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मोदी विरोध की विपक्षी राजनीति का ध्वस्त होना

मदन जैड़ा

लोकसभा चुनावों में एनडीए के शानदार प्रदर्शन से विपक्ष के मंसूबों पर पानी फिर गया है। भाजपा को घेरने की उसकी रणनीति पूरी तरह से ध्वस्त हो गई है। विपक्ष ने आम चुनावों में मोदी सरकार को घेरने के लिए गठबंधन किए। बेरोजगारी, किसानों के मुद्दे, राफेल, जीएसटी एवं नोटबंदी आदि मुद्दों को उठाया, लेकिन असर नहीं दिखा, बल्कि जनता ने पहले से ज्यादा समर्थन देकर प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी के नेतृत्व पर दृढ़ विश्वास व्यक्त किया है। विपक्ष की रणनीति की विफलता की एक बड़ी वजह यह भी मानी जा रही है कि उसकी रणनीति का पूरा ताना-बाना मोदी विरोध पर केंद्रित था, जबकि भाजपा के प्रचार में मोदी को नायक के तौर पर पेश किया गया था। साफ है, जनता ने मोदी को फिर से नायक के रूप में स्वीकार और मोदी विरोध को खारिज कर दिया।
उत्तर प्रदेश के फूलपुर और गोरखपुर में पिछले साल जब लोकसभा के उप-चुनाव हुए, तो सभी विरोधी दलों ने एकजुट होकर इन दो सीटों पर भाजपा को हरा दिया। यहीं से विपक्ष ने मोदी को हराने के लिए एकजुटता का फॉर्मूला निकाला। उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों में गठबंधन हुए। उत्तर प्रदेश में 24 साल बाद दो प्रतिद्वंद्वी दल- सपा व बसपा ने अपना अस्तित्व बचाने के लिए आपस में हाथ मिला लिए, लेकिन अब नतीजों से साफ है कि इससे यह संदेश गया कि इस गठबंधन का एकमात्र मकसद मोदी विरोध है, जनता के हित नहीं। जातियों एवं समुदायों के समर्थन से गठबंधन ने भाजपा को सबक सिखाने की जो रणनीति तैयार की थी, वह कारगर नहीं हुई। लोगों ने जाति एवं समुदाय के बंधनों को तोड़कर मोदी के नाम पर वोट दिए।
प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस की पूरी रणनीति भी ‘मोदी हटाओ’ पर केंद्रित रही। उसमें ‘कांग्रेस जिताओ’ की झलक कम दिखती थी। चुनाव के दौरान कांग्रेस की तरफ से यहां तक संकेत दिए गए कि केंद्र की सत्ता से मोदी को हटाने के लिए किसी दूसरे दल के नेता को भी प्रधानमंत्री बनाने का समर्थन उसके द्वारा किया जा सकता है। संभवत: इसका भी जनता में अच्छा संदेश नहीं गया। दरअसल, कांग्रेस या विपक्ष की मोदी हटाओ रणनीति में कई छेद थे। एक तो वे मोदी के विकल्प के तौर पर कोई अच्छा चेहरा सामने नहीं रख पाए। दूसरे, मोदी को हटाने के लिए किसी को भी प्रधानमंत्री बनाए जाने की बात जनता को नागवार गुजरी। मतदाताओं को लगा कि विपक्ष के पास न नीतियां हैं और न चेहरा, उसका सिर्फ एक ही मकसद है, किसी तरह से मोदी को हटाओ। जबकि मोदी के व्यक्तित्व, कामकाज और उपलब्धियों को लेकर जनता में पहले से कई सकारात्मक छवियां बनी हुई थीं। यदि कुछ नकारात्मक था भी, तो विपक्ष उसे बाहर निकाल पाने या उसे बड़ा मुद्दा बना पाने में कामयाब नहीं रहा। 
कांग्रेस ने इन चुनावों में राफेल को बड़ा मुद्दा बनाने की कोशिश की, लेकिन इसमें ‘चौकीदार चोर है’ के नारे का संभवत: नकारात्मक संदेश गया। सुप्रीम कोर्ट और सीएजी की क्लिन चिट के बावजूद प्रधानमंत्री के लिए चौकीदार चोर है कहना, जनता को नहीं जंचा। इससे जहां मोदी के प्रति लोगों में सहानुभूति बढ़ी, वहीं जमीनी स्तर पर कांग्रेस के लिए इस मुद्दे ने कोई काम नहीं किया। चुनावों के दौरान खुद मोदी ने विपक्ष की गालियों का जिक्र करके अपने लिए सहानुभूति बटोरी।
पिछले साल मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के चुनाव हारने के बाद भाजपा ने जनता की संभावित नाराजगी दूर करने के प्रयास किए। किसानों और सवर्णों की नाराजगी दूर करने के प्रयास किए गए। किसानों की नाराजगी दूर करने के लिए किसान सम्मान योजना शुरू की गई। परिणामों से यह भी लगता है कि नोटबंदी का मुद्दा आम चुनावों तक नहीं खिंच पाया। जीएसटी से व्यापारियों की नाराजगी दिखी नहीं। सर्जिकल स्ट्राइक और एयर स्ट्राइक पर पूरे देश में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वाहवाही हो रही थी, तब विपक्ष ने उस पर सवाल उठाकर और सुबूत मांगकर अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली थी। चुनाव परिणामों से यह भी प्रश्न पैदा होता है कि  एकजुटता की दुहाई दे रहा विपक्ष क्या वास्तव में एकजुट हो पाया था? नरेंद्र मोदी विरोध की रणनीति पूरी तरह से असफल रही। राष्ट्रीय और ज्यादातर क्षेत्रीय विरोधी दलों के पास इसके अलावा कुछ और था भी नहीं।

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