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यमुना नदी के प्रदूषण को क्यों भूल गए हैं हम

ज्ञानेन्द्र रावत पर्यावरण कार्यकर्ता

विश्व प्रसिद्ध कुंभ प्रयागराज जिस जगह शुरू हुआ है, वहां गंगा और यमुना का संगम है। गंगा नदी की सफाई की चर्चा तो हम अक्सर करते हैं, लेकिन यमुना को आमतौर पर भुला दिया जाता है। यह बात अलग है कि तमाम दावों के बावजूद गंगा भी अभी तक साफ नहीं हो सकी है, लेकिन यमुना तो उस तरह चर्चा में भी नहीं है। यह सच है कि गंगा की तरह यमुना की शुद्धि के लिए भी अब तक कई अभियान चले और करोड़ों रुपये की राशि खर्च हो चुकी है। यमुना को टेम्स बनाने के दावे भी हुए। कई धर्मगुरु और पर्यावरण कार्यकर्ता भी इस अभियान को लेकर सक्रिय हुए, लेकिन हुआ कुछ नहीं। यमुना की सफाई की बात जब भी होती है, तो वह दिल्ली के आसपास ही सिमट जाती है। यह भी सच है कि यमुना को सबसे ज्यादा प्रदूषित देश की राजधानी ही करती है। मगर यहां भी इस नदी का कल्याण नहीं हो सका और अब वह नाले में तब्दील होकर रह गई है।
यमुना के 1,376 किलोमीटर लंबे रास्ते में दिल्ली का क्षेत्र सिर्फ दो फीसदी है, लेकिन यमुना में 79 फीसदी गंदगी दिल्ली ही घोलती है। अनुमान है कि दिल्ली की तकरीबन 52 हजार से अधिक औद्योगिक इकाइयां यमुना को जहरीला बनाने में अहम भूमिका निभा रही हैं। रिहाइशी इलाकों में चलने वाली ये औद्योगिक इकाइयां सीधे तौर पर अपना औद्योगिक कचरा नालों व सीवर के जरिए यमुना में गिरा रही हैं। इसके साथ-साथ राजधानी के औद्योगिक इलाकों में चल रहे कारखाने भी यमुना को प्रदूषित करने में कम दोषी नहीं हैं। इसका खुलासा एनजीटी के समक्ष यमुना की सफाई के लिए गठित समिति ने बीते दिनों अपनी रिपोर्ट में किया है। उद्योगों से निकलने वाला रासायनिक अपशिष्ट घरेलू सीवर में मिलने के बाद काफी कोशिश के बाद भी सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट यानी सीटीपी में शोधित नहीं हो पाता। 

दिल्ली के सीटीपी की क्षमता प्रतिदिन 2,120 लाख लीटर कचरे के प्रवाह को शोधित करने की है। लेकिन हकीकत में अभी सिर्फ 520 लाख लीटर का ही शोधन हो पाता है। पल्ला से बदरपुर तक यमुना की कुल लंबाई 54 किलोमीटर है। इस बीच राजधानी का 1,390 लाख लीटर सीवर का पानी सीधे-सीधे यमुना में जाता है। इसके अलावा यमुना में गणेश चतुर्थी, दुर्गा मूर्ति विसर्जन और छठ पूजा के दौरान होने वाली धार्मिक गतिविधियों से भी प्रदूषण बढ़ा है। इस बात का खुलासा केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने एनजीटी द्वारा गठित समिति के समक्ष किया है। बोर्ड ने समिति के समक्ष कहा है कि सिंथेटिक सामग्री से बनी और घातक रसायन युक्त पेंट से रंगी मूर्तियों के विसर्जन से यमुना में भारी धातु की सांद्रता कई गुना तक बढ़ गई है, जो सेहत के लिए काफी खतरनाक है। 

यह खतरा सिर्फ दिल्ली के लिए नहीं, देश के उन तमाम हिस्सों के लिए है, जहां से यमुना बहती चलती है और उसके बाद सारा प्रदूषण गंगा में उड़ेल देती है। समिति ने चेतावनी देते हुए कहा है कि यमुना जीवित रहने के लिए संघर्ष कर रही है। इसका न्यूनतम प्रवाह सुनिश्चित किए जाने तक यमुना नदी के पुनरुद्धार की संभावना नहीं है। हालत यह है कि यमुना कई जगहों पर साल में नौ महीने तक सूखी रहती है। 

यमुना की सफाई को लेकर कई परियोजनाएं बन चुकी हैं, लेकिन इस नदी की गंदगी भी बढ़ती ही जा रही है। यमुना नदी में, खासकर मथुरा, वृंदावन क्षेत्र में कैडमियम, लेड, निकिल, मैगनीज, जिंक, आयरन जैसी विषाक्त धातुएं पाई गई हैं। अब यमुना की सफाई को लेकर 12 संयंत्रों पर काम शुरू किया गया है। सरकार का दावा है कि यह काम पूरा होने के बाद यमुना में स्वच्छ जल का प्रवाह होने लगेगा। बताया गया है कि इन संयंत्रों का निर्माण होने के बाद यमुना में गंदा पानी प्रवाहित नहीं किया जाएगा। 
यह भी सच है कि यमुना नदी दिल्ली में प्रवेश से पहले ही काफी प्रदूषित हो चुकी होती है। हरियाणा के तमाम जिलों की कई औद्योगिक इकाइयों का कचरा और उसके शहरों का सीवेज इसे काफी पहले ही जहरीला बना देता है। शुद्धि अभियान की जरूरत पूरे देश में है, लगभग देश की हर नदी में।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:najariya hindustan column 9 january