DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

नई मुश्किलें पैदा करता है यौन शोषण में लैंगिक भेदभाव 

ऋतु सारस्वत  समाजशास्त्री

बच्चों को यौन शौषण से बचाने के लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल ने हाल ही में पॉक्सो कानून 2012 (प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेन्सेज ऐक्ट) में संशोधन को स्वीकृति दे दी है। यह कदम न केवल लैंगिक समानता को स्थापित करने की ओर सराहनीय कदम है, बल्कि बाल-दुराचार को रोकने की ओर सुदृढ़ प्रयास भी है। संभावना है कि पॉक्सो संशोधन विधेयक इसी सत्र में संसद में पेश हो सकता है। 

पहले सीआरपीसी के तहत 12 साल से कम आयु की बच्चियों के यौन शोषण के मामलों में मौत की सजा का प्रावधान था, परंतु अब यह कानून लड़के और लड़कियों पर समान रूप से लागू होगा। कानूनी पहल के बावजूद यह प्रश्न यथावत बना हुआ है कि क्या समाज अब भी यह स्वीकार करेगा कि लड़कों का यौन शोषण होता है? कुछ समय पूर्व ‘स्टेट कौंसिल ऑफ एजुकेशनल रिसर्च ऐंड ट्रेनिंग, हरियाणा’ के शोध में यह खुलासा हुआ कि लड़कियों के मुकाबले लड़के यौन शोषण के ज्यादा शिकार हो रहे हैं। यह तथ्य अचंभित करने वाला नहीं, बल्कि प्रयासपूर्वक सालों से छिपाया जाने वाला ‘सच’ है, जिसको निरंतर ‘मिथक’ कहकर झुठलाया जाता रहा है। पितृसत्तात्मक समाज में हमेशा से ही यह स्वीकारा जाता रहा है कि पुरुष संरक्षक है और उसकी यह भूमिका उसके बचपन और किशोरावस्था से शुरू हो जाती है। शारीरिक और मानसिक तौर पर लड़कों को ताकतवर मानने की सोच यह स्वीकारने ही नहीं देती कि लड़कों का शोषण हो सकता है और अगर इसे कुछ लोगों द्वारा स्वीकारा भी जाता है, तो यह शोषण इसलिए नगण्य मान लिया जाता है कि इससे शारीरिक और मानसिक रूप से शोषित लड़के का कुछ नहीं बिगड़ा, परंतु यह सोच अत्यंत घातक है। तो क्या मान लिया जाए कि अगर शारीरिक शोषण कौमार्य भंग नहीं करता, तो वह अपराध नहीं है? इंडियन जर्नल ऑफ साइकिएट्री  ने 2015 में एक लेख प्रकाशित किया था, जिसमें यौन शोषण के बाल पीड़ितों का उल्लेख था। लेख में एक नौ वर्षीय शोषित बच्चे के पिता की बात थी, जो अपने बेटे की मनोवैज्ञानिक देखभाल का विरोध कर रहा था कि ‘वह न तो इससे अपना कौमार्य खो देगा और न ही वह कोई गर्भ धारण कर लेगा। उसे एक मर्द की तरह व्यवहार करना चाहिए, न कि एक डरपोक की तरह।’ ‘मर्द की तरह व्यवहार’ करने की सीख लड़कों को बचपन से इसी तरह सिखा दी जाती है कि वे स्वयं अपने प्रति हुए यौन दुव्र्यवहार की शिकायत नहीं करते, क्योंकि उन्हें समाज द्वारा स्वयं का मजाक बनाए जाने का डर सताता है। हमें यह स्वीकार करना ही होगा कि शोषण का रूप चाहे कैसा भी हो, वह लैंगिक भेद नहीं देखता। यौन शोषण से पीड़ित पुरुष को भी अपार पीड़ा और मानसिक आघात पहुंचता है, जिसकी परिणति कई बार गहरे अवसाद तक में देखी गई है। मानवाधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था ‘वल्र्ड विजन इंडिया’ ने यह स्पष्ट किया है कि भारत में हर साल जितने भी यौन शोषण के मामले सामने आते हैं, उनमें लड़के-लड़कियों की संख्या करीब-करीब बराबर ही होती है। लड़कों के यौन शोषण को लेकर आज भी समाज में एक चुप्पी है। कई सर्वे बताते हैं कि लड़कियों के मामले में पुलिस जल्दी सक्रिय हो जाती है, जबकि लड़कों के मामले में खास ध्यान नहीं दिया जाता। 

हाल ही में पुरुषों के यौन शोषण के मामले को लेकर देश भर में लगभग 40 गैर-सरकारी संगठनों ने मिलकर एक हेल्पलाइन शुरू की है, जिसे खासकर यौन शोषण के शिकार पुरुषों की शिकायतों को लेकर बनाया गया है। कुछ ऐसी ही पहल बीबीसी हिंदी ने भी की, जिसमें सैकड़ों लड़कों ने अपने साथ हुए यौन शोषण की बात को स्वीकारा। सच तो यह है कि इस पूरे हालात को देखते हुए सामाजिक स्तर पर लड़कों के प्रति जो असंवेदनशीलता है, उसे सप्रयास दूर करने की जरूरत है। इस संबंध में खुलकर चर्चाएं भी करनी होंगी, जिससे लड़कों के यौन शोषण के प्रति यह मिथक टूटे कि इससे उन पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ता, क्योंकि इसमें कोई शक नहीं कि शारीरिक पीड़ा से कहीं अधिक घातक मानसिक पीड़ा होती है। 

(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:najariya hindustan column 8 january