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सरकार के लिए माओवादियों तक पहुंचने का बेहतर समय

सुदीप चक्रवर्ती  वरिष्ठ पत्रकार

माओवादी हिंसा जारी है। छत्तीसगढ़ में एक विधायक और उनके अंगरक्षकों की भी हत्या हो गई। विगत दो सप्ताह में जब माओवादी विद्रोहियों ने ऐसे हमले किए हैं, तब उनसे शांति वार्ता की सलाह देना राजनीतिक रूप से व्यावहारिक नहीं कहा जाएगा। लेकिन जब शांति ही हो, तब शांति की बात करने का क्या तुक है? माओवादियों के प्रति ऐसी ही एक जैसी सोच हर प्रमुख पार्टी में दिखती है। इसी के परिणामस्वरूप वामपंथी विद्रोही 1967 से ही विभिन्न अवतारों में उपस्थित रहे हैं, अब उनको 53 वर्ष पूरे होने जा रहे हैं। देश में किसी भी दूसरे आंतरिक संघर्ष की तुलना में इसमें कहीं ज्यादा लड़ाके और गैर-लड़ाके मारे जा रहे हैं। जब भारत सरकार अगस्त 2015 से ही अनेक नगा विद्रोही गुटों के साथ शांति वार्ता कर रही है, जब सरकार उन लोगों के साथ भी अर्थपूर्ण वार्ता कर रही है, जो कभी अलगाववादी थे, तो माओवादी विद्रोहियों से वार्ता न करने के पीछे क्या तर्क है?
दस वर्षों तक माओवादी विद्रोह झेलने के बाद वर्ष 2006 में नेपाल ऐसा कर चुका है। वहां कुछ विद्रोही नेता सरकार में शामिल हो गए, तो कुछ अन्य को पेंशन मिलने लगी, और अनेक विद्रोही सेना और अद्र्धसैनिक बलों में शामिल कर लिए गए। अनेक विद्रोहियों का पुनर्वास स्वयं-सहायता कार्यक्रमों के जरिये किया गया, जैसा कि नगा शांति प्रक्रिया में भी होने की आशा है। 
कोलंबिया सरकार ने भी अपने यहां क्रांतिकारी हथियारबंद बलों के साथ संघर्ष को वर्ष 2017 में एक समझौते पर हस्ताक्षर के साथ समाप्त कर दिया। उस वर्ष मई महीने तक 6,000 से ज्यादा विद्रोहियों ने अपने हथियार संयुक्त राष्ट्र अभियान को सौंप दिए। नेपाल तो टूट के कगार पर पहुंच गया था, लेकिन भारत में ऐसा नहीं है। नगा या माओवादी विद्रोहियों की तुलना में भारत बहुत ज्यादा ताकत रखता है। छत्तीसगढ़ और दंडकारण्य क्षेत्र, जिसमें महाराष्ट्र, ओडिशा व तेलंगाना के इलाके भी शामिल हैं, विद्रोहियों की संख्या चंद हजार में ही है। कुछ अनुमानों के अनुसार, उनकी संख्या 1,000 से ज्यादा नहीं है। विद्रोहियों के सामने आंध्र प्रदेश, बिहार और झारखंड में बहुत बाधाएं हैं। बंगाल में विद्रोही तबाह हो चुके हैं। केरल, कर्नाटक और तमिलनाडु के कुछ क्षेत्रों में आग लगाने की कोशिशें हैं, लेकिन वास्तव में ये क्षेत्र विद्रोहियों के हाथ से निकल गए हैं। खासकर पश्चिम बंगाल में यह सिद्ध हो चुका है कि शासन, विकास और समायोजन से इस लड़ाई को प्रभावी तरीके से जीता जा सकता है। 
माओवादियों से वार्ता के लिए इतना बेहतर अवसर पहले कभी नहीं आया। वे विगत 15 वर्षों में संख्या और क्षेत्र के मामले में सिमट गए हैं। उनका नेतृत्व परिवर्तन अभी भी अपने पैर तलाश रहा है। कैडर की ताकत बहुत घट गई है। मनोबल कमजोर हो चुका है। कुछ सुरक्षा विशेषज्ञ इस संघर्ष के प्राकृतिक चक्र की बात करते हैं और बताते हैं कि जब तक यह प्राकृतिक चक्र पूरा नहीं होगा, समाधान संभव नहीं है। जैसे पिछले दशक में प्रभावी कूटनीति और सुरक्षा अभियान उल्फा विद्रोहियों को शांति वार्ता तक ले आए थे। माओवादियों के संदर्भ में कूटनीति की जरूरत नहीं पडे़गी। विद्रोहियों और राज्य, दोनों को केवल एक दूसरे तक पहुंच बनाना पड़ेगी। वैसे शांति की कोशिशें पहले भी हो चुकी हैं। गृह मंत्रालय की तयशुदा लाइन के मुताबिक, जून 2011 में तत्कालीन राष्ट्रपति प्र्रतिभा पाटिल ने माओवादियों से हिंसा छोड़ मुख्यधारा में आने की अपील की थी। विद्रोहियों पर इसका असर नहीं पड़ा। वे टेबल पर आने से पहले कुछ ज्यादा ही चाहते थे। वे अपने आंदोलन क्षेत्र से सुरक्षा बलों को हटाने के साथ ही उन परियोजनाओं के करार रद्द करने की मांग भी कर रहे थे, जिनके तहत राज्य सरकारें व कंपनियां लोगों से जमीनें ले रही थीं। वे चाहते थे कि लोग किस तरह का विकास चाहते हैं, यह तय करने का अधिकार लोगों को ही मिले। विद्रोहियों की यह भी मांग थी कि सभी भ्रष्ट नेताओं को गिरफ्तार और दंडित करना चाहिए, विदेशी बैंकों में जमा तमाम कालेधन को देश लाना चाहिए। 
विडंबना है कि इसमें से कुछ मांगें मुख्य राजनीतिक पार्टियों के वादों में भी दिखती रही हैं। संभव है, मई में कार्यभार ग्रहण करने जा रही नई सरकार को शांति प्रयासों में थोड़ी उत्पादकता दिखे। 
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:najariya hindustan column 20 April