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आखिर कुछ लोगों को ही क्यों परेशान करती है एलर्जी 

नजरिया

बारीक धूल-कणों से मुझे छींक आती है, इस कारण दिल्ली में रहना मेरे लिए कुछ हद तक चुनौती बन गया है। मुझे फूलों के पराग, धूल-कणों व गाड़ियों से निकलने वाली कालिख से तो एलर्जी है ही, स्मॉग और निर्माण-कार्यों से निकलने वाले धूल-कण भी मेरी सांसों पर भारी पड़ते हैं। मुझे नॉन-स्टेरॉइडल एंटी-इन्फ्लैमेटरी ड्रग्स समूह की दर्दनिवारक (पेन-किलर्स) दवाओं से भी एलर्जी है। इसीलिए एस्पिरिन, पैरासिटामोल, इबुप्रोफेन, डिक्लोफेनक और नैप्रोजेन जैसी दवाओं से मेरे शरीर पर हल्के चकत्ते उभर आते हैं। आखिर मैं ही क्यों एलर्जी की शिकार हूं, जबकि मेरे पूरे परिवार में, यानी दादा-दादी, चाचा-चाची किसी को भी ऐसी कोई शिकायत नहीं है?  

यह अब तक साफ नहीं हो सका है कि हममें से कुछ लोगों को ही क्यों एलर्जी होती है? मगर ‘हाइजीन हाइपोथिसिस’ यानी बचपन में संक्रामक रोगाणु, सूक्ष्मजीव या परजीवी के संपर्क में न आने के कारण इनसे लड़ने के लिए शरीर के प्राकृतिक रूप से तैयार न होने को एलर्जी की वजह बताने वाले लोग दावा करते हैं कि बदलती आबोहवा, तेज शहरीकरण, बदलते खान-पान और एंटीबायोटिक्स के इस्तेमाल ने हमारे इम्यून सिस्टम को कमजोर किया है। इसी कारण एलर्जी की शिकायतें बढ़ने लगी हैं। इस सिद्धांत को अब ‘माइक्रोबायोमी हाइपोथिसिस’ में शामिल कर दिया गया है। इसमें यह माना गया है कि मानव के माइक्रोबायोमी (यह विटामिन पैदा करता है, हमें रोगाणुओं से बचाता है और ऊर्जा देता है) का रोगाणुओं से संपर्क दरअसल शरीर की रोग प्रतिरोधी क्षमता के लिए काफी मायने रखता है। यह किसी खतरे को पहचानने व उसे नष्ट करने के लिए शरीर को तैयार करता है। सामान्य प्रसव, स्तनपान, खुले मैदान में खेल संबंधी या अन्य गतिविधियां, बंद कमरे में कम रहना, कम चीनी व कार्बोहाइड्रेट वाला स्वस्थ भोजन और एंटीबायोटिक्स का समझदारी से इस्तेमाल माइक्रोबायोमी को सेहतमंद रखता है, जिससे एलर्जी का खतरा कम होता है।  

पिछले दिनों जारी एक अध्ययन का नतीजा बताता है कि यदि शिशु को जन्म के शुरुआती छह महीने के दौरान एंटासिड या एंटीबायोटिक दवाइयां दी जाती हैं, तो बाद में उसमें अस्थमा या अन्य एलर्जी होने का खतरा बढ़ जाता है। 7,92,130 बच्चों पर किया गया यह अध्ययन जामा पीडीएट्रिक्स  जर्नल में छपा है, जिसमें कहा गया है कि करीब आठ फीसदी बच्चों को ऐसी दवाएं उल्टी, पेट दर्द या गैस संबंधी शिकायतें ‘दूर करने के लिए’ नियमित तौर पर दी जा रही हैं। अध्ययन यह भी बताता है कि यदि एंटासिड ली जाती है, तो सी-फूड यानी समुद्री खाद्य पदार्थों को छोड़कर बाकी सभी खान-पान से एलर्जी होने का खतरा है। साथ ही, अस्थमा, खुजली-आंखों से पानी निकलने-छींक आने आदि लक्षणों वाली एलर्जी, कंजेक्टिवाइटिस आदि का जोखिम भी रहता है। खुराक पर ध्यान दिए बिना यदि बचपन में एंटीबायोटिक्स दी जाए, तो भविष्य में अस्थमा का खतरा दोगुना तक बढ़ जाता है। अन्य अध्ययनों में यह भी पाया गया है कि भाई-बहन होने, कम उम्र में प्री-स्कूल या डे-केयर में भेजने और घर में पालतू जानवर होने से एलर्जी से कुछ हद तक सुरक्षा मिलती है। गौर करने लायक यह भी है कि शुरुआती छह महीने में लगातार संक्रमण होना त्वचा एलर्जी का खतरा बढ़ाता है। यह उस सोच के खिलाफ है कि शुरुआती दिनों में इंफेक्शन से लड़ना आगे एलर्जी से बचाता है।

आज करीब पांच फीसदी भारतीय किसी न किसी तरह की एलर्जी का शिकार हैं, और यह आंकड़ा लगातार बढ़ रहा है। जिन लोगों को एलर्जी होती है, उनमें दमा होने का खतरा तीन गुना और कान का संक्रमण व क्रोनिक साइनस का खतरा बिना एलर्जी वाले लोगों के मुकाबले कहीं ज्यादा होता है। वयस्कों में एलर्जी का इलाज एंटीहिस्टामाइंस, एंटी-ल्यूकोट्रिएंस और नेजल कॉर्टिकोस्टोराइड स्प्रे जैसी दवाओं से किया जा सकता है। ओरल इम्यूनोथेरेपी वैक्सिनेशन भी इसका एक बेहतर इलाज है। हालांकि इन सबका असर न होने पर एलर्जी शॉट्स भी लगाया जा सकता है। यह तब दिया जाता है, जब एलर्जी का गंभीर हमला हुआ हो।

(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:najariya hindustan column on 10 april