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नजरियाचर्चा करते बच्चे और बुनियादी शिक्षा की जरूरत

रुक्मिणी बनर्जी निदेशक, प्रथमPublished By: Rajesh
Wed, 13 Feb 2019 11:59 PM
चर्चा करते बच्चे और बुनियादी शिक्षा की जरूरत

रात में फिरोजाबाद में बहुत बारिश हुई थी, मगर सुबह तक सूरज की किरणों ने कोहरे को हटाकर विद्यालय के प्रांगण को रोशनी से भर दिया। अभी भी जहां-तहां पानी दिख रहा था, मगर बहुत सारे बच्चों की चमकती हुई आंखें और उत्सुक चेहरे भी दिख रहे थे। हाल ही में विद्यालय को रंगा गया था। पहले उत्तर प्रदेश का हर सरकारी स्कूल एक जैसा लगता था- सफेद पुताई और हरी या लाल पट्टी। अब हर विद्यालय को अलग-अलग रंगों और चित्रों से सजाया गया है। एक बडे़ पेड़ के नीचे, धूप सेंकते बच्चे बैठकर अपने शिक्षक से बातचीत कर रहे थे।
 

खुली खिड़कियों से सूरज की रोशनी कमरे के अंदर पहुंच रही थी, जहां कक्षा तीन, चार और पांच के बच्चे साथ थे। अक्सर बच्चों को लाइन में बैठाया जाता है, लेकिन यहां शिक्षिका बीच में और बच्चे गोल आकार  में बैठे थे। शिक्षिका कहानी पढ़कर सुना रही थीं। बच्चे अपनी किताब के पन्ने पर उस कहानी की पंक्तियों पर अपनी उंगली रख-रखकर आगे बढ़ रहे थे। कहानी में चीकू नाम का एक लड़का था। वह अपने चाचाजी की दुकान संभाल रहा था। मैंने पूछा- ‘मुझे कहानी कौन बताएगा?’ एक साथ कई लड़के-लड़कियों ने कहानी सुनानी शुरू कर दी। कुछ ही समय में उन्होंने मिलकर कहानी समझा दी।
 

‘चाचाजी दुकान छोड़कर कहां चले गए थे?’ हमने सवाल पूछा। सब बच्चे सोचने लगे। एक लड़के ने उछलकर कहा, ‘शायद दुकान के लिए सामान लेने गए थे।’ पीछे से एक लंबी लड़की ने सुझाया, ‘हो सकता है कि वह डॉक्टर के पास गए हों।’ सामने बैठे कत्थई टोपी वाले लड़के ने कहा, ‘कभी-कभी काम से इधर-उधर जाना पड़ता है।’ ‘चीकू बड़ा है कि छोटा?’ हमने सबसे पूछा। तुरंत बच्चों की नजर तस्वीर पर गई। ब्लैक ऐंड ह्वाइट चित्र में एक साधारण छोटी-सी दुकान दिख रही थी। सामने बड़े-बड़े शीशे के डिब्बे और पीछे बहुत सारी चीजें शेल्फ में रखी थीं। काउंटर के पीछे से एक लड़का एक औरत को कुछ दे रहा है। कक्षा में जोरदार चर्चा होने लगी। अंत में तय हुआ कि चीकू इन्हीं बच्चों की तरह है, ‘न बड़ा, न छोटा’। ‘पर चीकू अगर तुम्हारी उम्र का है, तो वह स्कूल में क्यों नहीं है?’ इस बार चर्चा और जबर्दस्त हुई। काफी बातचीत के बाद यह तय पाया गया कि चीकू रोजाना स्कूल जाता है, पर आज चाचाजी की मदद के लिए वह दुकान में है।    
 

पढ़ने-लिखने और साधारण गणित की क्षमता किसी भी व्यक्ति के लिए अतिआवश्यक है। इस बुनियादी कौशल के बगैर आगे की कोई भी दक्षता या ज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता। पिछले कई साल से ‘असर’ (प्राथमिक शिक्षा स्तर पर सालाना रिपोर्ट) के आंकडे़ हमें बता रहे हैं कि हम अपने बच्चों का बुनियादी कौशल ठीक से बढ़ा नहीं पाए। इस वजह से वे अपने आगे की शिक्षा में बहुत कमजोरी महसूस करते हैं। इस कमजोरी के पीछे बहुत सारे कारण हो सकते हैं, लेकिन जल्द ही इस समस्या का समाधान जरूरी है। उत्तर प्रदेश में, जहां यह दुर्बलता हर विद्यालय में पाई जाती है, प्रशासन ने एक नई पहल शुरू की है- ग्रेडेड लर्निंग प्रोग्राम। लक्ष्य है कि गरमी की छुट्टियों के पहले बच्चे आसान कहानी और साधारण गणित सीख जाएं। 
 

फिरोजाबाद में धूप से धुले उस विद्यालय में शिक्षक जोर-शोर से इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए ठोस काम करते दिखे। हजारों-लाखों विद्यालयों में ऐसे मजबूत और लगातार प्रयास की जरूरत है, तभी बड़ा बदलाव हो पाएगा। शिक्षा व्यवस्था में शिक्षक की सहायता करने वाले सभी लोगों को इस समय डटकर उनका साथ देना होगा। समुदाय और परिवार के लोगों को समझाकर उनका समर्थन और सहयोग भी लेना आवश्यक है। जब यह बुनियाद सही ढंग से बनती है, तो पढ़ने-लिखने और गणित की मूलभूत दक्षताएं भी आ ही जाती हैं। साथ ही, गहराई से सोचने, आपस में चर्चा करने, अपने विचारों को अभिव्यक्त करने की क्षमताएं भी उभरकर आती हैं। मुझे पूरा यकीन है कि फिरोजाबाद के उस विद्यालय में सभी बच्चे गरमी के पहले अपने लक्ष्य को हासिल कर लेंगे। उम्मीद है, उत्तर प्रदेश के तमाम विद्यालय भी सफलता प्राप्त कर पाएंगे।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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