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टिकटों में नहीं, सीटों पर मिले महिलाओं को आरक्षण

आरती आर जेरथ, वरिष्ठ पत्रकार

ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने लोकसभा चुनावों के टिकट बंटवारे में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देने का एलान किया है। निस्संदेह, यह अच्छी शुरुआत है, क्योंकि लोकसभा में महिलाओं की मौजूदगी महज नौ से ग्यारह फीसदी रही है। इस कमी को पाटने के लिए महिला आरक्षण बिल संसद में लंबित है, जिसे पारित कराने की कोशिशें1996 से ही चल रही हैं। मगर नतीजा अब तक सिफर है। हालांकि यह बिल राज्यसभा से पास हो चुका है, पर उस समय भी इसके विरोधी कई सांसदों को मार्शल के जरिए सदन के बाहर भेजना पड़ा था।
महिलाओं की मौजूदगी लोकसभा या विधानसभाओं में ही नहीं, तमाम निर्वाचित संस्थाओं में अनिवार्य है। इसके प्रभाव को जानने के लिए स्थानीय निकायों में कई अध्ययन हो चुके हैं, जिसके नतीजे दिलचस्प हैं। मसलन, औरतें पंचायतों में जो परियोजनाएं शुरू कराती हैं, वे अपेक्षाकृत जल्दी पूरी होती हैं। वे सड़क, बिजली, पानी जैसी बुनियादी सुविधाएं बढ़ाने पर खासा ध्यान देती हैं। और तो और, वे पुरुषों के मुकाबले कम भ्रष्ट होती हैं। जाहिर है, निर्वाचित संस्थाओं में महिलाओं का होना बहुत जरूरी है। वे आर्थिक और सामाजिक विकास की बड़ी वाहक हैं। यदि लोकसभा और विधानसभाओं में उनका प्रतिनिधित्व बढ़ता है, तो ‘मेक्रो पॉलिसी’ (बड़े जनसमुदाय को प्रभावित करने वाली नीतियां) के क्रियान्वयन पर व्यापक प्रभाव पड़ सकता है। 
फिर, हमने यह भी देखा है कि चुनावों में अब महिला मतदाताओं की हिस्सेदारी बढ़ने लगी है। साल 2014 के लोकसभा चुनावों में घरों से निकलकर वोट डालने आए महिला और पुरुष मतदाताओं के बीच महज 1.8 फीसदी का अंतर था। जाहिर है, जब औरतें इतनी बड़ी संख्या में मताधिकार को लेकर मुखर हो रही हैं, तो राजनीतिक रूप से उनका सशक्त होना निहायत जरूरी है। मगर अपने यहां मुश्किल यह है कि चुनावों में टिकटों का बंटवारा उम्मीदवारों की जीत के गणित पर निर्भर करता है। हर पार्टी उसी उम्मीदवार पर अपना दांव खेलने लगी है, जिसमें जीत की संभावना ज्यादा होती है। और यह संभावना काफी हद तक ‘मसल’ और ‘मनी पावर’ पर निर्भर है। यही वजह है कि ओडिशा के मुख्यमंत्री की इस घोषणा में भी कमजोरी दिखती है। उन्होंने लोकसभा-टिकटों में तो महिला आरक्षण देने की बात कही, लेकिन साथ-साथ हो रहे विधानसभा चुनावों के लिए ऐसी कोई घोषणा नहीं की। संसदीय चुनावों में चूंकि निर्वाचन-क्षेत्र बड़ा होता है और उसमें राष्ट्रीय स्तर के मुद्दे हावी रहते हैं, इसलिए यहां उनके लिए यह दांव खेलना आसान था, लेकिन स्थानीय मुद्दों पर लड़े जाने वाले विधानसभा चुनावों में कड़ा मुकाबला होने की वजह से उन्होंने ऐसे किसी एलान से परहेज किया। 
फिर भी, इस घोषणा की सराहना की जानी चाहिए, और इसे आगे बढ़ाने पर जोर दिया जाना चाहिए। टिकटों में नहीं, बल्कि सीटों के आधार पर महिलाओं को उचित आरक्षण मिलना चाहिए। यदि 50 फीसदी सीटें महिलाओं के खाते में नहीं डाली जा सकतीं, तो 33 फीसदी आरक्षण का वादा पूरा होना ही चाहिए। साल 2014 तक ‘गठबंधन धर्म की मजबूरी’ के चलते महिला आरक्षण बिल पास नहीं हो सका, मगर आश्चर्य की बात है कि पूर्ण बहुमत की सरकार भी इस मामले में नाकाम साबित हुई, जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले के अपने पहले संबोधन में महिला सशक्तीकरण की खूब बातें की थीं। तब भरोसा जगा था कि जो काम यूपीए सरकार नहीं कर पाई, वह भाजपा की अगुवाई में एनडीए सरकार जरूर कर सकेगी। मगर यह सरकार भी महिला आरक्षण बिल पर लोकसभा की मुहर नहीं लगवा सकी।
एक बात और, भाजपा और कांग्रेस, दोनों ने अपने सांगठनिक ढांचे में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण का वादा किया था। दुर्भाग्य से यह वादा भी अब तक पूरा नहीं हो सका है। इससे महिला-प्रतिनिधित्व के प्रति सियासी दलों की मंशा जाहिर होती है। साफ है, महिलाओं को एक लंबी लड़ाई लड़नी है। नवीन पटनायक की ताजा घोषणा से शायद दूसरे दलों पर दबाव पड़े। मगर यह किस रूप में महिलाओं का सियासी प्रतिनिधित्व बढ़ा सकेगा, इसका जवाब फिलहाल नहीं दिया जा सकता।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

 

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  • Web Title:najariya-hindustan-column-on-13-March