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18 नबम्बर, 2019|7:50|IST

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कुदरत के खिलाफ है बोतलबंद पानी का कारोबार

हम भूल चुके हैं कि मई 2016 में ही केंद्र सरकार ने यह आदेश दिया था कि अब सरकारी आयोजनों में टेबल पर पानी की बोतलें नहीं सजाई जाएंगी, इसके स्थान पर साफ पानी पारंपरिक तरीके में ग्लास में परोसा जाएगा। सरकार का यह कदम प्लास्टिक बोतलों के बढ़ते कचरे पर नियंत्रण मात्र नहीं था, बल्कि आम लोगों तक पीने का साफ पानी पहुंचाने की एक पहल भी थी। दुखद है कि उस आदेश पर कहीं पूरी तरह से पालन नहीं हो पाया। कई बार तो महसूस होता है कि बोतलबंद पानी आज की मजबूरी हो गया है, लेकिन इसी दौर में कई ऐसे उदाहरण सामने आ रहे हैं, जिनमें स्थानीय समाज ने बोतलबंद पानी पर पाबंदी का संकल्प लिया और उसे लागू भी किया। दो साल पहले सिक्किम के लाचेन गांव ने अपने इलाके में किसी प्रकार के बोतलबंद पानी के बिकने पर सख्ती से रोक लगा दी। वहां हर दिन सैकड़ों पर्यटक आते हैं, लेकिन अब कोई भी बोतलबंद पानी या प्लास्टिक की पैकिंग लेकर वहां प्रवेश नहीं कर सकता। यही नहीं, अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को जैसा विशाल व्यावसायिक नगर दो साल से भी अधिक समय से बोतलबंद पानी पर पाबंदी के अपने निर्णय का सहजता से पालन कर रहा है। 
 

भारत की यह लोक परंपरा रही है कि जो जल प्रकृति ने दिया है, उस पर मुनाफाखोरी नहीं होनी चाहिए। तभी तो एक सदी पहले तक लोग प्याऊ, कुएं, बावड़ी और तालाब खुदवाते थे। आज हम उस समृद्ध परंपरा को बिसराकर पानी को स्रोत से शुद्ध करने की बजाय महंगे बोतलबंद पानी को बढ़ावा दे रहे हैं। पानी की तिजारत करने वालों की आंख का पानी मर गया है, इसलिए प्यासे लोगों से पानी की दूरी बढ़ती जा रही है। पानी के व्यापार को एक सामाजिक समस्या और अधार्मिक कृत्य के तौर पर उठाना जरूरी है, वरना हालात संविधान में निहित मूल भावना के विपरीत बनते जा रहे हैं। यह भावना कहती है कि प्रत्येक को स्वस्थ तरीके से रहने का अधिकार है और पानी के बगैर जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती। 
 

हमारे घरों में नल से आने वाले एक हजार लीटर पानी का दाम बमुश्किल चार रुपये होता है। जो पानी बोतल में पैक करके बेचा जाता है, वह कम से कम बीस रुपये लीटर होता है, यानी सरकारी सप्लाई के पानी से शायद चार हजार गुणा। इसके बावजूद स्वच्छ और नियमित पानी की मांग करने की बजाय दाम कम या मुफ्त करने के लिए हो-हल्ला करने वाले असल में बोतलबंद पानी की उस विपणन व्यवस्था के सहयात्री हैं, जो जल जैसे प्राकृतिक संसाधन की बर्बादी, परिवेश में प्लास्टिक घोलने जैसे अपराध और जल के नाम पर जहर बांटने का काम धड़ल्ले से कर रहे हैं। क्या कभी सोचा है कि जिस बोतलबंद पानी का हम इस्तेमाल कर रहे हैं, उसका एक लीटर तैयार करने के लिए कम से कम चार लीटर पानी बर्बाद किया जाता है? फिर प्लास्टिक बोतलों का जो अंबार लग रहा है, उसका महज 20 फीसदी ही पुनर्चक्रित होता है।
 

इस समय देश में बोतलबंद पानी का व्यापार करने वाली करीब 200 कंपनियां और 1,200 बॉटलिंग प्लांट वैध हैं। इसमें पानी का पाउच बेचने वाली और दूसरी छोटी कंपनियां शामिल नहीं हैं। इस समय, भारत में बोतलबंद पानी का कुल व्यापार 14 अरब, 85 करोड़ रुपये का है। यह देश में बिकने वाले कुल बोतलबंद पेय का 15 प्रतिशत है। बोतलबंद पानी का इस्तेमाल करने वाले देशों की सूची में भारत 10वें स्थान पर है। पर्यावरण को नुकसान करके अपनी जेब में छेद करके हम जो पानी खरीदकर पीते हैं, यदि उसे पूरी तरह निरापद माना जाए, तो यह गलतफहमी होगी। कुछ महीने पहले भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर के ‘एनवायर्नमेंटल मॉनिटरिंग ऐंड एसेसमेंट विंग’ की ओर से किए गए शोध में बोतलबंद पानी में नुकसानदेह चीजें  मिली थीं। हैरानी की बात यह है कि ये रसायन कंपनियों के लीनिंग प्रॉसेस के दौरान पानी में पहुंचे थे। एक नए अध्ययन में कहा गया है कि पानी भले बहुत स्वच्छ हो, पर उसकी बोतल के दूषित होने की आशंका बहुत ज्यादा होती है और इससे उसमें रखा पानी भी प्रदूषित हो सकता है। 
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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