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वेटिकन के तंत्र में इस बार रेफरी ही निशाने पर

महेंद्र राजा जैन

अमेरिका का कैथोलिक चर्च इस वक्त एक काफी क्रूर अंतद्र्वंद्व से जूझ रहा है। अमेरिका में वेटिकन या कहूं कि पोप के पूर्व राजदूत ने मांग की है कि अब पोप फ्रांसिस को अपने पद से इस्तीफा दे देना चाहिए। यह एक ऐसी चाल है, जो 1417 से अब तक कभी नहीं खेली गई और इस बार भी इसके सफल होने की संभावना बहुत ही कम बताई जा रही है। इसका ऊपरी कारण यह बताया जा रहा है कि आर्कबिशप कालार्े मारिया वीगानो ने पोप पर सीधे-सीधे आक्षेप लगाया है कि उन्होंने यह जानते हुए भी कार्डीनल थियोडोर मैक्कैरिक को अपने अमेरिकी सलाहकार के रूप में रखा कि वह प्रशिक्षु पादरियों के यौन शोषण के लिए कुख्यात हैं। वैसे चर्च पदाधिकारियों पर ऐसे आरोप नए नहीं हैं। अमेरिका के कैथोलिक चर्च इस वक्त पूरी तरह ‘राजनीति’ और ‘संस्कृति’ में बंटे हुए हैं। कट्टरपंथी कैथोलिक रिपब्लिकन पार्टी से इवेंगिकल संप्रदाय के समान जुड़े हैं। उसके मुख्य मुद्दे हैं- गर्भपात, राष्ट्रवाद और समलैंगिकों के अधिकार का विरोध। उसे कुछ बौद्धिकों का भी समर्थन प्राप्त है, यद्यपि उनमें अधिकांश प्रोटेस्टेंट हैं। इसके उलट वामपंथी कैथोलिक सीधे-सीधे आधुनिक पूंजीवाद के विरोधी हैं। यौनिकता के संबंध में उनके विचार केवल सैद्धांतिक स्तर पर मान्य हैं, व्यावहारिक रूप में उन पर अमल नहीं किया जा सकता, बल्कि वे ही इसे अनैतिक मानते हैं। आरोपों के मामले में कोई पक्ष पीछे नहीं है। 

रोमन कैथोलिकों के नेता चुने जाने के साथ पोप फ्रांसिस शुरू से ही कट्टरपंथियों के निशाने पर रहे हैं, पर हाल ही में वेटिकन में जो कुछ हुआ, वह उनके अब तक के पांच वर्ष के पोप-तंत्र का सबसे भयंकर संकट कहा जा सकता है। पोप फ्रांसिस से पहले के दो पोप कट्टर रूढ़िवादी या कहें कि अनुदारवादी थे। उन दोनों के बीच पोप जॉन पाल द्वितीय और उसके बाद हुए पोप बेनेडिक्ट तीन दशकों तक अपने अनुयायियों को रूढ़िवादिता की ओर ले जाते रहे। पोप फ्रांसिस ने महज साढे़ चार वर्ष में ही चर्च को बहुत-कुछ  वापस मध्यकाल में लाने की कोशिश की है, पर कैथोलिक आदर्शवादी दक्षिणपंथी शुरू से उनका विरोध करते आ रहे हैं। पीठ पीछे उनकी आलोचना करने वालों के कारण उनके अनुयायियों में काफी रोष है और वे नहीं चाहते हैं कि पोप फ्रांसिस परंपरागत रूप से रिटायर हों। लेकिन सच यह है कि मीडिया ने उनकी जो उदार छवि बना रखी है, वे वास्तव में वैसे नहीं हैं। गर्भपात, गर्भ-नियंत्रण, समलिंगी विवाह और महिला पादरियों के प्रश्न पर वह परंपरागत कैथोलिक मान्यताओं के पक्षधर हैं। इसके बावजूद कट्टरपंथी लोग उन्हें पसंद नहीं करते। 

समलिंगी विवाह पर वह यह कहकर बच गए कि ‘निर्णय करने वाला मैं कौन होता हूंं?’ हिजड़ों को उन्होंने वेटिकन में आमंत्रित ही नहीं किया, वह उनसे गले भी मिले। तलाकशुदा और पुनर्विवाहित लोगों के लिए भी उन्होंने चर्च के द्वार खुले रखे। महिला पादरियों के सवाल पर उन्होंने एक कमेटी बनाई, जिसे महिला पादरियों के पक्ष में अगला कदम माना जा रहा है। वह पोप-तंत्र की वैधानिक राजशाही स्थिति से छुटकारा और वेटिकन की नौकरशाही में भी परिवर्तन लाना चाहते हैं। यह भी कट्टरपंथियों की नाराजगी का कारण है। इस समय पोप फ्रांसिस अपने आलोचकों द्वारा छेड़े गए अभियान का सामना कर रहे हैं, जिसे लंदन के संडे टाइम्स  ने कैथोलिक चर्च के अंदर चल रहा ‘गृहयुद्ध’ कहा है। उनके खिलाफ पुस्तकें और लेख तो पहले ही लिखे जा चुके हैं, अब पाठकों के पत्र भी छप रहे हैं। उनके विरुद्ध छेड़ा गया यह अभियान आधुनिक समय में किसी पोप पर किया गया अभूतपूर्व हमला है। उनकी 80वीं वर्षगांठ पर इटली के फेतो कोतिदियानो  में जो लेख छपा, उससे पता चलता है कि कैथोलिक धर्माचार्य की सत्ता के साथ ही उनके द्वारा अब तक किए गए कायार्ें के औचित्य पर भी उंगली उठाई गई है। इस पूरे प्रकरण ने पिछली सदी के छठे दशक में द्वितीय वेटिकन काउंसिल के बीच छिड़े ‘युद्ध’ की याद दिला दी है, जब चर्च में सुधार के प्रश्न पर भयंकर विवाद छिड़ा था। वहां गुटबाजी पहले भी होती रही है, पर पोप की भूमिका हमेशा ‘रेफरी’ की रहती थी। इस बार तो सीधे-सीधे पोप ही निशाने पर हैं।
   (ये लेखक के अपने विचार हैं) 

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  • Web Title:najariya hindustan column by mahendra raja jain