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सरकारी स्कूल में शिक्षक होने की चुनौतियां

दिलीप रांजेकर, सीईओ, अजीम प्रेमजी फाउंडेशन

देहरादून से करीब 65 किलोमीटर दूर सरकारी स्कूल तक पहुंचने में हमें लगभग 90 मिनट लग गए। स्कूल जंगल में है और इसमें मुख्यत: इस क्षेत्र के जनजाति समुदायों के बच्चे आते हैं। दो कमरों वाले इस स्कूल का प्रबंधन एक प्रधानाध्यापक (जो शिक्षण कार्य भी करते हैं) और एक अन्य शिक्षक द्वारा किया जाता है। जैसा कि हम ऐसे कई सरकारी स्कूलों में देखते हैं, प्रधानाध्यापक और शिक्षक, दोनों लगनपूर्वक स्कूल में सार्थक काम करने की कोशिश कर रहे हैं। कक्षाएं बच्चों द्वारा तैयार की गई सीखने-सिखाने की सामग्रियों से भरी हैं। प्रधानाध्यापक बहुत सहयोगी स्वभाव के हैं और जो युवा शिक्षिका हैं, वह अपने काम में तल्लीन हैं। वह स्कूल से लगभग 30 किलोमीटर दूर रहती हैं और विद्यालय शुरू होने से लगभग आधा घंटा पहले सार्वजनिक परिवहन के माध्यम से स्कूल पहुंचती हैं। इसके लिए उनको हर रोज सुबह पांच बजे जागना पड़ता है और घर से निकलने से पहले घर के सभी जरूरी काम भी निपटाने पड़ते हैं।
शिक्षिका ने बहुत उत्साह से हमारा स्वागत किया और उन विभिन्न तौर-तरीकों से हमारा परिचय करवाया, जिसका उपयोग वहां सीखने-सिखाने के लिए होता है। उसने हमें बहुत गर्व के साथ बच्चों के वे दस्तावेज दिखाए, जो उन्होंने प्रत्येक बच्चे के लिए खुद तैयार किए हैं। इनमें बच्चों के परिवार की पृष्ठभूमि, सीखने में उनकी प्रगति और बच्चों के प्रवेश से लेकर उनके वर्तमान प्रदर्शन तक समस्त जानकारियां शामिल हैं। हर चीज बहुत ही साफ-सुथरे तरीके से सहेजी गई थी। वह बच्चों के समूहों को उनकी पसंद के अनुसार प्रोजेक्ट भी देती हैं। हम कक्षा में लगभग 45 मिनट रहे। इस दौरान एक भी बच्चे ने न तो हमारी ओर ध्यान दिया और न ही कुछ पूछने के लिए वे शिक्षिका के पास गए। बच्चे जो गतिविधियां कर रहे थे, वे उसमें पूरी तरह से जुटे हुए थे। 
हर दिन 30-40 बच्चों की कक्षा को ध्यान में रखते हुए शिक्षक के उस असाधारण काम की कल्पना कीजिए। कई युवा माताओं ने मुझे बताया है कि सिर्फ एक या दो बच्चों की देखभाल करने का काम भी कितना थकाने वाला होता है। बच्चे भिन्न पारिवारिक पृष्ठभूमि, विभिन्न सामाजिक-आर्थिक स्तर, अलग-अलग क्षमताओं, विभिन्न स्वास्थ्य स्तर और विभिन्न आकांक्षाओं के साथ स्कूल आते हैं। वे उन शहरी बच्चों से बिल्कुल अलग होते हैं, जो किसी नर्सरी के दो से तीन वर्ष के अनुभव से गुजर चुके होते हैं। इन अधिकांश बच्चों के माता-पिता या तो अशिक्षित हैं या फिर प्रथम पीढ़ी के साक्षर। इन शिक्षकों से सरकार के विभिन्न कार्यक्रमों और योजनाओं में उत्तरदायित्व निभाने की अपेक्षा की जाती है। उन्हें हर रोज दोपहर के भोजन कार्यक्रम की व्यवस्था में सहयोग करना होता है। उनसे यह भी अपेक्षा की जाती है कि वे पालकों और स्कूल प्रबंधन समितियों के सदस्यों से संबंधित कार्यों को भी निपटाएं। 
स्नातक स्तर तक शिक्षा की खराब गुणवत्ता की स्थिति के बावजूद हम एक व्यक्ति से अच्छा शिक्षक बनने की उम्मीद करते हैं, जिसने मात्र दस महीने का बीएड कार्यक्रम (अब दो साल) पूर्ण किया है। एक पुराना हो चुका पाठ्यक्रम, जो शिक्षक को कक्षा में मिलने वाली गंभीर चुनौतियों से निपटने के लिए तैयार करने के लक्ष्य से नहीं बना। राष्ट्र निर्माण की सामूहिक जिम्मेदारी का निर्वाह करने हेतु शिक्षकों को प्रेरित करने या योग्य बनाने के लिए सेवाकाल के दौरान बमुश्किल कुछ किया जाता है। अधिकांश राज्यों में प्रति शिक्षक मात्र 500 रुपये का सालाना बजट था। कुछ राज्यों में पिछले पांच वर्षों के दौरान यह बजट भी बंद कर दिया गया। शिक्षकों के सेवाकालीन प्रशिक्षण को केंद्रीय रूप से बनाया गया है।  
फिर भी ऐसे शिक्षक हैं, जो अपनी सभी महत्वपूर्ण भूमिकाओं को निभाने की जिम्मेदारी लेते हैं और ऐसी रणनीतियां तैयार करते हैं, जो बच्चों की क्षमता के विकास के लिए उपयोगी होती हैं। हमें उन प्रणालियों को स्थापित करने की आवश्यकता है, जो समाज और राष्ट्र निर्माण में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका का नजरिया बनाने के लिए अधिक से अधिक शिक्षकों को प्रोत्साहित और प्रेरित करे। हमारे पास 80 लाख शिक्षकों में से करीब 20 प्रतिशत सक्षम और स्व-प्रेरित हैं। 16 लाख शिक्षकों की यह एक बहुत बड़ी तादाद है। हमें इस तादाद को 75 प्रतिशत से अधिक तक बढ़ाना होगा। 
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:najariya hindustan column on 10 june