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जहां छह महीने में ही बदल गई पूरी राजनीति

ताजा आंकडे़ और समीकरण मध्य प्रदेश की सरकार के बहुमत में होने पर आशंका व्यक्त कर रहे हैं। 11 दिसंबर, 2018 को मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव परिणाम आए थे, जिसमें कांग्रेस पार्टी को 114 और भाजपा को 109 सीटें मिली थीं। यह अंतर महज पांच विधायकों का था और स्पष्ट बहुमत दोनों में से किसी पार्टी के पास नहीं था। नंबर गेम के कारण बिना किसी जोड़-तोड़ के भाजपा के तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अपने पद से इस्तीफा राज्यपाल को सौंप दिया। चूंकि अंकगणित में वह पीछे थे, इसलिए कमलनाथ की सरकार ने शपथ ली थी। 
इसके सिर्फ छह महीने बाद जब लोकसभा चुनाव का नतीजा आया, तो तस्वीर एकदम बदल गई। नतीजों से ऐसा लगा कि छह महीने के भीतर ही कमलनाथ सरकार अपना विश्वास खो चुकी। पूरे देश को आश्चर्य हुआ की 29 लोकसभा सीटों में से कांग्रेस मात्र एक सीट, जो स्वयं मुख्यमंत्री की थी, बचा पाई। बाकी 28 लोकसभा सीटों पर भाजपा के प्रत्याशी विजयी हुए। 
आम चुनाव के इन नतीजों को अगर विधानसभा की स्थिति के हिसाब से देखें, तो पता चलेगा कि मध्य प्रदेश की 230 विधानसभा सीटों में से भाजपा इस लोकसभा चुनाव में 219 सीटों पर विजयी रही। भाजपा को इतना विशाल जनादेश इसके पहले कभी नहीं मिला था। 2014 में भी भाजपा को 29 लोकसभा सीटों में से 27 सीटें मिली थीं। मध्य प्रदेश जब एक था, तब सन 1977 में जनता पार्टी को 40 लोकसभा सीटों में से 39 सीटें मिली थीं। उस समय भी एकमात्र छिंदवाड़ा सीट ही थी, जो जनता पार्टी नहीं जीत पाई। साल 2019 के चुनाव में छिंदवाड़ा मात्र 36 हजार से रह गई।  
मध्य प्रदेश के परिणामों में एक और गौर करने लायक बात यह है कि प्रदेश की अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की सभी सीटों पर भाजपा ही जीती है। 10 में से एक भी सीट कांग्रेस को नहीं मिली है। सिर्फ यही नहीं, इस चुनाव में भाजपा को पूरे राज्य में जिस तरह से वोट मिले, वह बताता है कि जनता का कोई तबका ऐसा नहीं था, जिसने भाजपा को वोट न दिए हों। लगभग वैसे ही, जैसे बाकी देश में हुआ। फिर विधानसभा चुनाव के वक्त ऐसे क्या हो गया था?
यह ऐसा सवाल है, जिसकी चर्चा इस समय हर जगह है। जब विधानसभा चुनाव पास आए, तब भाजपा ने खुद कुछ सीटों पर निर्णय लेने में देरी कर दी। इसके अलावा, कुछ ऐसे निर्णय भी थे, जो प्रदेश की जनता के मनोनुकूल नहीं हुए। इसी का नतीजा रहा कि सिर्फ पांच-छह सीटों के अंतर से भारतीय जनता पार्टी मध्य प्रदेश में सरकार नहीं बना सकी।  
जिस समय लोकसभा चुनाव हुए, तब मध्य प्रदेश में ही नहीं, पूरे भारत में ही वह लहर चल रही थी, जिसे बाद में मोदी सुनामी कहा गया। बाकी देश की तरह ही मध्य प्रदेश में भी कांग्रेस इसे ठीक से नहीं समझ पाई। यहां कांग्रेस का आकलन यह था कि वह अपने छह महीने के कामकाज के भरोसे ही राज्य में कम से कम लोकसभा की 10 से 12 सीटें तो जीत ही जाएंगे। लेकिन इन छह महीनों में राज्य में कोई बहुत बड़ी सफलता नहीं दिखाई दी है और इसके साथ ही गिनाने के लिए बहुत सारी असफलताएं भी हैं। इसमें कोई शक नहीं कि मोदी लहर के साथ ही इन असफलताओं ने भी लोकसभा चुनाव के नतीजों में एक भूमिका निभाई। यहां तक कि पार्टी के आकलन उन जगहों पर भी बुरी तरह ध्वस्त हो गए, जिन्हें कांग्रेस का गढ़ बताकर मीडिया में पेश किया जा रहा था। गत छह महीने में ही 500 से अधिक आईएएस और आईपीएस अधिकारियों के तबादले हो चुके हैं। इससे यह भी कहा जाने लगा है कि मध्य प्रदेश में तबादले का काम एक उद्योग बन चुका है। ये सारे तबादले एक ऐसी सरकार ने किए हैं, जिसके बहुमत पर शक व्यक्त किए जा रहे हैं। 
पिछले कुछ साल ही नहीं, कुछ दशकों के राजनीतिक समीकरणों को देखें, तो कहा जा सकता है कि मध्य प्रदेश अब पूरी तरह भाजपा का गढ़ बन चुका है। छह महीने पहले वहां जो घटनाक्रम हुआ, उससे भोपाल में कांग्रेस ने सरकार बनाने में सफलता जरूर हासिल कर ली, लेकिन अब लगता है कि यह स्थिति ज्यादा समय तक नहीं रहने वाली। 
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:najariya hindustan column on 12 june