू भी है, जो अक्सर नकार दिया जाता है। पहले घर-गांव वनरक्षक के रूप में दावानल से भिड़ जाते थे, पर आज वे ऐसी घटनाओं की तरफ पीठ कर लेते हैं, क्योंकि वन-नीति ने उनका वनों से रिश्ता लगभग समाप्त कर दिया है। वन जागरूकता अभियान गांव को वनों से जोड़ने में नाकाम सिद्ध हुए, क्योंकि लगातार वनाग्नि की बढ़ती घटनाओं की व्यापकता के पीछे वनवासियों की उदासीनता ही है। मुट्ठी भर वनरक्षक सूचनाओं के आधार पर कैसे उस वन की रक्षा कर पाएंगे, जो लाखों हेक्टेयर क्षेत्र में फैला है। केंद्र सरकार ने कभी इस मुद्दे को गंभीरता से नहीं लिया और न ही उसने पर्याप्त सहायता मुहैया करवाई, ताकि मुस्तैदी और संसाधन युक्त होकर दावानल से भिड़ा जा सके। हमें यह समझना होगा कि हिमालय की आग से हमारे पेट-पानी के सवाल जुडे़ हैं। यहां से गंगा, यमुना और ब्रह्मपुत्र जैसी अनगिनत नदियां और उनसे जुड़ी नहरें निकलती हैं व यहां के जंगल सबकी आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं। लंबे समय से वनों की आग को हल्के में लिया जाता रहा है और हर बार पर्यावरण की एक बड़ी क्षति वनाग्नि के कारण ही उठानी पड़ती है। और यह सब कुछ उस समय हो रहा है, जब हम पहले ही ग्लोबल वार्मिंग, जलवायु परिवर्तन जैसे बड़े पर्यावरण सदमों से गुजर रहे हैं। यह भी सच है कि इन दोनों आपदाओं से निपटने का सबसे बड़ा माध्यम वन ही हो सकते हैं। वनों की आग को दूसरों के घरों की आग समझकर तमाशबीन नहीं बने रहना चाहिए, यह कई तरह से हमारे घर की भी आपदा है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Najariya Hindustan Column on 14 may