DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

एक नदी जो बन गई है चुनाव का मुद्दा

पंकज चतुर्वेदी  वरिष्ठ पत्रकार

मणिपुर की राजधानी इंफाल का ईमा कैथेल अर्थात ‘मां का बाजार’ दुनिया में अनूठा व्यावसायिक स्थल है, जहां केवल महिलाएं दुकान चलाती हैं। साल 1533 में बने इस बाजार में लगभग पांच हजार महिलाओं का कारोबार है। शायद इस बाजार को वहां बनाने का असली कारण पास में बहने वाली नांबुल नदी थी, ताकि पानी लगातार उपलब्ध रहे और बाजार में इसी नदी की ताजी मछलियां आ सकें। व्यापारी व खरीदार नदी परिवहन का इस्तेमाल कर सकें। बीते दो दशक के दौरान इस बाजार का अभिन्न हिस्सा बन गए पॉलीथिन बैग और प्लास्टिक के पैकिंग मैटेरियल ने पहले तो दुकानदार-खरीदार, दोनों को बहुत सहूलियतें दीं, लेकिन धीरे-धीरे इसका कचरा उस नदी के अस्तित्व के लिए संकट बन गया, जिसके कारण यह बाजार अस्तित्व में आया था। 
ईमा कैथेल में आने वाले पर्यटकों के लिए यह नदी सदा से आकर्षण का एक केंद्र रही है। इसके जल की सहज धारा, इसकी सुगंध और मंद शीतल हवा का अपना ही आनंद था। मगर आज ईमा कैथल के करीब से गुजरते हुए बदबू और नदी का बेहद कुरूप चेहरा दिखता है। वैसे तो पूर्वोत्तर राज्यों में अब भी अपेक्षाकृत जल स्वच्छ होता है। लेकिन इस नदी में जल के स्थान पर पॉलीथिन, पानी की बोतलें व अन्य प्लास्टिक पैकिंग सामग्री का अंबार दिखता है। यही नदी आगे चलकर विश्व के एकमात्र तैरते नेशनल पार्क व गांवों के लिए प्रसिद्ध लोकटक झील में मिल जाती है। जाहिर है, इस सबका का कुप्रभाव लोकटक पर भी पड़ रहा है। समुद्र तट से कोई 1,830 मीटर की ऊंचाई पर स्थित कांगचुप पर्वतमाला से निकलने वाली नांबुल नदी इंफाल-पश्चिम, सेनापति और तेमलांग जिलों से होती हुई लोकटक में विसर्जित होती है। इसमें अलग-अलग 30 सरिताएं मिलती हैं, जो इस नदी को मणिपुर की जीवनरेखा और सदानीरा बनाए रखती हैं। इंफाल शहर में पेयजल की मुख्य स्रोत नांबुल 10 किलोमीटर के अपने रास्ते में नदी के रूप में दिखना ही बंद हो गई है। ख्वारेमबंड बाजार के हंप पुलिया से कैथमथोय ब्रिज के पूरे हिस्से में नदी महज कूड़ा ढोने का मार्ग है। जैसे ही यह पानी लोकटक में मिलता है, तो उसे भी दूषित कर देता है। जैव-विविधता की दृष्टि से इतने संवेदनशील और अनूठे लोकटक के पर्यावरणीय तंत्र के लिए नांबुल अब खतरा बन गई है।       
नांबुल के प्रदूषण से इसके पानी के कारण खेती करने वाले और मछली पालन का काम करने वाले कई सौ लोगों के जीविकोपार्जन पर भी खतरा पैदा हो गया है। मछलियों की कई प्रजातियां, जैसे नगनक, नगसेप, नगमु-संगुम, नगटोन, खबक, पेंगवा, थराक, नगारा, नगतिन आदि विलुप्त हो गई हैं। ये मछलियां पहले म्यांमार के चिंडविन-इरावदी नदी तंत्र से आकर मणिपुर घाटी की सरिताओं में प्रजनन किया करती थीं। प्लास्टिक से उन मछलियों के आवागमन का प्राकृतिक रास्ता ही बंद हो गया। यही नहीं, इसके चलते नदी किनारे पैदा होने वाली साग-सब्जियों- हैकाक, थांगजींग, थारो, थांबल, लोकेई, पुलई आदि का उगना रुक गया। खेतों में फूलगोभी और बंदगोभी की फसल भी प्रभावित हुई है। 
अकेले इंफाल शहर के 27 वार्डों से हर दिन 120 से 130 टन कूड़ा निकलता है और इसके निबटारे की कोई माकूल व्यवस्था नहीं है। या तो इस कूड़े को शहर के बाहरी पहाड़ी क्षेत्रों में फेंक दिया जाता है या फिर शहर के बीच से गुजरती नांबुल नदी में डाल दिया जाता है। लगातार कूड़ा फेंकने से जब शहर में नदी ढक गई, तो स्थानीय प्रशासन ने सन 2018 में पर्यावरण संरक्षण अधिनियम के अंतर्गत शहर में 50 माइक्रोन से कम मोटाई की पॉलीथिन पर पाबंदी लगा दी। इस कानून को तोड़ने पर एक लाख रुपये जुर्माना या पांच साल की सजा या दोनों का प्रावधान है। पाबंदी का असर ईमा कैथल पर भी पड़ा। कई दुकानदार पहले इसे स्वीकारने को तैयार नहीं थे, जबकि कई को शिकायत थी कि वे इस नियम को मानकर पॉलीथिन का प्रयोग बंद भी कर दें, पर बाहर के लोग मानते नहीं। इस बार के चुनाव में पॉलीथिन पर सख्ती से पाबंदी, नदी की सफाई और शहर से निकलने वाले कूडे़ के वैज्ञानिक तरीके से निस्तारण जैसे मसले सबसे आगे हैं। बाजार चलाने वाली महिलाएं इस पर सबसे ज्यादा मुखर हैं और हर सियासी दल इसके निराकरण के वायदे अपने घोषणापत्र में कर रहा है। 
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:najariya hindustan column 16 may