DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

सड़क सुरक्षा की संस्कृति को विकसित करने का समय

थॉमस क्युल प्रेसीडेंट, निसान इंडिया ऑपरेशन्स

पिछले साल लाल किले से अपने भाषण के तुरंत बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के लोगों को एक और संदेश दिया था, इस बार बिना एक भी शब्द बोले। हालांकि प्रधानमंत्री को उस गाड़ी से जाना था, जो सुरक्षा जरूरतों के लिहाज से विशेष रूप से बनी है और सुरक्षा कारणों से ही उस राह पर ट्रैफिक भी रोक दिया जाता है, लेकिन फिर भी उन्होंने तीन सेकंड का समय निकालकर पहले सीट बेल्ट बांधी। यह कहा जा सकता है कि रणनीति के तहत सुरक्षा का संदेश इस तरह से दिया गया था। लेकिन उसके कुछ घंटे बाद ही मैंने देखा कि दिल्ली में लगभग हर उम्र के लोग सीट बेल्ट लगाने के नियम का उल्लंघन कर रहे हैं, गाड़ी की आगे की सीटों पर भी और पीछे की सीटों पर भी।
सड़क सुरक्षा सभी के लिए अत्यंत महत्व की चीज होनी चाहिए, न सिर्फ इसके सामाजिक प्रभाव के कारण, बल्कि इसलिए भी कि भारत में वाहनों की मांग और संख्या लगातार बढ़ रही है। पिछले 30 साल में भारतीय कार बाजार ने लगातार यह दिखाया है कि उसकी संभावनाएं कई विकसित देशों से भी ज्यादा तेजी से बढ़ रही हैं। मैकेंजी की रिपोर्ट बताती है कि अगले तीन साल में भारत वाहनों का तीसरा सबसे बड़ा बाजार हो जाएगा। और 2040 तक प्रति एक हजार आबादी पर कारों की संख्या नौ गुनी हो जाएगी। पर जब हम सड़क दुर्घटनाओं में मारे जाने वाले लोगों की बढ़ती संख्या को देखते हैं, तो पता लगता है कि गाड़ियों की बढ़ती संख्या के मुताबिक यहां सुरक्षा को लेकर जागरूकता नहीं बढ़ रही। असल में यह संख्या साल-दर-साल बढ़ती जा रही है। कार बाजार की तेजी का यह सबसे खराब नतीजा है। अगर हम सुरक्षा की संस्कृति विकसित नहीं करेंगे, तो यह संकट बढ़ता ही जाएगा। 
इसके लिए सभी राज्यों में इस उद्योग के लिए जागरूकता अभियान चलाने की जरूरत तो है ही, साथ ही इंटरनेट का जो नया रूप सामने आ रहा है, वह भी हमारी काफी मदद कर सकता है। इस समय दुनिया भर की कंपनियां ऐसी कारों को विकसित करने पर काफी निवेश कर रही हैं, जो आपस में एक-दूसरे के संपर्क में होंगी। तरह-तरह के सेंसर ड्राइवर को यह बता देंगे कि सड़क पर उसके अलावा और कौन है? कार में लगा तंत्र जरूरत के मुताबिक ड्राइवर को दुर्घटना से बचाव के संदेश भी तुरंत दे सकेगा। 
इसके साथ ही असावधान ड्राइविंग को रोकने के लिए सरकार ऐसा नीतिगत ढांचा बना रही है कि खतरनाक तरह से गाड़ी चलाने वालों पर भारी जुर्माना लगाया जा सके। खासकर सड़क सुरक्षा के लिए ही एक विशेष बल बनाए जाने पर विचार चल रहा है, ताकि यातायात के नियमों को ठीक ढंग से लागू किया जा सके। देश में जिस तेजी से इन्फ्रास्ट्रक्चर को बनाने और सुधारने का काम चल रहा है, वह भी इस कोशिश को आगे बढ़ाएगा।
ज्यादातर सड़क दुर्घटनाएं गैर-जिम्मेदार ड्राइवरों की गलती का नतीजा होती हैं। यह बताता है कि जरूरत कहां ध्यान देने की है। सीट बेल्ट लगाने जैसे साधारण से नियम को लोग अक्सर नजरंदाज कर देते हैं। मोटर व्हीकल कानून के हिसाब से सीट बेल्ट लगाना जरूरी है, फिर भी सिर्फ 25 फीसदी ड्राइवर इसे लगाते हैं। इस लापरवाही को खत्म करना इसलिए भी काफी मुश्किल है, क्योंकि देश में बिना सीट बेल्ट बांधे गाड़ी चलाने की संस्कृति ही बन चुकी है। 
संयुक्त राष्ट्र का एक अध्ययन हमें बताता है कि सिर्फ सड़क दुर्घटनाओं की वजह से देश के सकल घरेलू उत्पाद, यानी जीडीपी को तीन फीसदी का नुकसान होता है और इन दुर्घटनाओं में सबसे ज्यादा वे वयस्क मारे जाते हैं, जो हमारे कार्यबल का हिस्सा हैं। इन दुर्घटनाओं में हमारी अगली पीढ़ी का कार्यबल, यानी बच्चे काफी संख्या में चले जाते हैं, इसका आंकड़ा है 43 प्रतिदिन का। ये आंकड़े हमें नहीं बताते कि इनमें से कितने लोग सीट बेल्ट न लगाने की लापरवाही से जान से हाथ धोते हैं। कई बार तो पूरे-पूरे परिवार बेसहारा हो जाते हैं, क्योंकि उनका मुख्य कर्ताधर्ता ही चला जाता है। अगली सीट पर बैठने वाले तो सीट बेल्ट नहीं ही लगाते, पिछली सीट वाले तो इसके बारे में सोचते तक नहीं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:najariya hindustan column on 11 january