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‘बसंती’ सराही तो गई, मगर अपनाई नहीं गई

hema malini mp and actor

एक अभिनेत्री के तौर पर मैंने तरह-तरह के किरदार निभाए हैं। मगर मेरी सबसे यादगार भूमिका शोले  की बसंती है। वह साहसी तांगेवाली एक सशक्त महिला की प्रतिनिधि पात्र है, जो अपनी शर्तों पर जीती है और अपनी ही शर्तों पर काम करती है। उसकी अपनी एक राय है, और उसे वह पूरी बेबाकी से अभिव्यक्त भी करती है। बहरहाल, रुपहले परदे की खुदमुख्तार और दिलेर बसंती के किरदार को तो काफी लोगों ने सराहा और पसंद किया, मगर अफसोस! आजादी के बीते सात दशकों में औरतों की असल जिंदगी में जिस तब्दीली को हम सब देखना चाहते हैं, वह मुमकिन न हो सकी।

विरोधाभासों और विसंगतियों से भरे मुल्क के रूप में हमने अपने देश की औरतों को अब तक वह माहौल नहीं दिया, जिसमें वे अपनी पसंद की जिंदगी चुन और जी सकें। ज्यादातर औरतों को आर्थिक मुख्यधारा से अलग रखकर हमने देश केे आर्थिक व समावेशी विकास की राह में भी रुकावटें खड़ी कीं। और वह भी तब, जबकि एक के बाद दूसरी सरकारों ने औरतों की भूमिका को परिवर्तनकारी माना, मगर उन्हें अपने सपने पूरे करने के लिए बुनियादी इन्फ्रास्ट्रक्चर नहीं मुहैया कराया।

अध्यात्म के शिखर तक पहुंचने के लिए शिव और शक्ति के महामिलन का वर्णन करते हुए स्वामी विवेकानंद ने कहा था, ‘शक्ति के बिना जगत का उत्थान संभव नहीं।’ अगर किसी ने शक्ति की मुक्ति के महत्व को समझा है, तो वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं। अपने एक ‘मन की बात’ संबोधन के तहत उन्होंने बताया था कि कैसे छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित जिले दंतेवाड़ा में आदिवासी औरतें असाधारण काम कर रही हैं। हालांकि, दंतेवाड़ा खून-खराबे और हिंसा से बुरी तरह ग्रस्त इलाका है, मगर वहां की औरतें अपने कारोबार कर रही हैं और आत्मनिर्भर बन रही हैं। वे अपने जीवन के फैसले खुद ले रही हैं। आदिवासी औरतें रिक्शा चला रही हैं और आर्थिक-सामाजिक रूप से खुद को सशक्त बना रही हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने स्थानीय प्रशासन की उन कोशिशों की भी सराहना की, जिसमें उन्होंने ्त्रिरयों की संभावनाओं को देखते हुए प्रशिक्षण देना शुरू किया है।

हममें से जिन लोगों ने देश के आदिवासी इलाकों को साल-दर-साल हिंसा से आक्रांत देखा है, वहां कामयाबी की ये कहानियां उम्मीद जगा रही हैं। सरकार ने समाज के सबसे वंचित तबके की औरतों के लिए समान अवसरों की जमीन तैयार की है। सरकार की महत्वपूर्ण योजनाओं का सबसे ज्यादा फायदा महिलाओं ने उठाया है। इससे यह भी पता चलता है कि वे अधिकार हासिल करने के लिए आगे आ रही हैं। मुद्रा योजना इस लिहाज से काफी महत्वपूर्ण है कि वह महिलाओं को उद्यमी बनने के लिए प्रोत्साहित कर रही है। इसे जिन 12 करोड़ लोगों ने अपनाया है, उनमें 76 फीसदी से ज्यादा महिलाएं हैं। यह किसी मौन क्रांति से कम नहीं।

महिलाओं के इस तरह विकास के लिए आगे आने को सरकार ने देश की विकास गाथा का एक पैमाना बना दिया है। प्रधानमंत्री जब फैसले लेने की प्रक्रिया में महिलाओं की भागीदारी की बात करते हैं, तो इसमें कोई औपचारिकता नहीं होती। उन्होंने इसे करके भी दिखाया है। आज देश के दो सबसे महत्वपूर्ण मंत्रालय रक्षा और विदेश को महिलाएं ही संभाल रही हैं।

पिछले चार साल में महिलाओं की भागीदारी के धरातल का जो विस्तार हुआ है, उसमें भारतीय सेना भी शामिल है। अभी तक शॉर्ट सर्विस कमीशन में जिन महिला अधिकारियों का चयन होता है, उनके लिए प्रधानमंत्री ने स्थायी कमीशन बनाने की घोषणा भी कर दी है। उन्होंने वह संवाद भी शुरू किया है, जिसने समाज की कई असहज करने वाली सच्चाइयों को हमारे सामने रखा है। चाहे मामला तीन तलाक का हो या फिर निकाह हलाला का, इन्हें लेकर सिर्फ मुस्लिम महिलाएं ही नहीं, बल्कि बराबरी में विश्वास करने वाले सभी लोग चिंतित रहे हैं। इन पर फैसलों ने मुस्लिम महिलाओं को एक बड़ी ताकत दी है। महिलाओं की अगुवाई वाले इसी विकास की अवधारणा को आगे ले जाने की जिम्मेदारी अब हर किसी को संभाल लेनी चाहिए। एक आत्मनिर्भर बसंती अब सिर्फ हमारी कल्पनाओं में नहीं होनी चाहिए।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:najariya hindustan column of hema malini on 1st of september