najariya hindustan column for 4 may - जमीनी अधिकारों से भी दूर  हैं छावनी के बाशिंदे DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

जमीनी अधिकारों से भी दूर  हैं छावनी के बाशिंदे

नरेंद्र रौतेला सामाजिक कार्यकर्ता

कभी ब्रिटिश शासन के रक्षा तंत्र और आरामगाहों के रूप में विकसित हुए देश के 62 छावनी क्षेत्रों के लोगों में एक उम्मीद जगी है। पहली बार देश के निर्वाचित छावनी  प्रतिनिधियों और इन क्षेत्रों से लोकसभा में प्रतिनिधित्व करने वाले 50 से अधिक सांसदों की एक बैठक छावनी परिषदों की समस्याओं पर विचार करने के लिए रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण की अध्यक्षता में होने जा रही है। 19वीं सदी में ही ब्रितानी हुकूमत के विशेषाधिकार प्राप्त फौज को बसाने के लिए छावनी परिषदों की स्थापना शुरू हो गई थी। यूं तो छावनी क्षेत्र ब्रिटिश सेना के अधिकारियों और सैनिकों के ऐशो-आराम के लिए बसाए गए थे। जाहिर है, वहां बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए नागरिक आबादी को बसाना भी जरूरी था। नागरिक आबादी की बसाहट को लालकुर्ती, सदर बाजार, और मालरोड जैसे नामों से जाना गया।

ब्रिटिश शासकों को छावनी क्षेत्रों के प्रबंधन की पूरी छूट थी, फिर भी इनका प्रसाशन चलाने के लिए भारतीय छावनी परिषद ऐक्ट-1924 लाया गया। इस ऐक्ट के तहत इन क्षेत्रों में निवास कर रहे लोगों के नागरिक अधिकारों और सुविधाओं को सीमित कर दिया गया। बाद में छावनी भूमि प्रबंधन ऐक्ट-1937 में छावनी परिषद में रह रहे निवासियों के भू-अधिकार भी कई पाबंदियों में जकड़ दिए गए। ये कानून अभी भी जस के तस लागू हैं। छावनी परिषद के तहत कोई भी व्यक्ति अपनी भूमि का मालिक न होकर रक्षा विभाग का लीज होल्डर भर होता है। इस लीज का नवीनीकरण एक जटिल प्रक्रिया है, तो पुराने भवनों की मरम्मत और पुनर्निर्माण की प्रक्रिया और भी जटिल है। कानूनों को धता बताने के शॉर्टकट जरूर हैं, लेकिन उनसे समस्या बढ़ती ही है। लीज समाप्त होने के बाद यहां के लोगों को नोटिस थमा दिया जाना या जुर्माने का भारी-भरकम बिल पकड़ा दिया जाना आम बात है। कई बार नामी-गिरामी पूर्व सैन्य अधिकारियों पर भी भारी जुर्माना लगा दिया जाता है। उत्तराखंड के सबसे अधिक आबादी वाले कैंट रानीखेत में पिछले साल लीज खत्म होने के नाम पर बहुत से लोगों को छावनी परिषद ने करोड़ों के बिल थमा दिए थे। लीज खत्म होने पर बेदखली की तलवार तो तकरीबन हर छावनी क्षेत्र वासी के सिर पर हमेशा लटकी रहती है।

इन इलाकों में निर्वाचित छावनी परिषदों की व्यवस्था जरूर है, पर इनमेंभी रक्षा विभाग का पलड़ा ही भारी रहता है। इन परिषदों में निर्वाचित सदस्यों की भूमिका संसाधन जुटाने के नाम पर करों का बोझ बढ़ाने तक सीमित है। रक्षा मंत्रालय के भारी-भरकम बजट में भी छावनी क्षेत्रों की सुविधाओं के नाम पर मिलने वाला बजट नगण्य होता है। छावनी प्रशासन से त्रस्त शहरों में उत्तराखंड के तीन पर्वतीय नगर रानीखेत, लैंसडाउन व चकराता के उदाहरण उल्लेखनीय है। इस क्षेत्र में कई कैंट एरिया हैं और पूरी तरह रक्षा मंत्रालय द्वारा शासित इन क्षेत्रों में कई बार इन कानूनों के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन हो चुके हैं। 

ऐसे ही आंदोलनों का नतीजा है कि निर्वाचित छावनी सदस्यों ने अखिल भारतीय कैंट बोर्ड उपाध्यक्ष और सदस्य एसोसिएशन का गठन करके छावनी क्षेत्र की समस्याओं के निराकरण के लिए राष्ट्रीय स्तर पर प्रयास शुरू किए, जिनके चलते 2003 में कैंट ऐक्ट में संशोधन के प्रयास प्रारंभ हुए और 2006 में नया कैंट अधिनियम लागू किया गया। कैंट के निर्वाचित सदस्यों का मानना है कि नए ऐक्ट में नागरिक सुविधाओं की बहाली की बजाय रक्षा संपदा विभाग और सेना को पहले से भी अधिक अधिकार प्रदान कर दिए गए। मनोहर पर्रिकर ने रक्षा मंत्री रहते हुए छावनी परिषद क्षेत्रों के नागरिक अधिकारों और जन-सुविधाओं की बहाली करने हेतु सकारात्मक संकेत दिए थे, जिन्हें उनके रक्षा मंत्रालय छोड़ने के पश्चात ठंडे बस्ते में डाल दिया। अब जब फिर से ये प्रस्ताव ठंडे बस्ते से बाहर निकल रहे हैं, तो देश की 62 छावनी परिषदों की 50 लाख से भी अधिक जनसंख्या के मन में एक उम्मीद जगी है। हालांकि सारी समस्याएं एकबारगी खत्म हो जाएंगी, यह अभी नहीं कहा जा सकता, लेकिन उम्मीद यही बांधी जा रही है कि छावनी क्षेत्र के लोगोें को भी वही अधिकार मिलेंगे, जो बाकी देश के लोगों को मिले हुए हैं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:najariya hindustan column for 4 may