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कोरे कागज पर नई कहानी लिखेंगे तमिल मतदाता

पिछले चार दशकों में शायद यह पहली बार हो रहा है कि तमिलनाडु के मतदाता राजनीतिक शून्य के हालात में वोट डालने जा रहे हैं। यह खालीपन द्रमुक नेता एम करुणानिधि और अन्नाद्रमुक मुखिया जे जयललिता की मौत के बाद पैदा हुआ है। हालांकि करुणानिधि ने अपने जीते-जी यह साफ कर दिया था कि उनके बेटे एमके स्टालिन ही पार्टी के अगले अध्यक्ष होंगे, लेकिन जयललिता ने किसी को भी इस तरह आगे बढ़ने का मौका नहीं दिया। आज उनकी करीबी सहयोगी वीके शशिकला भ्रष्टाचार के मामले में बेंगलुरु की जेल में बंद हैं। ई पलानीसामी मुख्यमंत्री का पद संभालने में सफल साबित हुए हैं, जिन्हें ‘एक्सीडेंटल सीएम’ कहा जा सकता है। अब ओ पन्नीरसेल्वम भी उनके साथ आ चुके हैं, जबकि उन्होंने शुरू में बगावत की थी।
आम चुनाव के अलावा, सत्तारूढ़ अन्नाद्रमुक राज्य विधानसभा की 22 सीटों के लिए हो रहे उप-चुनाव को भी जीतने के लिए दम लगाए हुए है। विधानसभा में तो फिलहाल उसे बहुमत हासिल है, पर पार्टी इन उप-चुनावों में दस सीटें जीतने में भी सफल न हो सकी, तो राज्य की सत्ता उसकी हाथों से निकल जाएगी। कांग्रेस और भाजपा, दोनों की राज्य में नाममात्र की उपस्थिति है, और वे दोनों द्रविड़ पार्टियों (द्रमुक और अन्नाद्रमुक) की दया पर निर्भर हैं। एक-दूसरे दलों के साथ गठबंधन करके ही दोनों राष्ट्रीय पार्टियां अब तक जीतती रही हैं। इसी परंपरा पर चलते हुए द्रमुक ने कांग्रेस के साथ समझौता किया है।
जनमत सर्वेक्षणों से संकेत मिलता है कि द्रमुक-नेतृत्व वाला गठबंधन दूसरी पार्टियों पर भारी पड़ सकता है। देखा जाए, तो द्रमुक अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार का हिस्सा था। पार्टी के मुखिया करुणानिधि एक महान राजनीतिक रणनीतिकार रहे। उन्होंने नि:संकोच होकर भाजपा के साथ जाना पसंद किया, जबकि वह पहले उच्च जातियों की हिंदूवादी और हिंदी राष्ट्रवादी पार्टी बताकर उस पर निशाना साधते रहे थे। इस बार, द्रमुक ने राज्य में मोदी-विरोधी माहौल को भांप लिया है। यहां के दो राजनीतिक दौरे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को काला झंडा दिखाया गया और उन्हें सड़क मार्ग से यात्रा करने से बचने की सलाह दी गई। लोग शायद इसलिए नाराज दिख रहे हैं, क्योंकि गाजा तूफान से हुई तबाही के बाद उनका दुख-दर्द दूर करने के लिए मोदी नहीं आए थे। फिर, किसानों की नाराजगी हाइड्रोकार्बन अन्वेषण परियोजनाओं, न्यूट्रिनो परियोजनाओं और राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (एनईईटी) को लेकर है, जिन्हें वे गरीब ग्रामीणों के खिलाफ मानते हैं। थूथुकुडी में तांबे कारखाने के सामने प्रदर्शन कर रहे लोगों पर हुई पुलिस फार्यंरग के लिए भी जनता भाजपा सरकार को जिम्मेदार मानती रही है। 
कांग्रेस अध्यक्ष बनने से पहले राहुल गांधी खुद भी द्रमुक से दूरी बनाते दिख रहे थे, जो शायद टू जी घोटाले की वजह से था। लेकिन अब चुनाव में द्रमुक ने उदार बनकर कांग्रेस को 10 सीटें दी हैं, जबकि पार्टी खुद 20 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। बाकी सीटें गठबंधन के अन्य सहयोगी दलों के लिए छोड़ी गई हैं। 
नरेंद्र मोदी की करीबी सहयोगी जयललिता ने पिछला संसदीय चुनाव अपने दम पर लड़ा था और 37 सीटें हासिल की थीं। लेकिन जयललिता की मौत के बाद कोई ऐसा नेतृत्व नहीं उभर पाया है, जो लोगों का मूड पहचान सके। यह बताना मुश्किल है कि क्या लोग अब भी पार्टी के साथ हैं या उन्होंने इसका दामन झटक दिया है? फिर, पार्टी से अलग हो चुके टीटीवी दिनाकरन (शशिकला के भतीजे) की ताकत भी आंकी जानी शेष है, जिनकी पार्टी अम्मा मक्कल मुन्नेत्र कषगम ने जयललिता की मौत के कारण हुए उप-चुनाव में जीत दर्ज की थी? बेशक केंद्र की सत्तारूढ़ पार्टी भाजपा के साथ समझौता करने का फायदा अन्नाद्रमुक को मिलता दिख रहा है, पर एनईईटी और चेन्नई-सलेम एक्सप्रेस-वे को लेकर कुछ केंद्रीय मंत्रियों के बयान गलत वक्त पर आए हैं, क्योंकि द्रमुक और अन्नाद्रमुक, दोनों पार्टियां एनईईटी की मुखालफत करती रही हैं और इसे खत्म करवाने का वादा मतदाताओं से आज भी करती हैं। ऐसे में, विश्लेषक मान रहे हैं कियदि सत्तारूढ़ अन्नाद्रमुक को उप-चुनावों में हार का सामना करना पड़ा और उसकी सरकार गिरी, तो इस पार्टी का भी अंत हो सकता है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:najariya hindustan column 18 April