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बच्चों को परिवार से अलग करना समाधान नहीं

तमाम प्रयासों के बाद हमने जो किशोर न्याय अधिनियम अपनाया है, वह पूरी तरह बच्चों की सुरक्षा के पश्चिमी मॉडल पर आधारित है। यह कानून सरकारी एजेंसियों को अधिकार देता है कि वे बिना गहन तफ्तीश या मुकदमा चलाए बच्चों को कई वजहों के आधार पर उनके परिवार से अलग कर सकती हैं। बावजूद इसके कि हमारे यहां की सामाजिक स्थितियां भी अलग हैं और इस कानून के तहत आने वाले ज्यादातर मामले भी अलग तरह के होते हैं। और तो और, खुद पश्चिमी देशों में इसे बहुत सफल मॉडल नहीं माना जा सकता। 
आमतौर पर हम मान लेते हैं कि पश्चिम में बच्चों को उनके परिवार से अलग करने वाली बाल संरक्षण व्यवस्था मुख्य रूप से परिवार के भीतर यौन उत्पीड़न या हिंसा जैसे मामलों पर केंद्रित होगी। मगर बहुत सारे पश्चिमी देशों के सरकारी आंकड़ों से पता चलता है कि ऐसा बिल्कुल नहीं है। उदाहरण के लिए, अमेरिका में बच्चों को माता-पिता से अलग करने के लिए दिए जाने वाले कारणों में यौन उत्पीड़न की श्रेणी में चार प्रतिशत और शारीरिक उत्पीड़न की श्रेणी में 12 प्रतिशत मामले हैं। अमेरिकन फॉस्टर केयर व्यवस्था के आंकड़ों से पता चलता है कि इसके तहत आने वाले ज्यादातर मामले मां-बाप की नशाखोरी या बच्चों की उपेक्षा से संबंधित होते हैं। बेशक, बच्चों की नजर से ये गंभीर समस्याएं हैं, मगर बच्चों को माता-पिता से स्थाई रूप से अलग कर देना तो बहुत ही कू्रर कदम होगा। खासतौर से तब, जब इस तरह के मामलों में निशाना बनने वाले ज्यादातर बेहद गरीब होते हैं। यह व्यवस्था संपन्न वर्ग के नशाखोर मां-बाप को शायद ही कभी छू पाती है।  
इसी तरह  इंग्लैंड के सरकारी आंकड़ों से पता चलता है कि 2012 से हर साल जिन बच्चों को उनके परिवारों से अलग किया गया था, उनमें से 60 से 62 प्रतिशत बच्चे उत्पीड़न अथवा उपेक्षा की श्रेणी में रहे हैं। मगर इन आंकड़ों में इस बात का ब्योरा नहीं दिया जा रहा है कि उत्पीड़न की श्रेणी में यौन, शारीरिक और भावनात्मक उत्पीड़न की घटनाओं का क्या प्रतिशत रहा? परिवार के भीतर यौन उत्पीड़न या हिंसा किसी भी तरह के भावनात्मक उत्पीड़न के मुकाबले बहुत गंभीर किस्म की समस्याएं होती हैं। लिहाजा इन आंकड़ों से यह भी पता नहीं चलता कि बच्चों को उनके माता-पिता से अलग करने के लिए किसी गंभीर उत्पीड़न की बात की जा रही है या ऐसी समस्याओं की बात की जा रही है, जिन्हें उत्पीड़न की श्रेणी में डालना वाजिब नहीं। इंग्लैंड की अदालतों द्वारा दिए गए फॉस्टर केयर संबंधी आदेशों को देखकर पता चलता है कि बच्चों को अपने माता-पिता से अलग करने के लिए बहुत मामूली कसौटियों का सहारा लिया जाने लगा है, जैसे फैमिली कोर्ट द्वारा भविष्य में भावनात्मक क्षति की आशंका के फैसले, जहां न्यायाधीश यह भी कहते हैं कि माता-पिता बच्चों को प्रेम करते हैं और बच्चों को उनकी वजह से कोई नुकसान नहीं पहुंचा है। नॉर्वे के सरकारी आंकड़ों में बच्चों को सरकारी संरक्षण में रखने के कारणों का अलग-अलग ब्योरा नहीं दिया जाता, मगर सरकारी संरक्षण में पल रहे बच्चों से संबंधित आंकडे़ जारी करने वाली संस्था का कहना है कि बाल कल्याण व्यवस्था में बच्चों और युवाओं को रखने के पीछे माता-पिता की क्षमताओं की कमी और परिवार में गंभीर टकराव सबसे मुख्य कारण रहे हैं। 
बाल संरक्षण का यह पश्चिमी मॉडल बच्चों के वास्तविक उत्पीड़न को रोकने पर नहीं, बल्कि इस बात पर ज्यादा केंद्रित है कि परिवार का आंतरिक माहौल कैसा है, मां-बाप की जीवन शैली कैसी है और मां-बाप अपने बच्चे को कैसा भौतिक जीवन स्तर दे सकते हैं। अगर ऐसा है, तो सवाल यह उठना चाहिए कि क्या ये इतनी बड़ी चिंताएं हैं कि इनके लिए बच्चे को जबरन पूरे परिवार से अलग कर देने जैसा भयानक कदम उठाया जाए? एक परिवार जिन समस्याओं से जूझ रहा है, उनसे निपटने के लिए यह कदम न तो अनुपात के हिसाब से, और न ही इंसानियत के हिसाब से जायज ठहराया जा सकता है। हमें गंभीरता से सोचना चाहिए कि भारत में ऐसी दंडात्मक व्यवस्था की जरूरत ही क्या है? हमें ऐसा वैकल्पिक मॉडल तैयार करना चाहिए, जिसमें संकटग्रस्त बच्चों को उनके परिवार और समुदाय से अलग किए बिना उनको राहत और मदद दी जा सके।  
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Najariya Hindustan Column on 1 april